अमेरिकी दंगे : दंगों की वामपंथी कलुष-कथा

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अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे देश आज से 200 साल पहले अपने वर्तमान स्वरूप में देश नहीं थे। अलग-अलग परिस्थिति में विभिन्न देशों के लोग आकर यहां बसे और इसे यह रूप दिया। ये सामुदायिक समूह अपनी पृष्ठभूमि के साथ अपने देश के तौर-तरीके भी लेकर आए थे। इसी कारण ये अक्सर एक-दूसरे से भिड़ते रहे हैं। इन देशों का 1970 तक का इतिहास भेदभावपूर्ण रहा है, लेकिन देर-सबेर सभी ने अपने नागरिकों को बिना भेदभाव बराबरी का कानूनी हक दे दिया। हालांकि इससे इनके बीच न तो झगड़े खत्म हुए और न ही नस्लीय भेदभाव, बस उसका तरीका बदल गया।

अमेरिका के मिनिपोलिस में गत 25 मई को हथकड़ियों में जकड़े एक अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की एक श्वेत पुलिस अधिकारी के हाथों मौत हो गई। 20 डॉलर के नकली नोट से सिगरेट खरीदना फ्लॉयड को महंगा पड़ा। श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक चौविन ने आठ मिनट तक अपने घुटने से फ्लॉयड की गर्दन दबाए रखी जिससे उसकी कथित मौत हो गई। सोशल मीडिया के दौर में पुलिस अधिकारी की इस नृशंस कार्यवाही का वीडियो जब फ्लॉयड के अश्वेत बहुल इलाके में फैला तो लोग उग्र हो गए और सड़कों पर उतर आए। न्यूज एजेंसी एसोसिएटिड प्रेस के अनुसार, घटना के चंद घंटे के भीतर सोशल मीडिया पर इसे लेकर फर्जी पोस्ट की जाने लगीं। सोशल मीडिया पर कुछ नामी लोगों की भ्रामक और निराधार दावों वालीं पोस्ट ने भी आग में पेट्रोल डालने का काम किया। नतीजा, अमेरिका में पहले से ही नाजुक नस्लीय ताना-बाना बिगड़ गया। दंगे भड़क गए और करीब 46 शहर इसकी चपेट में आ गए। आगजनी, मारपीट और लूटपाट शुरू हो गई।

ओहायो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लानायर होल्ट कहते हैं कि  कुछ लोगों ने जान-बूझकर बड़ी संख्या में भड़के दंगों और नस्ल भेद की सुलगती लकड़ियों को दावानल बनाने की कोशिश की है। नस्लीय नफरत फैलाने के लिए पूरी योजना के साथ सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखे गए।

आॅस्ट्रेलिया में सोशल कम्युनिकेशन के जानकार मोहित पंडित बताते हैं कि फर्जी पोस्ट फैलाने के पीछे एक उद्देश्य होता है। वे झूठी जानकारी फैलाकर लोगों के मन में पहले से मौजूद पूर्वाग्रह को स्थापित करते हैं। अमेरिका में पिछले एक हफ्ते से हो रहे दंगे उसी का परिणाम हैं। सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट या फर्जी खबर नस्लभेद को निशाना बनाती दिखती हैं। जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के एक दिन बाद ही ट्विटर और फेसबुक पर आरोपी पुलिस अधिकारी चौविन के नाम से एक व्यक्ति की तस्वीर वायरल
हुई, जिसने लाल रंग की ‘मेक अमेरिका व्हाइट अगेन’ लिखी टोपी पहन रखी थी। याद रहे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड
ट्रंप ने चुनाव में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया था।

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अमेरिका में हुए नागरिक अधिकार आंदोलन की तर्ज पर भारत में भी वामपंथी
कभी सीएए तो कभी दलित मांगों को लेकर फर्जी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

इसी तरह, अमेरिका के जाने-माने रैपर और अभिनेता आइस क्यूब ने एक फोटो ट्वीट की, जिसे ट्विटर ने मनगढ़ंत बताया। किसी ने एक छोटा वीडियो डाला और मिनिपोलिस के मॉल आॅफ अमेरिका में लूटपाट का दावा किया। इस वीडियो को लाखों लोगों ने देखा। फैक्ट चेक में पता चला कि यह फर्जी वीडियो था। लेकिन झूठ साबित होने के बाद भी लोग उस वीडियो को ही सच मानते रहे। सेंट पॉल पुलिस विभाग ने तो बाकायदा बयान जारी कर उन अफवाहों का खंडन किया, जिनमें एक पुलिस अधिकारी द्वारा मिनिपोलिस में स्टोर में तोड़फोड़ की बात कही गई थी। इस बीच, कुछ लोग पुराने फोटो और वीडियो शेयर कर प्रदर्शनकारियों को जानवर और समाज का कलंक साबित करने में जुटे हुए थे।

प्रोफेसर होल्ट कहते हैं, ‘हमें लगा था कि सोशल मीडिया से ऊंच-नीच की भावना कम होगी, लेकिन यहां भी लोगों ने लोगों ने अपने जैसे लोगों के गठजोड़ बना लिए हैं जो बिना तथ्यों की पड़ताल किए एक-दूसरे के पोस्ट को विस्तार देने का काम करते हैं। यह सब मैंने अभी हाल ही में भारत में भी देखा था कि कैसे एक झूठ को सच साबित करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता, फिल्मी कलाकार, राजनीतिक दल, सोशल मीडिया पर प्रभाव रखने वाले लोग एक तरफ हो गए थे। भारत में नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद शाहीनबाग में धरना-प्रदर्शन और दंगा तथा अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद भड़का दंगा दरअसल दोनों की पटकथा एक जैसी ही है, केवल स्थान का अंतर है।

यह अलग-अलग स्थान पर बनाई गई फिल्म की तरह है।’ अमेरिका में दंगों के दौरान पाकिस्तानी मूल की एक महिला वकील को गिरफ्तार किया गया। मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाली यह पाकिस्तानी महिला पर पुलिस की गाड़ी में पेट्रोल बम से आग लगाने का आरोप है। इसी तरह, भारत में भी पीएचडी, वकालत और इंजीनियरिंग डिग्री धारक तत्व दंगों की कमान अपने हाथ में लेकर समाज को विभाजित करने के प्रयासों में जुटे हैं। आखिर कौन हैं ये लोग? ये हिंसा क्यों करते हैं और इससे क्या हासिल कर लेंगे? जैसे ही हम इन सवालों का जवाब ढूंढने निकलते हैं, तस्वीर कुछ साफ होने लगती है।

ब्रिटेन निवासी भारतीय मूल के राजीव मिश्रा ने अपनी पुस्तक ‘विषैला वामपंथ’ में इस तस्वीर को स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं, ‘भीषण सामाजिक विषमता, अत्याचारों और अन्याय की पृष्ठभूमि में अमेरिका में 1950 और 1960 के दशक में नागरिक अधिकार आंदोलन की शुरुआत हुई। मार्टिन लूथर किंग इसके नेता बनकर उभरे। उनके नेतृत्व में लोगों ने विशाल रैलियां निकालीं, स्वतंत्रता मुहिम से जुड़े और बसों का सामूहिक बहिष्कार किया। ऐसा नहीं है कि इसमें केवल अश्वेत शामिल थे। इन घटनाओं ने पूरे अमेरिका के मानस को जगा दिया और बड़ी संख्या में श्वेत आबादी ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया। आखिरकार नागरिक अधिकार कानून बना और 1964 में लिंडन जॉनसन की सरकार ने अमेरिका में अलगाव ओर भेदभाव को समाप्त करने की घोषणा की। लेकिन इतने बड़े अन्याय की पृष्ठभूमि हो, उसके लिए आंदोलन हो और वामपंथी उसका फायदा उठाने से चूक जाएं और उसे अपनी वर्ग संघर्ष की प्रयोगशाला न बनाएं, यह हो ही नहीं सकता। पिछले चार सालों में भारत में हुए अनेक प्रदर्शनों यथा जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन, सोनपेड़ की घटना के बाद हुए दलित प्रदर्शन जैसे अनेक आंदोलनों में एक रणनीति की झलक दिखाई देगी। यह अनायास नहीं है। यह उन्हीं की पटकथा की नकल है।’

भारत में 1960 के अमेरिकी परिदृश्य के पुनर्मंचन की कोशिश चल रही है। दलित अधिकारों की मांगों को अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन की तर्ज पर खड़ा किया जा रहा  है। उसी तरह भीड़ जुटाना, उन्माद पैदा करना, जातीय हिंसा फैलाना और पुलिस को आक्रामक कार्रवाई के  लिए मजबूर करना जारी है।  इसके अलावा उनका वैश्विक रणनीतिक गठजोड़ भी है। पश्चिमी जगत जिन अपराधों का दोषी रहा है, उन्हें भारत पर मढ़ा जा रहा है।

वह आगे लिखते हैं, ‘आज भारत में आप एक लहर देख रहे हैं जो मूलत: 1960 के अमेरिकी परिदृश्य का फिर से मंचन किए जाने की कोशिश है। दलित अधिकारों की मांगों को अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन की तर्ज पर खड़ा किए जाने का प्रयास है। उसी तरह भीड़ जुटाना, उसी तरह उन्माद पैदा करना, जातीय हिंसा फैलाना और पुलिस को आक्रामक कार्रवाई के लिए मजबूर करना।  गौर से देखें तो उनका एक वैश्विक रणनीतिक गठजोड़ भी दिखता है।

पश्चिमी जगत जिन अपराधों का दोषी रहा है, उन्हें भारत पर मढ़ा जा रहा है। भारतीय समाज स्वत:स्फूर्त और स्वप्रेरणा से जिन सामाजिक भूलों का सुधार कर चुका है, उसे समाज पर प्रत्यारोपित करने के लिए नई और झूठी कहानियां गढ़ी जा रही हैं। लिंचिंग शब्द को खूब दोहराया जा रहा है। दो-चार लोगों के बीच मारपीट की किसी भी घटना को लिंचिंग का नाम देकर देशी-विदेशी मीडिया में खूब फैलाया जा रहा है। अमेरिका अपने नस्लीय अतीत को पीछे छोड़ चुका है। आज अमेरिका में अश्वेत किसी भी अफ्रीकी देश के मुकाबले अधिक समानता और अधिकार के साथ रहते हैं, पर बीच-बीच में ऐसी कहानियां उछाली जाती रही हैं, जिसे नस्लवाद से जोड़कर दिखाया जा सकता है।

आज हम भारत में असहिष्णुता-कथा सुनते हैं कि हर तरफ ‘असहिष्णुता की महामारी’ फैली है, क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र के नेतृत्व का भारत है। उधर, ट्रंप के अमेरिका में भी यही कहानी चल रही है। लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे समाज में ट्रंप के आने से नस्लभेद बढ़ रहा है। ट्रंप को वोट देने के लिए लोगों को शर्मिंदा महसूस कराया जा रहा है। जब बॉलीवुड की किसी फिल्म की कहानी आपको थोड़ी अलग लगती है तो आप समझ जाते हैं कि यह हॉलीवुड की किसी फिल्म की नकल है।

भारत का वर्तमान वामपंथी परिदृश्य भी वास्तविक पटकथा नहीं है। यह 1960 की हिट अमेरिकी पटकथा ‘सिविल राइट्स’ की चोरी भर है। ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ दंगे भारतीयों के लिए संवेदना प्रकट करने का नहीं, खतरों को पहचानने और वामपंथी रणनीति को समझने का अवसर है।’

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