राम मंदिर आंदोलन के दौरान ये लोग हुए चर्चित, जिन्हें युगों-युगों तक किया जाएगा याद

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1992 में अयोध्या में भाजपा, विहिप और आरएसएस द्वारा एक बड़ी रैली की गई, जिसके बाद छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया.

अयोध्या मामले में हिंदू पक्ष को जीत दिलाने वाले के. परासरन

बाबरी-राम जन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ज़मीन को रामलला विराजमान को देने का फ़ैसला सुनाया है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या में ही उचित जगह पर पांच एकड़ ज़मीन देने को कहा है.

रामलला विराजमान की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील के. परासरन ने पैरवी की. परासरन की आयु इस समय 93 वर्ष है और वो अपनी युवा टीम के साथ सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम की पैरवी कर रहे थे.

9 अक्तूबर 1927 को तमिलनाडु के श्रीरंगम में पैदा हुए परासरन तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल रहने के अलावा भारत के अटॉर्नी जनरल भी रहे हैं. इसके अलावा वो साल 2012 से 2018 के बीच राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं.

परासरन को पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित किया जा चुका है.

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हिंदू क़ानून में है विशेषज्ञता

परासरन ने क़ानून में स्नातक की पढ़ाई की. इस दौरान उन्हें हिंदू क़ानून की पढ़ाई के लिए गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था. पढ़ाई के बाद उन्होंने 50 के दशक में वकालत शुरू की.

वो कांग्रेस सरकार के काफ़ी नज़दीक रहे. इसके अलावा वाजपेयी सरकार के दौरान उन्होंने संविधान के कामकाजी की समीक्षा के लिए बनी संपादकीय समिति में उन्होंने काम किया.

परासरन को हिंदू धर्म की अच्छा ख़ासा ज्ञान है. अयोध्या मामले में रामलला विराजमान का वकील रहने के अलावा वो सबरीमला मंदिर मामले में भगवान अयप्पा के भी पैरोकार रहे हैं.

हिंदू धर्म पर इतनी अच्छी पकड़ होने के कारण ही परासरन भगवान राम से नज़दीकी महसूस करते रहे हैं. उनके क़रीबी बताते हैं कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 40 दिनों तक चली रोज़ाना सुनवाई के दौरान वो हर रोज़ बहुत मेहनत करते थे.

रोज़ाना सुनवाई सुबह 10.30 बजे शुरू होती थी और शाम को 4 से 5 बजे के बीच ख़त्म होती थी. लेकिन परासरन सुनवाई से पहले केस के हर पहलू पर गंभीरता से काम करते थे.

परासरन की टीम में पीवी योगेश्वरन, अनिरुद्ध शर्मा, श्रीधर पोट्टाराजू, अदिति दानी, अश्विन कुमार डीएस और भक्ति वर्धन सिंह जैसे युवा वकील हैं.

उनकी टीम इस आयु में उनकी ऊर्जा और उनकी याद्दाश्त को देखकर उत्साहित हो जाती है. वो सभी महत्वपूर्ण केसों को उंगलियों पर गिनकर बता देते हैं.

परासरन की सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

रामलला विराजमान की ओर से वकालत करते हुए परासरन ने कहा था कि इस मामले में कड़े सबूतों की मांग में ढील दी जानी चाहिए क्योंकि हिंदू मानते हैं कि उस स्थान पर भगवान राम की आत्मा बसती है इसलिए श्रद्धालुओं की अटूट आस्था भगवान राम के जन्म स्थान में बसती है.

उनके इस तर्क के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एस.ए. बोबड़े ने परासरन से पूछा था कि ईसा मसीह बेथलेहम में पैदा हुए थे क्या यह सवाल किसी कोर्ट में कभी उठा है?

इसके अलावा परासरन ने सुप्रीम कोर्ट के आगे कई तर्क दिए थे जिनमें से सबसे अहम तर्क यह था कि उन्होंने राम जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्तित्व बताया था. इस कारण इस पर कोई संयुक्त क़ब्ज़ा नहीं दिया जा सकता था क्योंकि यह अविभाज्य है.

परासरन ने अपने तर्कों में ज़मीन को देवत्व का दर्जा दिया था. उनका कहना था कि हिंदू धर्म में मूर्तियों को छोड़कर, सूरज, नदी, पेड़ आदि को देवत्व का दर्जा प्राप्त है, इसलिए ज़मीन को भी देवत्व का दर्जा दिया जा सकता है.

राम जन्मभूमि के अलावा परासरन ने बाबरी मस्जिद के निर्माण पर भी सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद को इस्लामी क़ानून के अनुसार बनाई गई मस्जिद नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसको एक दूसरे धार्मिक स्थान को तोड़कर बनाया गया था.

उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि बाबरी मस्जिद को एक मस्जिद के रूप में बंद कर दिया गया था जिसके बाद इसमें मुसलमानों ने नमाज़ पढ़ना बंद कर दिया था.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या विवाद मामले में अपना फैसला सुनाया. धार्मिक आस्था से जुड़ी इस लंबी लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के वरिष्ठ नेताओं के साथ ही हजारों कारसेवक भी शामिल रहे हैं, जिन्होंने 1992 में अयोध्या में 16वीं शताब्दी में बने विवादित ढांचे को गिराने में भूमिका निभाई. 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग बढ़ी, जिसके बाद वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 1990 में देशव्यापी रथ यात्रा का नेतृत्व किया.

1992 में अयोध्या में भाजपा, विहिप और आरएसएस द्वारा एक बड़ी रैली की गई, जिसके बाद छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया.

यहां कुछ ऐसे प्रमुख चेहरे हैं, जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान काफी प्रसिद्ध हुए :
लाल कृष्ण आडवाणी : 
भाजपा अध्यक्ष के रूप में आडवाणी ने 1990 में गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की, जिसका समापन अयोध्या में होना था. उनकी रथयात्रा ने देश भर में लोकप्रियता हासिल की, क्योंकि उनका हर उस स्थान पर जोरदार स्वागत किया गया, जहां वह पहुंचे. इस तरह राम मंदिर के निर्माण की मांग को बल मिला.

मुरली मनोहर जोशी : जोशी ने अपने पूर्ववर्ती आडवाणी की तरह 1991 में भाजपा अध्यक्ष का पद संभाला था. उन्होंने मंदिर के लिए हो रहे आंदोलन में एक प्रमुख भूमिका निभाई. सीबीआई के अनुसार, जोशी पर आरोप है कि वह छह दिसंबर को आरएसएस के अन्य नेताओं के साथ मंच पर थे. उन पर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया गया है.

कल्याण सिंह : जब बाबरी मस्जिद के ढांचे को हजारों कारसेवकों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था तब सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मस्जिद के विध्वंस के बाद हालांकि उन्होंने स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहने के बाद छह दिसंबर की शाम को पद से इस्तीफा दे दिया. सिंह ने छह दिसंबर की रैली से पहले सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें कहा गया था कि वह और उनकी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा.

उमा भारती : भारती भी छह दिसंबर को अयोध्या में मौजूद भाजपा नेताओं में से एक थीं. उन पर सांप्रदायिक भाषण देने और हिंसा भड़काने का आरोप है. सीबीआई द्वारा की गई जांच में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में उन पर आपराधिक साजिश रचने का भी आरोप है.

अशोक सिंघल : सिंघल विहिप के अध्यक्ष थे और 1984 में अभियान के पीछे रहे उन प्रमुख लोगों में से एक थे, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर की मांग की. उन्हें राम मंदिर आंदोलन के वास्तुकारों में से एक माना जाता है, जिसने 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस का नेतृत्व किया था.

पी. वी. नरसिम्हा राव : 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के समय राव प्रधानमंत्री थे. कई लोगों ने उन्हें निष्क्रियता के लिए दोषी ठहराया. लिब्रहान आयोग ने इस घटना की जांच की. राव की सरकार ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने का विचार किया था, लेकिन राज्य सरकार ने एक हलफनामे के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होगा.

लालू प्रसाद यादव : राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री थे और आडवाणी की रथयात्रा के खिलाफ अपने निर्णायक रुख के लिए काफी चर्चित हुए. उन्होंने उस समय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर से आडवाणी की गिरफ्तारी का आदेश दिया.

विजया राजे सिंधिया : ग्वालियर की राजमाता और भाजपा की एक वरिष्ठ नेता सिंधिया छह दिसंबर को भाजपा, आरएसएस और विहिप नेताओं के साथ अयोध्या की रैली में मौजूद जाने-माने नेताओं में से एक थीं.

बाल ठाकरे : शिवसेना सुप्रीमो ठाकरे हालांकि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के स्थल पर कभी मौजूद नहीं रहे, लेकिन माना जाता है कि वह ढांचे को गिराने की साजिश का हिस्सा रहे थे. 1992 में मस्जिद के विध्वंस के बाद, ठाकरे ने दावा किया था कि उनके संगठन ने मस्जिद को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

राम मंदिर आंदोलन के वो चेहरे जिन्हें आप भूल तो नहीं गए?

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या पर फ़ैसला सुना दिया. अदालत ने ज़मीन का वो हिस्सा हिंदू पक्ष को देने का फ़ैसला किया जहाँ बाबरी मस्जिद थी.

इसके तुरंद बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी एक ट्वीट करके विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर डाली.

अशोक सिंघल राम मंदिर आंदोलन के अग्रणी नेता थे और चार साल पहले ही उनका निधन हुआ है.

सिंघल 20 साल तक विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकारी अध्यक्ष रहे. माना जाता है कि सिंघल ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने अयोध्या विवाद को स्थानीय ज़मीन विवाद से अलग देखा और इसे राष्ट्रीय आंदोलन बनाने में अहम भूमिका निभाई.

सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट कर कहा है, ”जीत की इस घड़ी में हमें अशोक सिंघल को याद करना चाहिए. नमो सरकार को उनके लिए तत्काल भारत रत्न की घोषणा करनी चाहिए.”

लेकिन राम मंदिर आंदोलन में 1990 के दशक में बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी सबसे प्रमुख चेहरा बने इसीलिए जब सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला आया तो केंद्र में बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिव सेना के मुखिया उद्धव ठाकरे ने कहा कि वो आडवाणी से मिलने जाएंगे और उन्हें बधाई देंगे, “उन्होंने इसके लिए रथ यात्रा निकाली थी. मैं निश्चित रूप से उनसे मिलूंगा और उनका आशीर्वाद लूंगा.”

इस समय महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने में बीजेपी और शिवसेना के बीच तनातनी चल रही है और शिव सेना सत्ता में 50-50 हिस्सेदारी पर अड़ी हुई है इसीलिए नतीजे आने के कई दिन बीत जाने के बाद भी राज्य में सरकार बनने की सूरत नहीं दिखाई दे रही है.

लेकिन आडवाणी को धन्यवाद देने वाले वो अकेले नहीं हैं. बीजेपी की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने ट्वीट कर अशोक सिंघल और आडवाणी का अभिनंदन किया है. उमा भारती अदालत का निर्णय आने के तुरंत बाद आडवाणी से मिलने उनके घर गईं, उन्होंने मीडिया से कहा कि “आज आडवाणी जी के सामने माथा टेकना ज़रूरी है.”

रंजन गोगोई

खुद उमा भारती भी राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी थीं और राजनीति में प्रवेश के बाद मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रहीं और बीजेपी से बग़ावत की और फिर बीजेपी में लौट आईं और नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में मंत्री भी रहीं.

सवाल उठता है कि राम मंदिर के मामले में किसी एक को कैसे श्रेय दिया जाए क्योंकि इसके कई चेहरे रहे हैं.

शनिवार के फैसले से पहले अयोध्या मामला कई पड़ावों से होकर गुजरा और इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़े कई वरिष्ठ नेताओं की अहम भूमिका रही है.

ऐसे नेताओं में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, प्रवीण तोगड़िया और विष्णु हरि डालमिया के नाम प्रमुख रहे हैं.

आइए एक नज़र उन लोगों पर डालते हैं जिन्होंने राम मंदिर की मांग को लेकर चले आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई.

अशोक सिंघल

मंदिर निर्माण आंदोलन चलाने के लिए जनसमर्थन जुटाने में अशोक सिंघल की अहम भूमिका रही. कई लोगों की नजरों में वह राम मंदिर आंदोलन के ‘चीफ़ आर्किटेक्ट’ थे. वह 2011 तक वीएचपी के अध्यक्ष रहे और फिर स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. 17 नवंबर 2015 को उनका निधन हो गया.

लालकृष्ण आडवाणी

लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की थी. हालांकि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने समस्तीपुर ज़िले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. चार्जशीट के अनुसार, आडवाणी ने छह दिसंबर 1992 को कहा था, ”आज कारसेवा का आखिरी दिन है.” आडवाणी के ख़िलाफ़ मस्जिद गिराने की साज़िश का आपराधिक मुकदमा अब भी चल रहा है.

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मुरली मनोहर जोशी

1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय मुरली मनोहर जोशी आडवाणी के बाद बीजेपी के दूसरे बड़े नेता थे. छह दिसंबर 1992 को घटना के समय वह विवादित परिसर में मौजूद थे. गुंबद गिरने पर उमा भारती उनसे गले मिली थीं. वह वाराणसी, इलाहाबाद और कानपुर से सांसद रह चुके हैं. इस समय वह बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में हैं.

कल्याण सिंह

छह दिसंबर 1992 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे. उन पर आरोप है कि उनकी पुलिस और प्रशासन ने जान—बूझकर कारसेवकों को नहीं रोका. बाद में कल्याण सिंह ने बीजेपी से अलग होकर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई लेकिन वो फिर बीजेपी में लौट आए. कल्याण सिंह का नाम उन 13 लोगों में शामिल था जिन पर मस्जिद गिराने क साज़िश का आरोप लगा था.

विनय कटियार

राम मंदिर आंदोलन के लिए 1984 में ‘बजरंग दल’ का गठन किया गया था और पहले अध्यक्ष के तौर पर उसकी कमान आरएसएस ने विनय कटियार को सौंपी थी. बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने जन्मभूमि आंदोलन को आक्रामक बनाया. छह दिसंबर के बाद कटियार का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव भी बने. कटियार फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए.

साध्वी ऋतंभरा

साध्वी ऋतंभरा एक समय हिंदुत्व की फायरब्रांड नेता थीं. बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में उनके ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश के आरोप तय किए गए थे. अयोध्या आंदोलन के दौरान उनके उग्र भाषणों के ऑडियो कैसेट पूरे देश में सुनाई दे रहे थे जिसमें वे विरोधियों को ‘बाबर की आलौद’ कहकर ललकारती थीं.

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उमा भारती

मंदिर आंदोलन के दौरान महिला चेहरे के तौर पर उनकी पहचान बन कर उभरी. लिब्रहान आयोग ने बाबरी ध्वंस में उनकी भूमिका दोषपूर्ण पाई. उन पर भीड़ को भड़काने का आरोप लगा जिससे उन्होंने इनकार किया था. वह केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री रहीं. हालांकि ने 2019 के संसदीय चुनावों से अलग रहीं और बीजेपी की जीत के बाद वो मंत्री भी नहीं रहीं.

प्रवीण तोगड़िया

विश्व हिंदू परिषद के दूसरे नेता प्रवीण तोगड़िया राम मंदिर आंदोलन के वक्त काफी सक्रिय रहे थे. अशोक सिंहल के बाद विश्व हिंदू परिषद की कमान उन्हें ही सौंपी गई थी. हालांकि हाल ही में वीएचपी से अलग होकर उन्होंने अंतराष्ट्रीय हिंदू परिषद नाम का संगठन बनाया.

विष्णु हरि डालमिया

विष्णु हरि डालमिया विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ सदस्य थे और वह संगठन में कई पदों पर रहे. वह बाबरी मस्जिद ढहाए जाने मामले में सह अभियुक्त भी थे. 16 जनवरी 2019 को दिल्ली में गोल्फ लिंक स्थित उनके आवास पर उनका निधन हो गया.

ये सूची और लंबी है, लेकिन श्रेय चाहे किसी को दिया जाए, एक बात बिल्कुल साफ़ है कि इसने राजनीतिक रूप से हाशिए पर रही बीजेपी को वो राजनीतिक समर्थन दिलाया जिस पर सवार होकर वो केंद्र में पहले गठबंधन और फिर अपने बूते सरकार बनाने में सफल रही.

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