डॉक्टरों के एक समूह द्वारा 13 मई को आंबेडकर और उच्च शिक्षा के संस्थानों में जातिगत भेदभाव विषय पर एक चर्चा रखी गई थी, जिसके लिए प्रशासन द्वारा कुछ निर्देश जारी किए गए. इसके बाद डॉक्टरों ने इसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने का प्रयास बताते हुए आयोजन स्थगित कर दिया.

 एम्स फैकल्टी के सदस्यों के एक वर्ग ने उच्च शिक्षा के संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर चर्चा के लिए एक सत्र आयोजित करने के लिए प्रशासन के शर्तों को लागू करने को ‘मनमाना और अवैध’ बताया है.

उन्होंने कहा कि यह उनके मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने का एक प्रयास है. आयोजकों ने विरोध में इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया है जिसे सोमवार को आयोजित किया जाना था. उन्होंने शर्तों को वापस लिए जाने की भी मांग की है.

‘एम्स फ्रंट फॉर सोशल कॉन्शियसनेस’ से संबंधित डॉक्टरों के एक समूह ने ‘सामाजिक संबंधों पर आंबेडकर के विचार: उच्च शिक्षा के संस्थानों में जातिगत भेदभाव’ विषय पर 13 मई को एक चर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया था और इसके लिए एक क्लास बुक करने के लिए प्रशासन को लिखा था.

अपने जवाब में एम्स के रजिस्ट्रार ने कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कई निर्देश जारी किए. शर्तों में कहा गया, ‘किसी भी समाज/मंच/संघ को कार्यक्रम की मेजबानी या भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई है.’

प्रशासन ने आगे लिखा, ‘कोई राजनीतिक चर्चा नहीं होनी चाहिए. कोई प्रेस/मीडिया कवरेज नहीं किया जाना चाहिए और एम्स के निदेशक की विशेष स्वीकृति के बिना कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह एम्स परिसर के भीतर आयोजित किया जा रहा है.’

हिंदू कॉलेज और आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसरों के अलावा, कुछ फैकल्टी सदस्यों को इस कार्यक्रम में भाग लेना था.

प्रशासन के इस रवैये से डॉक्टरों के एक वर्ग में नाराजगी पैदा हो गई और उन्होंने इसे उनके मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने का एक प्रयास बताया और निदेशक के साथ एक बैठक की.

फैकल्टी सदस्यों ने कहा कि निदेशक ने बताया कि 19 मई को चुनाव समाप्त होने के बाद इन शर्तों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. डॉक्टरों ने इस आयोजन को स्थगित कर दिया और शर्तों को वापस लिए जाने की मांग की.

फैकल्टी के कुछ वर्गों ने प्रशासन को एक अन्य कार्यक्रम, ‘ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान पर एक बात’ की अनुमति देने पर आपत्ति जताई, जिसे मीडिया ने भी कवर किया था.

फैकल्टी के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा, ‘सभी के लिए परिस्थितियां समान होनी चाहिए. प्रशासन अलग अलग लोगों के लिए अलग नजरिया नहीं रख सकता है. इस तरह की शर्तें रखना प्रेस की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वतंत्रता को नियंत्रित करने जैसा है.’

एम्स के रजिस्ट्रार डॉ. संजीव लालवानी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘हमने दिशानिर्देशों का पालन किया है और चर्चा आयोजित करने की अनुमति दी है. सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियमों और शर्तों के तहत स्वीकृति दी गई है. नियम सामान्य हैं और /यह संस्थान में हर गैर-शैक्षणिक गतिविधि पर लागू होते हैं. ये नियम किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बदले जाते हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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