युद्ध, प्यार और राजनीति में सबकुछ जायज़ है. राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी.

यहां दोनों पुरानी कहावतें पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बनते-बिगड़ते आपसी रिश्तों का आईना हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर हरिपद मंडल इन शब्दों में ही बंगाल के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का बखान करते हैं.

खासकर बीते एक-डेढ़ दशक के दौरान इन दोनों राजनीतिक दलों के आपसी रिश्तों में 360 डिग्री का जो बदलाव आया है वैसा देश के दूसरे हिस्सों में देखने को कम ही मिलता है.

कभी सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट को पटखनी देने के लिए पंचायत चुनावों में बीजेपी की सहायता लेने वाली तृणमूल कांग्रेस को मौजूदा लोकसभा चुनावों में इसी पार्टी से सबसे ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

ममता की मां के अटल छूते थे पैर

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तब बीजेपी और ममता के रिश्तों में मधुरता थी. इतनी ज़्यादा कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक ममता की मां के पैर छूने उनके कालीघाट स्थित आवास पर पहुंच गए थे. लेकिन अब तस्वीर एकदम बदल चुकी है. आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह से लेकर तमाम नेता तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी पर चौतरफा हमले करते रहे हैं तो ममता भी अकेले इन नेताओं के ख़िलाफ़ तलवारें भांजती रही हैं.

दोनों के रिश्तों में यह तल्खी तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों से ही शुरू हुई थी. उसके बाद होने वाले तमाम चुनावों में बढ़ते हुए यह कड़वाहट अब चरम पर पहुंच चुकी है. दिलचस्प बात यह है कि लेफ्ट और कांग्रेस खासकर मोदी के कुर्ते और रसगुल्ले वाले मामले के बाद ममता पर बीजेपी के साथ गोपनीय तालमेल के आरोप लगाती रही हैं.

दरअसल, बंगाल की राजनीति के सामाजिक पहलू इसे देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले अलग करते हैं. यहां राजनीति अगर आम सामाजिक जीवन का हिस्सा और ख़ासकर युवा वर्ग की पहचान बना है तो इसकी जड़ें ऐतिहासिक हैं.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि देश के विभाजन और उससे भी पहले बंगाल के बंटवारे ने राज्य की जनता को सामाजिक रूप से कुछ असुरक्षित बना दिया.

बंगाल का युवा और राजनीति

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उत्तर बंगाल के एक कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर कालीपद दास कहते हैं, “बंगाल की राजनीति को समझने के लिए आपको बहुत पीछे जाना होगा. राज्य के लोगों में अपनी भाषा, संस्कृति और अपने नायकों के प्रति जैसा लगाव और संवेदनशीलता है वैसा देश के दूसरे हिस्सों या दूसरी जातियों में देखने को कम ही मिलती है.”

वे बताते हैं कि बंगाल का युवा समाज रबींद्रनाथ टैगोर और नज़रूल की कविताएं पढ़ कर ही परिपक्व होता है. यह दोनों आज भी बांग्ला साहित्य और संस्कृति के शीर्ष नायक बने हुए हैं.

दास की दलीलों में दम है. यहां राजनीति दरअसल बीते चार दशकों से भी ज्यादा अरसे से युवा वर्ग की पहचान रही है. वर्ष 1972 से 1977 के बीच सिद्धार्थ शंकर रे की कांग्रेस सरकार के दौरान ही मैंने मोहल्ले के लड़कों, जो मेरे ही उम्र के थे, में मैंने राजनीति के प्रति गहरी निष्ठा और संवेदनशीलता देखी थी.

उस समय खाली वक्त में मैं जहां फुटबाल और कबड्डी खेल कर, गुलशन नंदा और रानू के उपन्यास पढ़ कर और हिंदी फिल्में देख कर मनोरंजन करता था वहीं मेरे साथ के यह लड़के 12-14 साल की उम्र में ही कांग्रेस औऱ उसकी राजनीति और लेफ्ट के उभार जैसे मुद्दों पर बहस में मशगूल रहते थे.

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उसके बाद लेफ्टफ्रंट का दौर आने के बाद यही तमाम लोग धीरे-धीरे उसकी ओर झुकने लगे और उनमें से कुछ लोगों के साथ जब लंबे अरसे बाद मुलाकात हुई तो कुछ पार्षद और विधायक बन चुके थे और बाकी भी सक्रिय राजनीति में थे.

ख़ास बात यह है कि मोहल्ले के तमाम ऐसे मित्र बंगाली थे. लेकिन स्कूल के हिंदीभाषी मित्रों में तब राजनीति के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं था. उनके भी शौक मुझसे ही मिलते-जुलते थे. तब राजनीति और बंगालियों की संवेदनशलीता मेरी समझ से बाहर थी. वह तो बहुत बाद में पत्रकारिता में आने के बाद यह बात समझ में आई कि राजनीति क्यूं और कैसे बांग्ला समाज की रग-रग में बस चुकी है. तब तक ज्योति बसु की सरकार दूसरी बार भारी बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में लौट चुकी थी.

कभी ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासकों का प्रिय रहा बंगाल देश विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे-लंबे दौर का साक्षी रहा है. विभाजन के बाद पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों के मुद्दे पर भी बंगाल ने भारी हिंसा झेली है.

वर्ष 1979 में सुंदरबन इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है. उसके बाद इस इतिहास में ऐसे कई और नए अध्याय जुड़े.

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बंगाल और कांग्रेस का रिश्ता

दरअसल, साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया था.

किसानों के शोषण के विरोध नक्सलबाड़ी से उठने वाली आवाजों ने उस दौरान पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं. नक्सलियों ने जिस निर्ममता से राजनीतिक काडरों की हत्याएं की, सत्ता में रही संयुक्त मोर्चे की सरकार ने भी उनके दमन के लिए उतना ही हिंसक और बर्बर तरीका अपनाया.

वर्ष 1971 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद तो राजनीतिक हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ उसने पहले की तमाम हिंसा को पीछे छोड़ दिया.

वर्ष 1977 के विधानसभा चुनावों में यही उसके पतन की भी वजह बनी. उसके बाद बंगाल की राजनीति में कांग्रेस इस कदर हाशिए पर पहुंची कि अब वह राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुकी है.

राज्य में लेफ्टफ्रंट ने वर्ष 1977 में सत्ता में आने के बाद लोगों को जमीन का मालिकाना हक देने के लिए जिस आपरेशन बर्गा की शुरुआत की थी, उससे लगभग दो दशक तक उसका ग्रामीण वोट बैंक अटूट रहा. लेकिन उसके बाद भावी पीढ़ियों के बीच जमीन के बंटवारे की वजह से मिलने वाले छोटे-छोटे हिस्से पर खेती करना फायदे का सौदा नहीं रह. उसके बाद इस वोट बैंक में बिखराव नजर आने लगा.

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बंगाल की राजनीतिक संस्कृति

खेती लायक जमीन नहीं होने और रोजगार के अभाव ने ग्रामीण इलाकों की इस युवा पीढ़ी को राजनीति की ओर प्रेरित किया. इससे ग्रामीण समाज दो-फाड़ होने लगा. लेफ्ट के समय इस समर्थन से ही ग्रामीण इलाके की राजनीति तय होती थी. लेफ्ट का फार्मूला था कि या तो आप हमारे साथ हैं या फिर खिलाफ. तब तटस्थता नामक कोई चीज नहीं थी.

समाजशास्त्री आलोक बनर्जी कहते हैं, “बंगाल के युवा समाज में राजनीतिक जुड़ाव से ही सामाजिक पहचान तय होती है. छात्र राजनीति में होने वाली हिंसा से भी इस मानसिकता का पता चलता है.”

राजनीतिक विशेलषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की संवेदनशीलता का पता चुनावी नतीजों से मिलता रहा है. राज्य के लोग अक्सर एक ही पार्टी को भारी बहुमत देते रहे हैं. यही वजह है कि विपक्ष हमेशा कमजोर रहा है.

समाजशास्त्री दास कहते हैं, “कमज़ोर विपक्ष और भारी बहुमत सत्तारुढ़ दलों को हमेशा मनमानी करने का मौका देती रही है और कोई भी पार्टी इसमें पीछे नहीं रही है. दरअसल, बंगाल में चुनावों के बदलते स्वरूप और इसमें होने वाली हिंसा की एक प्रमुख वजह यह भी है.”

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राजनीति से गहरा लगाव

प्रोफेसर रणबीर समाद्दार कहते हैं, “साक्षरता दर अधिक होने, ब्रिटिश शासकों की पहली राजधानी होने और पुनर्जागरण काल की जन्मस्थली होने की वजह से बंगाल की राजनीतिक संस्कृति देश के दूसरे राज्यों से काफी भिन्न है.”

वैसे, वर्ष 1977 में लेफ्ट के सत्ता में आने के बाद बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बहुत कम हो गईं थी. वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद जब पूरे देश में ऐसे दंगे हो रहे थे, बंगाल में पूरी तरह शांति थी. लेकिन अब बीते पांच-सात वर्षों से बीजेपी के धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति में मजबूत होने की वजह से ऐसी घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं. दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी इन घटनाओं के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराती रही हैं.

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ पंडित कहते हैं, “बंगाल के युवावर्ग के लिए राजनीतिक निष्ठा उसकी सामाजिक पहचान की सबसे अहम शर्त बन गई है. यही वजह है कि कालेज और विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनावों के दौरान भी भारी हिंसा होती रही है.”

तो क्या बंगाल की राजनीति इसी ढर्रे पर चलती रहेगी? प्रोफेसर दास कहते हैं, “निष्ठाएं भले बदलती रहें, लेकिन राजनीति के प्रति बंगाली समाज में जो संवेदनशीलता है वह तो आने वाले दशकों में भी जस की तस रहेगी. इसकी वजह है कि भावी पीढ़ी भी राजनीतिक रूप से काफी जागरूक है.”

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