क्यों अमित शाह की पहली और भाजपा की दूसरी पारी को लेकर कश्मीर में डर भी है और उम्मीद भी

0
7

जम्मू-कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा और परिसीमन को लेकर गृहमंत्री अमित शाह लगातार बैठकें कर रहे हैं

बीती तीन जून की बात है. जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भारत के नए गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि कश्मीर एक राजनीतिक मसला है. अपने एक ट्वीट में उनका कहना था, ‘अमित शाह अगर सोच रहे हैं कि क्रूर ताकत से इसका तुरत-फुरत हल निकल आएगा तो ऐसी सोच बेतुकेपन की हद तक भोली है.’

इसका जवाब भी आया. हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर महबूबा मुफ्ती से अक्सर ही उलझने वाले भाजपा नेता और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर ने कहा ‘इतिहास हमारे सब्र और सहनशक्ति का गवाह रहा है. अगर उत्पीड़न ही हमारे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है तो वही सही.’

जानकारों की मानें तो दोनों बयानों के दो संकेत हैं. महबूबा का बयान भाजपा के फिर से केंद्र में सरकार बनाने और खास तौर पर अमित शाह के गृह मंत्री चुने जाने के बाद कश्मीर के लोगों में बढ़ रहे भय और असुरक्षा के भाव को दर्शाता है. वहीं गौतम गंभीर का बयान भाजपा सरकार की कश्मीर के प्रति नीति स्पष्ट करता है.

जम्मू-कश्मीर केंद्र सरकार के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है. भाजपा सरकार के लिए इस राज्य का महत्त्व इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि अमित शाह ने गृह मंत्री बनने के घंटों बाद ही अपनी पहली बैठक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के साथ की. इसके बाद भी वे इस सूबे को लेकर बैठकें कर रहे हैं.

मसला लेकिन यह है कि भाजपा के लिए कश्मीर का यह महत्त्व कश्मीर के लोगों में भय और असुरक्षा का भाव जगाता है. इसकी वजह पूछने पर लेखक और कश्मीर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के अध्यापक एजाज अशरफ वानी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘भाजपा की कश्मीर को लेके जो विचारधारा है वो किसी से ढकी-छुपी नहीं है. चाहे वो सुरक्षा मामलों को लेके हो या राजनीतिक मामलों को लेके, जिनमें अनुछेद 370 और 35-ए को लेके भाजपा का रुख शामिल है.’

तो अगर सटीक लफ्जों में बात कहनी हो तो यह कि कश्मीर के लोग दो बातों को लेकर भयभीत हैं. एक, भारत के संविधान में जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे के साथ संभावित छेड़छाड़ और दूसरा यहां चल रही मिलिटेंसी को खत्म करने के लिए अपनाया जाने वाला कड़ा रुख.

पहले अनुछेद 370 और 35-ए की बात करते हैं. हाल ही में हुए चुनाव-प्रचार के दौरान अमित शाह ने बार-बार यह दोहराया था कि उनकी पार्टी 2020 में राज्यसभा में बहुमत मिलने के साथ ही अनुछेद 370 और 35-ए दोनों को खत्म कर देगी. आम चुनाव में यहां के दो मुख्य राजनीतिक दलों – नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने अपना चुनाव प्रचार भी इसी मुद्दे को केंद्र बनाते हुए किया. दोनों दलों के नेताओं का कहना था कि जम्मू-कश्मीर भारत से 370 की वजह से ही जुड़ा हुआ है और इसको खत्म करने का मतलब है कि जम्मू-कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा.

जहां केंद्र सरकार ने फिलहाल इस बात पर चुप्पी साधी हुई है वहीं भाजपा के जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष रविंदर रैना ने चुनाव में जीतने के फौरन बाद उम्मीद जताई कि ये दोनों अनुच्छेद जल्द ही खत्म कर दिए जाएंगे. उनका कहना था, ‘जहां 35-ए एक संवैधानिक भूल थी तो 370 एक नफरत की दीवार है.’ जानकारों के मुताबिक अब जैसे-जैसे भाजपा इस मुद्दे को तूल देती जाएगी वैसे वैसे कश्मीर में एक अनिश्चितता का माहौल भी गहराता जाएगा, भले ही इन दोनों अनुच्छेदों के साथ वाकई में छेड़छाड़ होती है या नहीं.

उधर, कश्मीर में विशेषज्ञों की राय बटी हुई है. जहां कुछ लोग यह कहते हैं कि भाजपा वाकई ऐसा कदम उठा सकती है, वहीं कुछ यह मानते हैं कि यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है. उदाहरण के लिए राजनीतिक टिप्पणीकार शाह अब्बास मानते हैं कि भाजपा 370 और 35-ए को हटाने के लिए बिलकुल कदम उठा सकती है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘जैसे इनकी कश्मीर नीति रही है अभी तक, मुझे कोई हैरत नहीं होगी कि लोग दोनों अनुच्छेदों को हटाने की कोशिश करें. फिर इस सब का कश्मीर में क्या असर रहेगा वो अलग देखने वाली बात होगी.’

अब्बास की बातों से सहमति जताते हुए एजाज अशरफ वानी भी कहते हैं कि ऐसा बिलकुल हो सकता है. उनका कहना है, ‘हिंदुत्ववादियों की हमेशा आकांक्षा रही है कि केंद्र में एक मजबूत सरकार आए जो इन मुद्दों को वैसे संभाले जैसे वे चाहते हैं. अब इनका टाइम आया है. मुझे लगता है वैसा ही होगा जैसा ये हिंदुत्ववादी ताक़तें चाहती हैं.’

हालांकि, ऐसा न मानने वालों का भी एक खेमा है. राइजिंग कश्मीर अखबार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार फैसल यासीन उम्मीद जताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हाल ही में दिये गए भाषण पर अमल करेंगे जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात की थी. वे कहते हैं, ‘अल्पसंख्यकों में कश्मीर के मुसलमान भी आते हैं और मोदीजी को चाहिए कि यहां के लोगों को, जो पिछले पांच साल से केंद्र की क्रूर ताकत वाली नीति के चलते पिस रहे हैं, थोड़ी राहत दी जाए.’ फैसल साथ ही साथ यह भी कहते हैं कि अगर भारत सरकार को लगता है कि ‘डंडे’ वाली नीति कश्मीर में कोई सुधार ला सकती है तो वे गलतफहमी में हैं.

अब चाहे ऐसा कुछ हो या न हो, कश्मीर में आम जनता काफी परेशान है. सत्याग्रह ने पिछले एक हफ्ते के दौरान दर्जनों आम लोगों से बात की और सब का मानना यही है कि भाजपा की तरफ से कोई भी ‘गलत’ कदम पहले से झुलस रहे कश्मीर को पूरा बर्बाद कर छोड़ेगा. ऐसे ही एक शख्स का कहना था, ‘हम उम्मीद करते हैं कि कश्मीर में अमन सुकून आए, लेकिन ये भी लगभग तय है कि जो रास्ता कश्मीर को लेके भाजपा ने पकड़ रखा है, इससे वो नहीं आने वाला.’

यह तो थी बात आने वाले कल को लेके चिंताओं और आशंकाओं की. अब बात करते हैं उसकी जो पिछले एक दो साल से घाटी में घट रहा है. 2018 में कश्मीर घाटी में 400 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. इनमें आधे से ज़्यादा मिलिटेंट थे. इस साल अभी तक 100 से ज़्यादा मिलिटेंट मारे जा चुके हैं और अगर सिर्फ हाल में बीते रमज़ान के महीने की बात करें तो 31 लोग मारे गए हैं. इनमें 25 मिलिटेंट हैं, तीन सुरक्षाकर्मी और तीन असैनिक शामिल हैं.

कश्मीर के राजनेताओं ने ‘रमज़ान संघर्ष विराम’ की अपील की थी. लेकिन भारत सरकार ने इसे खारिज करते हुए मिलिटेंसी के खिलाफ चल रहे अभियान को और तेज़ कर दिया. रमज़ान के महीने के दौरान और उसके बाद भी लगभग हर दूसरे दिन दक्षिण कश्मीर में कहीं न कहीं मुठभेड़ और उसके बाद मिलिटेंट्स के जनाज़ों में उमड़ती भीड़ ने सामान्य जीवन को हिला कर रख दिया है.

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘नतीजा यह है कि कश्मीर के लोग नई दिल्ली से और दूर होते जा रहे हैं. और मारे गए मिलिटेंट्स के जनाज़ों में उमड़ती भीड़ को देख के यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लोगों में किस कदर गुस्सा है.’

एक और चीज़ जो लोगों का गुस्सा दिखाती है, वह है हथियार उठाने वाले नए लड़के. इसके बावजूद कि 2018 से अभी तक 300 से ज़्यादा मिलिटेंट मारे जा चुके हैं, सिर्फ पिछले कुछ महीनों में 50 से ज़्यादा नए लड़कों ने हथियार उठा लिए हैं. फैसल यासीन कहते हैं, ‘मसला वही है. ये सोचने की गलती करना कि शायद मिलिटेंट्स को मार देने से हालात ठीक हो जाएंगे. ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा. हर मिलिटेंट के जनाज़े से दो और मिलिटेंट निकलते हैं.’ वे मानते हैं कि आगे की तरफ एक ही रास्ता है और वह रास्ता बातचीत का है, सभी पक्षों के साथ. यासीन कहते हैं, ‘मैं फिर दोहरा रहा हूं. ये सोचना कि ताकत से कश्मीर का मसला हल हो सकता है सरासर बेवकूफी है.’

एक और बात जो कश्मीर में लोगों को चुभ रही है वह है धार्मिक संगठन जमाते इस्लामी, पर लगाया गया प्रतिबंध. इसे लोग धर्म के मामले में दखलंदाजी के रूप में देखते हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘फिर जो अलगाववादी नेताओं के साथ पिछले दो साल में हो रहा है वो भी सबके सामने है. ये सब चीज़ें मिल के कश्मीर के आम नागरिकों को नई दिल्ली से कोसों दूर कर रही है. ज़रूरत एक ऐसी नीति की है जिससे कश्मीर और नई दिल्ली के बीच की दूरी कम हो.’

खैर, कश्मीर में चाहे लोग जो भी सोचें, होगा वही जो केंद्र सरकार चाहेगी और जो उसकी कश्मीर को लेकर नीति होगी. और फिलहाल भाजपा किसी से भी बातचीत के मूड में नज़र नहीं आ रही है. लेकिन इससे जहां कश्मीर के लोगों में भय है वहीं एक उम्मीद भी है.

ADVERTISEMENT

उम्मीद की किरण

कश्मीर में एक बात हमेशा दोहराई जाती है और वह यह कि अगर कश्मीर का कभी कोई समाधान होना होगा तो वह तब होगा जब भाजपा की सरकार केंद्र में होगी. कश्मीर में सिविल सर्विस की तैयारी करवाने वाले इम्तियाज़ शेख सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘कश्मीर के लोगों की इस उम्मीद को और पुख्ता प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कश्मीर नीति ने किया था. और अभी भी लोग उस उम्मीद को नहीं छोड़ना चाहते.’

सेंट्रल यूनिवर्सटी ऑफ कश्मीर में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले नूर अहमद बाबा भी यही उम्मीद जताते हैं. उनके मुताबिक भाजपा की कश्मीर को लेकर विचारधारा जो भी रही हो, सरकार में आने के बाद पार्टी का रुख व्यावहारिक हो जाता है. वे कहते हैं, ‘वाजपेयी को देख लें तो पता चलता है कि वो कश्मीर को लेके काफी व्यावहारिक रहे हैं. सेकुलर मानी जाने वाली कांग्रेस से भी ज़्यादा.’

बाबा साथ ही साथ यह भी मानते हैं कि नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी से अलग हैं और वे अपने फैसले खुद लेते हैं. वे कहते हैं, ‘देखते हैं क्या होता है आगे.’ उनकी बात को पूरा करते हुए एजाज अशरफ वानी कहते हैं कि मोदी के लिए इतने भारी बहुमत से एक और चुनाव जीत लेने के बाद आगे सिर्फ एक रास्ता बचा है और वह है वैश्विक नेता यानी ‘ग्लोबल लीडर’ के तौर पर उभरना. ‘और वो तभी मुमकिन है जब वे कश्मीर पे ठीक से सोच-विचार करके फैसले लें. उनके अच्छे फैसले पूरे दक्षिण एशिया को शांति और स्थिरता की तरफ ले जा सकते हैं,’ एजाज अशरफ वानी कहते हैं. उनके मुताबिक यह देखने वाली बात होगी कि क्या नरेंद्र मोदी एक ‘ग्लोबल लीडर’ के रूप में उभरने के लिए तयार हैं या नहीं.

अब आगे जो भी हो, एक चीज़ तय है कि कश्मीर के लिए आने वाला समय काफी दिलचस्प होने जा रहा है. कश्मीर किस तरफ बढ़ेगा, यह सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार की नीति पर निर्भर करने वाला है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here