अथश्री प्रयाग कथा : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्रों के मजेदार किस्से

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‘अथश्री प्रयाग कथा’ इलाहाबाद में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के ‘धर्म’ ‘अर्थ’ ‘काम’ और ‘मोक्ष’ तक पहुंचने की मजेदार यात्रा है

इसी पुस्तक का एक अंश :

‘हॉबी’ तो उनकी कुछ भी नहीं थी, लेकिन मना करने से चलेगा नहीं…गार्डनिंग कैसा रहेगा…बोर्ड ने पिटूनिया फूल की वैरायटी पूछी थी, फिर उसका ब्लूमिंग सीजन पूछा. तो जवाब में यादौ, बोर्ड का मुंह ताकने लगे…एक मेंबर ने उन्हें एक आखिरी चांस देते हुए कहा, गो आउटसाइड एंड सी द फ्लावर-पॉट्स. देन टेल अस द नेम्स ऑफ द फ्लावर्स.

बाहर भेजे तो वापसै नहीं बुलाए. प्रेषक ने दूसरे एक्सपर्ट से धीमे से कहा कि ‘आइ स्मेल दि ऑफिसर लाइक क्वालिटीज.’ यादौ बाहर जाते हुए सुन लिये थे…इसलिए कुछ ज्यादा रोष में भरे हुए थे. खासतौर पर सूंघकर बता देते हैं, पर उन्हें खासा एतराज रहा. …कौनों आदमी सूंघि के कइसे बता दी. अइसे तो, कूकूर ही बता सकेला. का ई कूकूर बा!’


पुस्तक : अथश्री प्रयाग कथा

लेखक : ललित मोहन रयाल

प्रकाशन : प्रभात पेपरबैक्स प्रकाशन

कीमत : 200 रुपए


व्यक्ति की तरह हर गांव, शहर और देश का भी अपना एक अलग खास रंग, रूप, मिजाज होता है. जैसे कुछ व्यक्तियों के खास प्रभाव में हम ताउम्र रहते हैं ठीक वैसे ही कुछ गांव, शहर या देश भी होते हैं जिनका असर तमाम उम्र हमारे जेहन में रहता है. यादें सिर्फ अच्छी ही हों ये कोई जरूरी नहीं. वे बुरी या फिर खट्टी-मीठी भी हो सकती हैं. ऐसी तमाम तरह की यादें जब लंबे समय के बाद लौटती हैं तो हंसी-मजाक या व्यंग्य की शक्ल ले लेती हैं. तब उन पर खुद हंसा जा सकता है और दूसरों को हंसाया भी जा सकता है.

मूलतः संगम के लिए पहचाना जाने वाला प्रयाग (इलाहाबाद) ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का प्रसिद्ध गढ़ भी है. यहां वे बड़ी-बड़ी परीक्षाओं के किले फतह करने के इरादे से लंबे समय तक मैदान में डटे रहते हैं. ‘अथश्री प्रयाग कथा’ प्रयाग शहर के ऐसे ही एक रणबांकुरे ललित मोहन रयाल द्वारा लिखी गई है. उन्होंने यहां अपने समय के बाकी ‘रणवीरों’ द्वारा परीक्षाओं के गढ़ पर चढ़ाई करने के उनके शौर्य को खासे चुटीले अंदाज में दर्ज किया है.

परीक्षा चाहे स्कूल की हो, कॉलेज की या फिर प्रतियोगी परीक्षा, ज्यादातर छात्र कभी भी उत्तर पुस्तिकाओं में मिले नम्बरों से संतुष्ट नहीं होते और परीक्षक कभी भी छात्रों द्वारा दिये गए जवाबों से संतुष्ट नहीं होते. छात्र हमेशा चैकिंग में खोट निकालते हैं और परीक्षक नम्बर कुछ इस अंदाज में देते हैं कि जैसे नम्बरों का सीधा संबंध उनके बैंक अकाउंट से हो! उत्तर पुस्तिकाओं को जांचने के इसी अंदाज को लेकर लेखक के कॉलेज में एक अध्यापक काफी नाम कमा चुके थे. उन्हीं का जिक्र करते हुए ललित लिखते हैं –

‘वे होते तो, ‘पर्चवा’ निर्ममतापूर्वक चेक करते. अपनी खास ‘ललकी कलमिया’ से ही चेक करते थे. गलत जवाब पर बहुत बड़ा काटे का निशान लगाते थे. मरजीना की तरह. जीरो भी बहुत बड़ा धरते थे. बड़े निष्ठुर थे. बर्बर हमलावर की तरह, भयंकर मार-काट मचाते थे. जो सवाल उनको नहीं बुझाता था, उसके शाश्वत गलत होने की घोषणा कर डालते थे. डाउटफुल को भी बट्टे खाते में डाल देते थे. प्रश्न-पत्र जांचने में अभी तक, उनकी अभूतपूर्व प्रतिष्ठा बनी हुई थी… फेल किए बिना सर का खाना हजम नहीं होता. उनकी जांच का दायरा बेहद सख्त और कसा हुआ पाया जाता था. उस घेरे से विरले ही निकल पाते थे… गुड्डू सर की मार्किंग में पास कैंडिडेट को यूएन भी फेल नहीं कर सकता.’

व्यंग्य या हंसी-मजाक के बारे में बात करते हुए अक्सर सहज, सरल भाषा का प्रयोग करना ज्यादा प्रभाव पैदा करता है. कठिन भाषा के कारण न सिर्फ बात समझने में दिक्कत आती है, बल्कि हंसी, मस्ती में जो हल्कापन होता है वह भी चूकने लगता है. ललित मोहन रयाल ने हंसाने-गुदगुदाने के लिए एक बहुत ही दिलचस्प विषय चुना है और उसे काफी विस्तार से गुना-बुना है. प्रयाग के छात्रों द्वारा बोली जाने वाली अवधी के खास तड़के ने इस किताब के स्वाद को काफी बढ़ाया है. लेकिन वह सुसंस्कृतनिष्ठ हिन्दी के प्रयोग कई जगह कम भी होता है. कुछ उदाहरण –

‘वस्तुतः उसने झूठ नहीं बोला था. आधा घंटा पहले पांच गिलास पानी पिया था…संकेत भाषा का सूत्रपात जब-जब होता है, उसे विरले ही समझ पाते हैं…दुस्साहसी तो वे थे ही, ब्वायज वे पासआउट भी थे. यह उनका अतिरिक्त गुण था. अतः दोनों में दृष्टि-विनिमय होना नियत था, जो इस दुर्लभ घड़ी में अवश्यंभावी हो चुका था.’

या एक दूसरा उदाहरण

‘वे वैसी ही प्रतिक्रिया देना चाहते थे, जैसै ब्यूटी कांटेस्ट का परिणाम सुनकर, विजेता-सुंदरी दिया करती हैं-अश्रुपूरित हर्ष वाली विस्मयबोधक भंगिमा.’

लेखक ने जिस अवधी टोन का टच पूरे संस्मरण दिया है, उसके कारण यह काफी रोचक और जीवंत बन गया है. लेकिन शुद्ध हिन्दी के ज्यादा प्रयोग के कारण पाठकों का प्रवाह बार-बार टूटता सा नजर आता है. फिर भी प्रयाग (इलाहाबाद) में रहे छात्रों और खासतौर से वहां रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले इस किताब को पढ़कर नॉस्टेलजिक हो जाएंगे. ललित मोहन रयाल ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले इलाहबदिया छात्रों के सोच-विचारों को किसी मनोविज्ञानी की तरह परखा है. प्रतियोगी छात्रों के दिमागी रेशों को लेखक ने काफी बारीकी से पकड़ा है और रोचक अंदाज में पेश किया है.

‘अथश्री प्रयाग कथा’ प्रतियोगी छात्रों की मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक यात्रा को दिलचस्प तरीके से दर्ज करती है. संक्षेप में यह किताब प्रयाग में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते छात्रों के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का मजेदार बयान है. इससे गुजरना प्रयाग के प्रतियोगी छात्रों के भीतरखाने में झांककर छात्रमय हो जाना है.

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