बजट में नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ क्यों ?

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मांग का क्या होगा, ग्रोथ का क्या होगा, रोज़गार का क्या होगा?

बजट के पहले सबके मन में यही सवाल थे और उम्मीद थी कि साफ़ जवाब मिलेंगे. ज़्यादा आशावादी लोग कुछ ऐसी धमाकेदार घोषणा सुनने की तैयारी में थे जिनसे अर्थव्यवस्था की तस्वीर ही बदल जाएगी.

उन सवालों का तो कोई साफ़ जवाब दो घंटे 41 मिनट के भाषण में मिला नहीं. दीनानाथ कौल की कश्मीरी कविता और तमिल में तिरुवल्लुवर और संस्कृत में कालिदास के उद्धरण भी सुनने को ज़रूर मिल गए. इतिहास पर भी ज्ञान मिला और ये भी पता चला कि सिंधु सभ्यता से भी व्यापार की प्रेरणा ली जा सकती है.

इनकम टैक्स में विकल्प दे दिया गया है कि आप चाहें तो टैक्स पर मिलने वाली छूट को त्याग दें और बदले में क़रीब पांच फ़ीसदी कम टैक्स भरें.

ये चुनाव आपको ही करना है और ये चुनाव कर कोई भी सकता है, लेकिन पंद्रह लाख रुपए से ऊपर की कमाई पर टैक्स का रेट भी नहीं बदलेगा. इसलिए ऐसी उम्मीद नहीं है कि सबसे ज्यादा रेट पर टैक्स भरनेवाले यानी टॉप टैक्स ब्रैकेट वाले लोगों में से कोई इस तरफ़ झुकेगा.

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दूसरी तरफ़ ढाई से पांच लाख रुपए कमानेवाले लोग आसानी से ये रास्ता चुन सकते हैं. ख़ासकर वे जिन्होंने अभी काम शुरू किया है और जिनके ऊपर न तो होम लोन का बोझ है, न ही उन्होंने टैक्स बचाने के लिए कोई इंश्योरेंस पॉलिसी या ऐसा कोई इंतजाम किया हुआ है जिसमें उन्हें हर साल पैसा भरना पड़ता हो.

एकदम फूल प्रूफ फॉर्मूला

इनके लिए नया फॉर्मूला पहली नज़र में ही अच्छा दिख रहा है. वित्त मंत्री ने उन्हें ललचाने के लिए कह भी दिया कि 15 लाख कमाने वाले की इस तरह 73 हज़ार रुपए की बचत हो सकती है. यानी आज ये रास्ता पकड़ लो तो कमाई 15 लाख होने तक फ़िक्र भी नहीं करनी है. रिटर्न भी पहले से भरा हुआ मिलेगा तो मेहनत भी बच गई.

अब क्या है, फोन उठाओ स्विगी बुलाओ या ऊबर ईट्स पर ऑर्डर दे डालो. इतना बचा है, खर्च नहीं करोगे? देश में खपत भी तो बढ़ाना है. खर्च करोगे तभी तो अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी. एकदम फूल प्रूफ फॉर्मूला है न! आपकी बचत और देश की तरक्की एक साथ, स्वाद ऊपर से.

काश ऐसा ही होता.. लेकिन ऐसा है नहीं. इस सबके बीच जो बात कही नहीं गई, मगर जरा सा सोचने पर समझ में आ रही है वो ये है कि ये रास्ता अंधेरे भविष्य की ओर जाता है. टैक्स में ये छूट इसलिए दी जाती थी कि सरकार बचत की आदत को बढ़ावा देना चाहती थी.

इससे दो फायदे थे. जिसकी बचत होती थी उसे आज टैक्स में छूट और भविष्य में एक मोटी रकम मिलती थी और सरकार को भी कुछ ऐसी रकम कर्ज के तौर पर मिल जाती थी जिसकी वापसी की तारीख भी तय थी और जो बाजार के रेट के मुकाबले कम ब्याज पर भी मिल रही थी. जबकि जमा करनेवाले के लिए ये ब्याज भी कम नहीं था क्योंकि साथ में टैक्स पर छूट का हिसाब भी जुड़ जाता था.

अब ये छूट नहीं मिलेगी तो लोगों के पास कोई आकर्षण नहीं रहेगा. न ही कोई मजबूरी और इसका खामियाजा उन्हें जब समझ में आएगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

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टैक्स एक्सपर्ट शरद कोहली का कहना है कि ये फैसला या ये रास्ता खासकर उन नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जो अभी कमाना शुरू कर रहे हैं. उन्होंने एक रोचक आंकड़ा भी दिया.

बताया कि जीवन बीमा या लाइफ इंश्योरेंस की सत्तर परसेंट पॉलिसियां जनवरी से मार्च के बीच में बिकती हैं. यही वो समय होता है जब शरद जैसे सलाहकार लोगों को टैक्स बचाने के नुस्खे दे रहे होते हैं.

उनका कहना है कि अधिकतर मामलों में पंद्रह बीस साल बाद ऐसे ही लोग उनके सामने आभार जता रहे होते है कि आपने ये न करवाया होता तो आज ये पैसा न होता. और इससे भी ज्यादा आभार जतानेवाले वो बदनसीब परिवार होते हैं जिनका कमानेवाला पॉलिसी करवाने के बाद किस हादसे का शिकार हो चुका होता है.

इसीलिए जरूरी है कि सरकार इस मामले पर फिर विचार करे और अपने आप को ही इस सवाल का जवाब भी दे कि एक तरफ वो इन्फ्रास्ट्रक्चर में पैसा लगाने वाले 100 परसेंट विदेशी फंडों का पूरा टैक्स माफ करने को तैयार है तो भारत में नौजवानों के भविष्य को सुरक्षित करने वाले इस रास्ते को बंद करके उनके साथ ये खिलवाड़ क्यों कर रही है?

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