बजट: मोदी सरकार के आर्थिक सर्वे में भी सब चंगा सी

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सब चंगा सी वाला आर्थिक सर्वे आ चुका है. इसके हिसाब से जहां भी आपको गड़बड़ी दिख रही है उसमें या तो कुछ नया नहीं है पहले से चल रहा है या देखने का तरीक़ा ठीक नहीं है. यानी अपना चश्मा बदलिए या फिर इसके लिए दुनिया की हालत ज़िम्मेदार है. इसके बावजूद सर्वे ये मानता है कि चालू साल में जीडीपी के बढ़ने की दर पांच फ़ीसदी ही रह पाएगी. अगले साल यानी 2020-21 के लिए उसका कहना है कि हालात सुधरेंगे और ये दर छह से साढ़े छह फ़ीसदी तक जा सकती है. अभी थोड़ा सा ज़ोर डालिए और याद कीजिए कि यही सरकार कितने तेज़ विकास का दावा कर रही थी. इसी सरकार ने 2025 तक पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है. फिर हुआ क्या, क्यों हुआ और कैसे हुआ इस पर बहुत आंसू बहाए जा चुके हैं. आगे भी बहाए जाएंगे. लेकिन एक बात ज़रूरी है. इस सरकार के पिछले कार्यकाल में विकास की रफ़्तार क्या थी और अब अगर ये छह से साढ़े छह फ़ीसदी का लक्ष्य रख रही है तो आपको क्या समझना चाहिए?

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Image captionमुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यम

आप ये जानकर हैरान होंगे कि ख़ासकर हमारे आपके जैसे टैक्स भरनेवालों और कुछ सरकारी कंपनियों के ख़ज़ाने की बदौलत सरकार की कमाई, पिछले पाँच साल यानी इस सरकार के पहले कार्यकाल में 2014 से 2019 के बीच 10.4 लाख करोड़ से पूरे 73 फ़ीसदी बढ़कर 18.1 लाख करोड़ रुपए हो चुकी थी. यानी सालाना साढ़े ग्यारह फ़ीसदी से ज़्यादा की बढ़त जबकि इतने ही वक्त में सरकार का खर्च सालाना क़रीब साढ़े नौ फ़ीसदी की रफ्तार से बढ़ा और 15.5 लाख करोड़ रुपए से 24.4 लाख करोड़ पर पहुंचा. यानी कमाई के मुक़ाबले खर्च के बढ़ने की रफ्तार कम होने के बाद भी सरकार ने अपनी कुल कमाई से करीब 35 फ़ीसदी ज्यादा खर्च किया. ये रक़म छह लाख तीस हजार करोड़ रुपए है और इसी को फिस्कल डेफिसिट या सरकारी घाटा कहते है. ये आँकड़ा पिछले बजट में बताया गया संशोधित अनुमान है. अब पता चलेगा कि ये अनुमान कितना कम या ज़्यादा होगा. हालांकि सरकार चाहती तो ये थी कि इस दौरान कमाई 12 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ाकर 20 लाख करोड़ से ऊपर पहुंचाई जाए ताकि वो 27 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का खर्च भी कर सके. लेकिन आँकड़े बताते हैं कि ये हो न सका. अब चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में ही सरकार का खर्च 18.2 लाख करोड़ पर पहुंच गया था. यानी साल भर के खर्च का क़रीब दो तिहाई. वहीं इसी दौरान कमाई हुई महज़ दस लाख करोड़ जो कि साल के लक्ष्य का आधा भी नहीं था.

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पिछले पांच साल का रिकॉर्ड देखें तो ये पता चलता है कि सरकार की कमाई जिस वक़्त सालाना 11.6 फ़ीसदी की रफ्तार से बढ़ी उसी दौरान देश की जीडीपी बढ़ने की रफ्तार भी 11.1 फ़ीसदी के आसपास रही. यहाँ ये बात ध्यान रखिएगा कि ये जीडीपी नॉमिनल है यानी इसमें आज के भाव पर ही बढ़त को आंका गया है, महंगाई का आँकड़ा इसमें से कम नहीं किया गया है. जब इसमें से महंगाई को घटाकर आंका जाता है तब उसे असल जीडीपी कहा जाता है. उसी के बढ़ने की रफ़्तार इस वक़्त पाँच फ़ीसदी के नीचे पहुंची है. लेकिन यहां समझने वाली बात ये है कि जीडीपी और सरकारी कमाई के बढ़ने की रप़्तार कमोबेश एक सी रहती है. इस साल तो केंद्र सरकार के ही संस्थान सीएसओ यानी केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के हिसाब से ही नॉमिनल जीडीपी की रफ़्तार गिरकर साढ़े सात फ़ीसदी तक रहने का अनुमान है. इसका एक मतलब तो साफ़ है कि सरकारी घाटा उससे कहीं ज्यादा होगा जिसका अनुमान था और जो लक्ष्य था उसे तो भूल ही जाएं. ऐसे में एक सवाल ये है कि सरकार जो छह से साढ़े छह फ़ीसदी की ग्रोथ का अनुमान दिखा रही है ये नॉमिनल जीडीपी होगी या रियल? दूसरा अगर हालात ऐसे हैं तो पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य हासिल करने की तारीख़ पीछे खिसकाई जाएगी. पांच ट्रिलियन को अगर किनारे भी रख दें, तब भी ये तो साफ़ है कि इस वक़्त किंतु परंतु छोड़कर सारा ज़ोर ग्रोथ वापस लाने पर ही लगाना है. अब इसके लिए अलग-अलग लोग अलग-अलग सुझाव दे रहे हैं. ग्रोथ बढ़ाने के सारे सुझाव ऐसे हैं जिनसे सरकार की कमाई कम होगी और खर्च बढ़ेगा.

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अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकार पैसा जुटाने का कोई नया रास्ता निकाल लेगी? ये सवाल आने के दो कारण हैं. एक तो ये कि पिछले कुछ समय में वित्तीय बाज़ार के कुछ बड़े जानकार सरकार के सलाहकारों में शामिल हुए हैं और इस बात की पूरी उम्मीद है कि वो सरकार को कुछ ऐसे रास्ते सुझा चुके होंगे. अब ये सरकार पर है कि वो इसे मानती है या नहीं और किस हद तक लागू करती है. इसमें सोने की खऱीद बिक्री, खेती की आमदनी, इनकम टैक्स में कटौती, शेयर बाज़ार को ख़ुश करने वाले फैसले, सरकारी कंपनियों और सरकारी संपत्ति की बिक्री जैसे कई मामले शामिल हैं. इन सबमें सरकार को सिर्फ़ अपना रवैया बदलना है, और उससे ही फ़र्क़ आ जाएगा. रवैया बदलने में ही ये बात भी आती है कि सरकार आधे-अधूरे मन से नहीं, जो करे पूरे दम से करे. यानी लोगों को ये यक़ीन होना ज़रूरी है कि इस बार सरकार ने कमर कस रखी है. ऐसा हुआ तभी इस मुसीबत की घड़ी से निकलने का रास्ता दिखेगा. तभी नए रोज़गार पैदा होंगे, लोग खर्च बढ़ाएंगे और वही खर्च इकोनॉमी के इंजन में पेट्रोल का काम करेगा.

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