मदद के नाम पर कन्वर्जन में लगीं ईसाई मिशनरी- कोरोना संकट में गरीब दलितों की मजबूरी का फायदा उठा रहा चर्च

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उत्तराखंड में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोगों के बीच में अचानक ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों में तेजी आई है। राज्य के विभिन्न वनवासी इलाकों में कोरोना संकट की आड़ में ईसाई संस्थाए राशन बांटने, चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर जरूरतमंदों एवं अनुसूचित जाति वर्ग को बरगलाने और चोरी—छिपे उनके कन्वर्जन में लगी हुई हैं।

उत्तराखंड में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोगों के बीच में अचानक ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों में तेजी आई है। राज्य के विभिन्न वनवासी इलाकों में कोरोना संकट की आड़ में ईसाई संस्थाए राशन बांटने, चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर जरूरतमंदों एवं अनुसूचित जाति वर्ग को बरगलाने और चोरी—छिपे उनके कन्वर्जन में लगी हुई हैं। उत्तराखंड के उधमसिंह नगर, देहरादून, नैनीताल, हरिद्वार, अल्मोड़ा, पौड़ी आदि जिलों में मिशनरियों की गतिविधियों को न केवल संदेह की नजरों से देखा जा रहा है, बल्कि कन्वर्जन से जुड़ी शिकायतें भी आ रही हैं। उधमसिंह नगर जिले में खटीमा अमाउ चर्च, मैथिस्ट चर्च, नैनीताल जिले में मैथिस्ट चर्च और जीवन दान अस्पताल जैसी संस्थाएं कोरोना संकट में दलित गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें कन्वर्जन की ओर ले जा रही हैं।

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हाल ही में उत्तराखंड में दो—तीन ईसाइयत से जुड़ी विदेशी संस्थाओं ने अपने चोले बदल कर यहां के स्थानीय लोगों को बरगलाने का काम शुरू किया है। गुड न्यूज फ़ॉर इंडिया नाम की संस्था की वेब साइट (www.goodnewsforindia.org ) पर जाकर देखें तो इस संस्था के कार्यकलापों पर संदेह किया जा सकता है।

यह मिशनरी संस्था भारत में 680 चर्चों की स्थापना की योजना पर काम कर रही है। साथ ही संस्था की वेब साइट पर यह भी दर्ज किया गया है कि  भारत में अब विदेशी मिशनरियों का काम करना मुश्किल कर दिया गया है क्योंकि, यहां अब हिन्दू अतिवादिता तेजी से बढ़ रही है। संस्था यह भी योजना रखती है कि कैसे वह ईसाई मत अपनाने वालों के बीच काम करके चर्च के माध्यम से ईसाई लीडर शिप तैयार कर सके। इसके लिए इसका ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चल रहा है। गुड न्यूज फ़ॉर इंडिया के बोर्ड सदस्य कैलीफोर्निया, जॉर्जिया आदि देशों से ताल्लुक रखते हैं। भारत में कहां—कहां ईसाई हैं, कहां—कहां इसे बढ़ाने की जरूरत है, इस का सारा जिक्र इसकी कार्य योजना में दर्ज है।

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इस वक्त यह एनजीओ के रूप में राजस्थान, पंजाब, हिमाचल, यूपी, दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में अपने पैर जमा चुकी है और पिछले दस सालों से उत्तराखंड में भी सक्रिय है। गुड न्यूज फ़ॉर इंडिया कहीं खुद से अपना काम करती है तो कहीं वह स्थानीय संस्थाओं को अपना विंग बनाकर काम कर रही है और उनको गाइड लाइन्स और फंडिंग भी प्रदान करती है। इसके अलाबा संस्था की योजना 222 स्थानीय भारतीय भाषाओं में बाइबल का प्रकाशन करने की भी है। साथ ही चर्चों में पादरी स्थानीय लोग ही बनें, ऐसी कोशिशों में संस्था पिछले दो दशकों से काम कर रही है।

 कहां खर्च हो रहा विदेशों से आने वाला पैसा

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उत्तराखंड में भारत सुसमाचार समिति नाम की संस्था की गतिविधियों को भी संदेह की नज़रों से देखा जा रहा है। हर साल करोड़ों रु की विदेशी मिशनरियों से सहायता आखिर खर्च कहां हो रही है यह बड़ा सवाल है। कुछ साल पहले इस संस्था की विदेशों से आने वाली सहायता की आयकर विभाग ने जांच भी की थी। उत्तराखंड में पिछले कई सालों से नैनीताल जिले के सात ताल इलाके में मैथदिष्ट चर्च जिसे अब सातताल आश्रम कहा जाने लगा है ने आजादी से पूर्व के अभिलेखों के आधार पर सातताल के गरुड़ ताल और उससे लगी हज़ारों कनाल ज़मीन को अपना बता कर दावा किया हुआ है और इस जमीन पर क्रॉस लगा दिया है।

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जबकि आज़ादी से पूर्व अंग्रेज चले गए तो सारी ज़मीन भू राजस्व के खातों में दर्ज हो गयी थी। परंतु कांग्रेस शासन काल में ये ईसाई लॉबी के दबाव में विवाद उभरा और अभी तक उत्तराखंड शासन में लंबित पड़ा हुआ है। यहां सातताल आश्रम के साथ यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन ने भी अपने सेंटर स्थापित कर लिए है।

जहां से पूरे कुमाऊँ में ईसाई मत प्रचार की गतिविधियों का संचालन होता रहा है। उत्तराखंड के दलित—पिछड़े वर्ग में ही नहीं बल्कि अब पंजाब से आने वाले ईसाई मिशनरी सिख वेश भूषा में तराई के सिख पंथ से जुड़े लोगों के बीच कन्वर्जन की गतिविधियों का संचालन करते देखे गए हैं।

हाल ही में कोरोना संकट में नेपाल बॉर्डर से लगे खटीमा क्षेत्र में होली फैमिली चर्च, अवर लेडी ऑफ लॉर्ड्स, चर्च ऑन बर्ड आदि के पास्टरों ने लॉक डाउन के दौरान जनजाति लोगों की मजबूरी का खूब फायदा उठाया है। खटीमा के पास सितारगंज औद्योगिक क्षेत्र में काम के अभाव वाले मजदूरों के बीच भी राशन बांट कर उन्हें चर्च से जोड़ने का अभियान शुरू किया गया। बहरहाल उत्तराखंड इन दिनों ईसाई मिशनरियों के निशाने पर है। गांव—गांव में गुपचुप काम तेजी पकड़ रहा है।

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