कोरोना काल में अर्थव्यवस्था: ऐसे ही स्थिर रहा रुपया तो क्या सुधरेंगे हालात

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2020 की शुरुआत की बात है, डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कीमत 71.3 थी और आज के मुकाबले ये मज़बूत स्थिति में था.

लेकिन मार्च महीने के आते-आते कोरोना वायरस के कारण दुनिया के कई देश एक के बाद एक अपने यहां लॉकडाउन लगाने लगे.

भारत में एक तरफ कोरोना संक्रमण के मामले धीरे-धीरे बढ़ने लगे तो दूसरी तरफ रुपये की कीमत डॉलर के मुक़ाबले धीरे-धीरे कमज़ोर होती गई.

जहां पहली मार्च तक भारत में कोरोना संक्रमण के केवल 3 मामले दर्ज किए गए थे वहीं 24 मार्च को जब देश में लॉकडाउन लगाया गया यहां कोरोना के 511 मामलों की पुष्टि हो चुकी थी.

उस दौरान डॉलर के मुक़ाबले रुपये की क़ीमत पर नज़र डालें तो पता चलता है कि पहली मार्च को ये 72.1 थी, लेकिन लगातार कमज़ोर होते हुए 24 मार्च तक ये 75.9 तक पहुंच गई.

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अभूतपूर्व आर्थिक चुनौती

देश में काम बंद होने से अर्थव्यवस्था की गाड़ी डगमगाती नज़र आने लगी.

और कोरोना लॉकडाउन के बाद आरबीआई ने पहली बार कहा कि देश के सामने अभूतपूर्व आर्थिक चुनौती है 2020-21 में आर्थिक विकास दर नेगेटिव रह सकती है.

लेकिन 24 मार्च के बाद से डॉलर के मुक़ाबले रुपये की स्थिति लगभग स्थिर ही रही.

अप्रैल के महीने में रुपया थोड़ा और कमज़ोर हुआ ज़रूर और इसकी क़ीमत 76.8 तक हो गई लेकिन फिर मई के आते आते ये 75.8 हुई.

जून के महीने में भी अब तक ये लगभग 75.0 से 75.5 के बीच ही रही है.

तो क्या ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर भविष्य में ये ऐसे ही स्थिर रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था को इसका लाभ मिलेगा?

भारतीय अर्थव्यवस्था को इसका क्या फ़ायदा होगा?

आर्थिक मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु कहते हैं कोरोना संकट के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में एक तरह की डर फैल गया.

ऐसी स्थिति में विकासशील देशों के लोग विदेशी निवेश वापिस ले कर उसे अमरीकी ट्रेज़री में जमा करने लगते हैं.

अमरीका बड़ी अर्थव्यवस्था है और माना जाता है कि वहां पैसा अधिक सुरक्षित होगा.

संकट के दौर में ऐसा होता है और इसे फ्लाइट टू सेफ्टी कहते हैं. भारत के साथ भी ऐसा ही हुआ.

लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था कोरोना काल से कई साल पहले से ही लगातार मुश्किलों से जूझती रही है.

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रुपये की चाल कैसे तय होती है?

रुपये की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है.

इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है.

हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है.

विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है.

अमरीकी डॉलर को वैश्विक करेंसी का रूतबा हासिल है और ज़्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं.

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रुपया कमज़ोर क्यों?

एमके वेणु कहते हैं, कहा नहीं जा सकता कि कोरोना से पहले अर्थव्यवस्था मज़बूत स्थिति में थी.

2018 अप्रैल-मई-जून में जीडीपी 8.2 फीसदी थी जो गिरते-गिरते इस साल जनवरी-मार्च में 3.1 फीसदी तक आ गई. इसमें लॉकडाउन का एक सप्ताह ही शामिल है.

वो कहते हैं कि अगर अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था की हालत सुधरी तो रुपया मज़बूत हो सकता है या नहीं ये देखने के लिए इंतज़ार करना ही बेहतर होगा.

लेकिन वो मानते हैं कि स्थिति सुधरेगी ऐसा लगता नहीं क्योंकि भारत में जो कोरोना लॉकडाउन हुआ वो बेहद मुश्किल था.

ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था देर में पटरी पर लौटेगी और डॉलर के मुक़ाबले रुपया कमज़ोर ही रहेगा.

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सरकार का पहला दायित्व

डॉलर के सामने रुपये की कीमतों के बढ़ने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं. कभी ये आर्थिक हालात का शिकार बनता है तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही.

एमके वेणु कहते हैं बीते दस सालों में (2009 से 2019) तक देखें तो आप पाएंगे कि बीच के दो-तीन सालों को छोड़ दें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में कोई ख़ास विकास दिखा नहीं.

इन दस सालों में डॉलर के मुक़ाबले रुपया भी लगातार कमज़ोर होता रहा है. जहां 2009 में डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कीमत 48.41 थी वहीं 2019 में ये 70.39 थी.

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एमके वेणु कहते हैं ये पूरा पैकेज देश में निवेश बढ़ाने को लेकर था, लेकिन फिलहाल स्थिति है कि अर्थव्यवस्था निगेटिव में जा रही है और सरकार का पहला दायित्व ये होना चाहिए कि उसे सबसे पहले दुरुस्त करे.

वो कहते हैं कि पांच साल में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सरकार का सपना भी अब पूरा नहीं होने वाला.

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