सांसद मनोज तिवारी, सांसद हर्षवर्धन, सांसद मीनाक्षी लेखी, सांसद प्रवेश वर्मा, सांसद महेश गिरि, सांसद उदित राज और सांसद रमेश बिधूड़ी. (फोटो साभार: फेसबुक/पीटीआई)

दिल्ली के सात सांसदों ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गांवों को गोद लिया था. उत्तर पूर्वी दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने कादीपुर और चौहानपट्टी गांव,  पूर्वी दिल्ली से सांसद महेश गिरि ने चिल्ला गांव, दक्षिणी दिल्ली से सांसद रमेश बिधूड़ी ने भाटी कलां गांव, पश्चिमी दिल्ली से सांसद प्रवेश वर्मा ने झड़ौदा कलां गांव, नई दिल्ली सीट से सांसद मीनाक्षी लेखी ने पिलंजी गांव, चांदनी चौक संसदीय सीट से सांसद डॉ. हर्षवर्धन सिंह ने धीरपुर गांव और उत्तर पश्चिमी दिल्ली से सांसद उदित राज ने जौंती गांव को गोद लिया था.

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले के प्राचीर से सांसद आदर्श ग्राम योजना की घोषणा की थी. 11 अक्टूबर, 2014 को जयप्रकाश नारायण की जयंती पर इस योजना को लॉन्च कर दिया गया था.

प्रधानमंत्री ने पहले पांच साल में तीन गांवों को आदर्श बनाने का लक्ष्य रखा था जिसमें से एक गांव को 2016 तक आदर्श बन जाना चाहिए था. हालांकि पहले पांच साल में अधिकतर सांसदों ने एक ही गांव को गोद लिया और उसमें भी विकास कार्यों की हकीकत खोखली ही रही.

जिस दिल्ली से प्रधानमंत्री मोदी ने आदर्श गांव की घोषणा की थी उसी दिल्ली में उनकी पार्टी भाजपा के सात सांसद थे. सात सांसदों में से छह सांसदों ने एक-एक गांव को ही गोद लिया और एक अन्य सांसद ने दो गांव को गोद लिया था.

द वायर ने सभी सात सांसदों के आठ गोद लिए हुए गांवों का दौरा किया और इस दौरान वहां की जमीनी हकीकत के साथ वहां के लोगों की राय भी जानने की कोशिश की.

पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र का चिल्ला गांव

प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले से अपने पहले भाषण में नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान किया था. वहां से मात्र 12 किमी. की दूरी पर स्थित पूर्वी दिल्ली के चिल्ला गांव को भाजपा के सांसद महेश गिरि ने गोद लिया था.

(फोटो: विशाल जायसवाल)

(फोटो: विशाल जायसवाल)

इसके बावजूद मयूर विहार मेट्रो स्टेशन से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित चिल्ला गांव में आज भी पानी की समस्या बरकरार है. स्वच्छ भारत अभियान के तमाम नारों के बीच इस गांव में गंदगी और कूड़े का अंबार लगा हुआ है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव की गलियां बिना बरसात के ही बजबजाती रहती हैं और हफ्तों मिन्नतें करने के बाद सफाई कर्मचारी आते हैं. पीने के पानी की भयंकर समस्या है. लोगों का कहना है कि इसकी वजह से उन्हें बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है.

गांव में चिकित्सा केंद्र और पार्क भी नहीं है. लोगों का कहना है कि गांव में एक सरकारी स्कूल पांचवी तक है. उनकी मांग है कि गांव में इससे ऊपरी कक्षा के लिए भी स्कूल की जरूरत है.

गांव के रहने वाले 60 साल के धर्मवीर सिंह कहते हैं कि पिछले पांच सालों में सांसद महेश गिरि ने कोई काम नहीं किया. अगर उन्होंने कोई काम किया होता तो उन्हें दोबारा यहां से टिकट मिलता.

वह कहते हैं कि मैंने इसी गांव के प्राथमिक विद्यालय से पढ़ाई की है और आज भी हमारे घर के बच्चे वहां पढ़ते हैं. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में केजरीवाल सरकार ने बहुत काम किया है लेकिन हम प्रधानमंत्री तो मोदीजी को ही बनते देखना चाहते हैं.

उत्तर प्रदेश के एटा के रहने वाले 20 वर्षीय विजय पिछले कई सालों से इसी गांव में रह रहे हैं. अशोक नगर में उनकी एक कपड़े की दुकान भी है. वह कहते हैं कि गांव का बहुत बुरा हाल है. यहां नालियों की हालत बहुत खराब है. हफ्ते में एक-दो दिन आने वाले सफाई कर्मचारी आधी-अधूरी सफाई करके चले जाते हैं.

फोटो: विशाल जायसवाल

चिल्ला गांव के एक रास्ते पर फैला कचरा. (फोटो: विशाल जायसवाल)

21 साल के रोहित कहते हैं कि गांव में कोई काम नहीं हुआ. सांसद पीछे की तरफ से बारात घर में आते हैं और वहीं से निकल जाते हैं. इन गलियों में कभी नहीं आते हैं.

बता दें कि सांसद महेश गिरि ने 8 अगस्त, 2015 को डीडीए के तहत एक सामुदायिक केंद्र का निर्माण कराया था. इस सामुदायिक केंद्र में ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराकर शादियों के लिए बुक करते हैं.

(फोटो: विशाल जायसवाल)

सामुदायिक केंद्र का उद्घाटन सांसद महेश गिरि ने किया था. (फोटो: विशाल जायसवाल)

वह कहते हैं कि यहां से आम आदमी पार्टी के विधायक आते हैं. सीवर वगैरह की सफाई वही कराते हैं. उनका मानना है कि यहां से आम आदमी पार्टी को ही जीतना चाहिए.

गांव के बीच में बसे कबाड़ियों के समूह से उन्हें खासी शिकायत है. उनका कहना है ये लोग बहुत गंदगी करते हैं और कोई इस पर ध्यान नहीं देता है.

वहीं कबाड़ी का काम करने वाले विजय ने कहा कि हम पिछले 25-30 सालों से यहां पर रह रहे हैं. हमारे पास इसके सिवा कोई और काम नहीं है. हम क्या कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि हमें सरकार की ओर से रहने की कोई सुविधा भी नहीं मिलती है. हम यहां से कहां जाएंगे.

21 वर्षीय मदन कहते हैं कि यहां कोई काम नहीं हुआ है. यहां पर सड़कें टूटी हुई हैं लेकिन पिछले पांच साल में वह भी नहीं बन सकी है.

राजस्थान की रहने वाली मंजू पिछले कई सालों से इसी गांव में रहती हैं. उनका कहना है कि यहां पर पानी की बहुत समस्या है. पानी ला-लाकर हाथ टूट गए. मकान मालिक पानी नहीं लेने देते हैं.

एक किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है और साफ पानी नहीं होने के कारण हम लोग बीमार पड़ जाते हैं. वह भी कहती हैं  गांव में विकास का कोई काम नहीं हुआ है.

35 साल के भूपिंदर चौधरी कहते हैं गांव में विकास से जुड़ा हुआ कोई काम नहीं हुआ है. आप खुद गंदगी देख सकते हैं. अब चुनाव आ गए हैं तो सब दौड़ रहे हैं.

यहां कूड़े के ढेर लगे हुए हैं. बरसात में मच्छर आ जाते हैं, बीमार हो जाते हैं और बहुत बदबू आती है. बरसात में गंदगी के कारण हम यहां से निकल नहीं पाते हैं. 10 बार शिकायत करने पर एमसीडी वाले आते हैं और कूड़ा उठाते हैं.

चिल्ला गांव के बीच में फैला कबाड़. (फोटो: विशाल जायसवाल)

चिल्ला गांव के बीच में फैला कबाड़. (फोटो: विशाल जायसवाल)

वह कहते हैं कि इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में मोदी जी को ही वोट करेंगे हम. हां, विधानसभा का चुनाव हो तो केजरीवाल को वोट करेंगे.

60 वर्षीय जयराम का अपना घर है और वहीं वह किराने की दुकान चलाते हैं. वह कहते हैं, यहां कोई काम नहीं हुआ है. सांसद महेश गिरि ने कोई खास काम नहीं किया है यहां पर. यह गोद लिया हुआ गांव है, जिन सांसदों ने गांव गोद लिया है उनको लोग देखने जा रहे हैं कि किस तरह से गांव चमका दिया उन्होंने.

वह कहते हैं कि यहां पर आज तक तो कुछ हुआ ही नहीं है. सिर्फ एक छोटा सा चौपाल का काम हुआ है. वो भी दो साल बाद भी अधूरा पड़ा हुआ है. पूरा बना नहीं लेकिन उद्घाटन पहले ही कर दिया.

जयराम कहते हैं कि यहां पर पार्किंग की भी बहुत समस्या है. बाहर वालों ने इस तरह से घेर कर घर बना लिया है कि अंदर की ओर रहने वाले हम जैसे लोगों को दो हजार रुपये देकर मॉल में अपनी गाड़ी खड़ी करनी पड़ती है.

दक्षिणी दिल्ली संसदीय क्षेत्र का भाटी कलां गांव

दक्षिणी दिल्ली में स्थित भाटी कलां गांव को वहां से सांसद रमेश बिधूड़ी ने आदर्श बनाने के नाम पर गोद लिया था. हालांकि पांच सालों बाद भी इस गांव में पानी एक बड़ी समस्या बनी हुई है.

(फोटो: विशाल जायसवाल)

(फोटो: विशाल जायसवाल)

गांव में आवागमन के साधन की भी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. गांव में इंटर कॉलेज, पार्क और एक स्वास्थ्य केंद्र की भी गांववालों ने आवश्यकता बताई.

गांव में घुसते ही एक मिठाई की दुकान चलाने वाले 18 साल के संदीप से मुलाकात होती है. वह कहते हैं, ‘गांव की सबसे बड़ी समस्या स्कूल की है. हमारे गांव में कक्षा पांच तक ही स्कूल हैं जिसकी वजह से आगे की पढ़ाई के लिए हमें पड़ोस के डेरा गांव स्थित राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में जाना पड़ता है. बच्चों के बीच होने वाली छोटी-मोटी लड़ाईयां बड़ी बन जाती हैं. अभी दो दिन पहले ही मारपीट हुई है.’

वह कहते हैं, ‘गांव में कॉलेज न होने की वजह से ही मुझे 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ गई. पानी एक बड़ी समस्या है. रोज सुबह यहां पानी के लिए लंबी-लंबी लाइन लगती है.’

नाम न छापने की शर्त पर 58 वर्षीय और 60 वर्षीय दो बुजुर्ग कहते हैं कि गोद लिए जाने के बाद भी इस गांव में कोई काम नहीं हुआ है. हम लोग सांसद महोदय से बहुत दुखी हैं. गांव में स्कूल न होने के कारण बच्चियों की पढ़ाई छुड़वानी पड़ती है क्योंकि एक तो बाहर जाने के लिए कोई साधन नहीं है वहीं दूसरी तरफ पड़ोस के गांव वाले स्कूल में अक्सर लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं.

वे कहते हैं कि गांव में पानी के लिए घर की महिलाओं को लंबी-लंबी लाइन लगानी पड़ती है. सीवर नहीं बना हुआ है. न तो कोई अस्पताल है, न पार्क. आने-जाने के लिए गांव में केवल एक बस है जिसका कोई टाइम-टेबल नहीं है. सड़कों की हालत टूटी-फूटी है.

(फोटो: विशाल जायसवाल)

गांव में गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं है. (फोटो: विशाल जायसवाल)

दिहाड़ी मजदूरी करने वाले 55 साल के संतराम कहते हैं कि हम तो बेरोजगारी से परेशान हैं. कभी-कभी मजदूरी करने को मिल जाती है जिससे घर का खर्चा चलता है.

वहीं दिहाड़ी मजदूरी करने वाले 31 साल के अनिल और 32 साल के भीम किराए के एक कमरे में रहते हैं. वे भी बेरोजगारी को अपनी सबसे बड़ी समस्या बताते हैं. वे कहते हैं कि हम तो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. जितने दिन मजदूरी करने को मिल जाती है उसी से खर्चा चलता है.

40 साल के बिल्लू कहते हैं कि यहां पर कुछ भी काम नहीं हुआ है. यहां न तो हॉस्पिटल है, न स्कूल है कोई काम नहीं हुआ है. पानी भी नहीं आता है. विधूड़ी ने कागजों में अस्पताल और स्कूल बनवा दिए लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं हुआ. न तो कोई सफाई का साधन है और न ही रोड की सुविधा है.

वे कहते हैं कि शहर में जाने के लिए हमें पांच किमी पैदल चलकर फत्तेपुर, डेरा गांव तक जाना पड़ता है. हमारा कोई रिश्तेदार आता है तो वहां खड़ा रहता है. किसी से लिफ्ट मांगकर उसे आना पड़ता है. बच्चों के लिए स्कूल भी नहीं है. गांव से बाहर पैदल जाते हैं.

वे कहते हैं कि पांचवीं तक लड़की पढ़ती है और घर बैठ जाती है. किराए की गाड़ी लगाने पर 1000-1200 रुपये तक का खर्च आ जाता है. पानी की भी बहुत समस्या है.

60 साल की कमलेश कहती हैं, ‘बच्चों के लिए स्कूल नहीं है. बाहर पढ़ने भेजो तो लड़ाई-झगड़े होते हैं. डेरे के स्कूल के बच्चे हमारे बच्चों को पीटते हैं जिससे बड़ो में झगड़े हो जाते हैं. स्कूल होना चाहिए, पानी का साधन होना चाहिए.’

(फोटो: विशाल जायसवाल)

गांव में पानी भरने के लिए लाइन लगानी पड़ती है. (फोटो: विशाल जायसवाल)

वे कहती हैं, ‘हमें बाहर से पानी भरकर सर पर ढोकर ले जाना पड़ता है और इसी में सारा दिन चला जाता है. वह भी अक्सर छोड़ देता है फिर 10-10 मिनट खड़ा रहना पड़ता है. पशुओं को रखते हैं तो उन्हें भी प्यासे मरना पड़ता है.’

19 साल की प्रिया कहती हैं, ‘इस पूरे इलाके में पानी आता ही नहीं है. पूरे दोपहर भर पानी ढोते रहते हैं. गांव में स्कूल भी नहीं है तो पढ़ें कैसे. मैंने डेरा गांव से 12वीं पास की है. वहां के बच्चे इतने बदमाश हैं कि कल-परसों ही लड़ाई हुई है जिसकी वजह से बच्चे फिर स्कूल नहीं जा रहे हैं.’

आगे की पढ़ाई के बारे में पूछे जाने पर प्रिया कहती हैं, ‘कहां जाएं पढ़ने? आस-पास कोई कॉलेज नहीं है. बाहर कोई पढ़ने जाने नहीं देगा क्योंकि सवारी का साधन नहीं है. आगे पढ़ने का मन तो है लेकिन क्या कर सकते हैं.’

प्रिया कहती हैं कि एक बार शिकायत करने पर 15-20 दिन में टैंकर आता है वो भी 1000-1500 लीटर बस. किसी-किसी के घरों में हर तीसरे दिन ही फुल टैंकर आ जाते हैं.

छठी कक्षा में पढ़ने वाले 11 साल के प्रिंस की भी मांग है कि गांव में स्कूल होना चाहिए. वह कहते हैं कि मुझे स्कूल के सिवा कुछ और नहीं चाहिए.

45 साल की जयावती कहती हैं कि गांव में न तो स्कूल हैं न तो पानी है. यह तो बस कहने को दिल्ली है. इलेक्शन के टाइम में खूब न्यूज वाले आते हैं इलेक्शन खत्म, न्यूज खत्म.

भाटी कलां गांव में पानी की समस्या के कारण गंदे तालाब के पानी में नहाते हुए बच्चे. (फोटो: विशाल जायसवाल)

भाटी कलां गांव में पानी की समस्या के कारण लोग गंदे तालाब में नहाने को मजबूर हैं. (फोटो: विशाल जायसवाल)

35 साल के रामकुमार पशुपालन करते हैं. वे कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या शिक्षा की है. यहां पांचवी से ऊपर का कोई स्कूल नहीं है. यहां से पांच से 10 किमी बच्चे जाते हैं और आगे पढ़ने की चाह रखने वाले पढ़ नहीं पाते हैं. दूसरी समस्या सवारी की है. गांव के लिए एक बस लगी जिसका कोई टाइम-टेबल नहीं है. बच्चे पैदल आते-जाते हैं उन्हें एक घंटे का रास्ता तय करके जाना पड़ता है.

पश्चिमी दिल्ली संसदीय क्षेत्र का झड़ौदा कलां गांव

पश्चिमी दिल्ली के झड़ौदा गांव को वहां के सांसद प्रवेश वर्मा ने गोद लिया हुआ है. पहले से ही सम्पन्न इस गांव में विकास का कोई बड़ा काम नहीं हुआ है. गांव में जाने के लिए संपर्क मार्ग की व्यवस्था है. इस गांव के लिए आवागमन के साधन की उपलब्धता है.

पीने के पानी की बहुत बड़ी समस्या है. समृद्ध घरों वाले लोगों ने तो आरओ लगवा लिए हैं लेकिन गांव के बाकी लोगों को पीने के पानी के लिए टैंकर का इंतजार करना पड़ता है. हफ्ते में एक बार आने वाले टैंकर से वे पानी भरते हैं. घरों में आने वाला पानी खारा होता है. गांव में सीवर की भी कोई व्यवस्था नहीं हैं. गांव में एक सरकारी अस्पताल है.

झड़ौदा कलां गांव में टैंकर से पानी भरती महिलाएं. (फोटो: विशाल जायसवाल)

झड़ौदा कलां गांव में टैंकर से पानी भरने के लिए जमा हुईं महिलाएं. (फोटो: विशाल जायसवाल)

जनकपुरी में चार्टर अकाउंटेंट का काम करने वाले 30 साल के विकास कहते हैं कि गांव में पानी की समस्या तो बहुत है लेकिन हमारे घर में आरओ लगा हुआ है.

29 साल की ज्योति कहती हैं, ‘पानी लेने के लिए हमें टैंकर का इंतजार करना पड़ता है. गांव में साफ-सफाई की व्यवस्था तो ठीक है. 80 साल की पतासो को भी खारे पानी से ही शिकायत है. हालांकि गांव में किसी अन्य चीज से उन्हें कोई समस्या नहीं है.’

60 साल के ब्रह्मानंद कहते हैं कि गांव में कोई विकास का काम नहीं हुआ है. पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. पानी लेने के लिए टैंकर का इंतजार करना पड़ता है.

60 साल के रामनिवास कहते हैं कि आदर्श गांव होने के कारण झड़ौदा गांव में जितना काम होना चाहिए था उतना नहीं हुआ है. हालांकि झड़ौदा से लेकर टिकरी तक पक्की सड़क बन गई है. वह कहते हैं कि यहां पर आप-भाजपा में टक्कर की लड़ाई है.

60 साल की सरोज और 65 साल की सरजो भी गांव में विकास का कोई बड़ा काम नहीं होने से दुखी हैं. उनका कहना है कि सांसद महोदय को इस पर ध्यान देना चाहिए था.

55 साल की प्रेमलता कहती हैं, ‘सीवर की व्यवस्था नहीं है, पीने का पानी नहीं आता है. टैंकर के लिए इंतजार करना पड़ता है.’

नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का पिलंजी गांव

नई दिल्ली लोकसभा सीट से भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने साल 2014 में पिलंजी गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया था. यह गांव दिल्ली के बीचों बीच सरोजिनी नगर के पास है.

दिल्ली के बीच में स्थित होने की वजह से शुरुआत में लगा कि इस शहरी गांव में दिक्कतें कम होंगी लेकिन गांव पहुंचकर पता चला कि इसका हाल भी और गांवों जैसे ही हैं, बस फर्क इतना है कि गांव में बड़े-बड़े मकान और कोठियां बनी हैं.

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मीनाक्षी लेखी का गोद लिया पिलंजी गांव. (फोटोः रीतू तोमर)

गांव में घुसते ही दाहिनी तरफ कूड़े का अंबार लगा है, जहां बड़ी संख्या में गाय घूम रही हैं. एक तरफ कूड़े की दुर्गंध से आम लोग परेशान हैं तो वहीं दूसरी तरफ अक्सर इन आवारा गांवों से दुर्घटनाएं होती रहती हैं.

बीते 20 सालों से पिलंजी गांव में रह रहे रामनाथ कहते हैं, ‘बस यहां मकान ही बढ़िया बने हैं, बाकी समस्याएं वही हैं, जो हर जगह होती हैं. पानी की बड़ी किल्लत है. कूड़े के निपटान की कोई व्यवस्था नहीं है, गांव की सीमा के शुरू होने पर आपने कूड़े का ढेर देखा होगा, कोई सुनवाई नहीं, कई बार शिकायतें की गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.’

वह कहते हैं, ‘गांव में आवारा गाय बहुत हैं, ये सड़कों पर घूमती रहती हैं, इससे बहुत दिक्कते होती हैं, कई गायों की दुर्घटना में मौत भी हो गई है. भाजपा सरकार गाय की राजनीति करती है लेकिन इन गायों की ओर कोई ध्यान नहीं देती.

बिजली का काम करने वाले मनोज कुमार कहते हैं, गांव की सबसे बड़ी समस्या गंदगी है. यहां जगह जगह कूड़े के ढेर हैं, जिससे बीमारियां भी हो जाती हैं. दूसरी बड़ी समस्या बेरोजगारी है, यहां के अधिकांश युवा बेरोजगार हैं, उन्हें कोई रोजगार नहीं मिला है.’

वहीं, भुवन सिंह कहते हैं कि यह गुर्जरों का गांव हैं, यहां बड़ी आबादी में गुर्जर रहते हैं और बाकी आबादी यूपी, बिहार के लोगों की हैं, जो यहां किराए पर रह रहे हैं, यहां मकान मालिकों का बड़ा आतंक हैं, जिससे किराएदार खासे परेशान हैं. यहां मकान मालिकों की गुंडागर्दी चलती है.

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पिलंजी गांव में कूड़े के ढेर के पास खड़ी गायें. (फोटोः रीतू तोमर)

पिलंजी गांव की आबादी चार हजार के आसपास हैं. रश्मि कहती हैं कि यहां अधिकतर लोगों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, बिना रिश्वत लिए कोई राशन कार्ड बनाने को लेकर तैयार नहीं है.

पहली बार वोट देने जा रहे मोहित कहते हैं, ‘मीनाक्षी लेखी बस एक-दो बार इस गांव में आई हैं, सिर्फ खानापूर्ति के लिए आई थीं, उन्हें लोगों से कोई सरोकार नहीं है. उद्घाटन समारोह में आई थी, तब बड़े-बड़े वादे करके गई थीं लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. मुझे नहीं लगता कि इस बार उन्हें यहां ज्यादा लोग वोट देंगे. वह हमारी सांसद हैं, हमें सुने, हमारी परेशानियों को दूर करें, अब चुनाव है तो हो सकता है कि एक-दो दिन में आ जाएं और फिर बड़े-बड़े वादे कर जाएं.’

स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल नहीं है, बस एकाध क्लिनिक हैं, पानी हर दूसरे दिन कुछ घंटों के लिए आता है. गांव के लोग आपराधिक तत्वों से भी परेशान हैं.

चाय की दुकान चलाने वाले हुक्म सिंह कहते हैं, ‘मैं इन नेताओं के झूठे वादों से तंग आ गया हूं, सोच रहा हूं कि इस बार वोट ही ना दूं. कहने को गांव को गोद ले लिया है लेकिन यहां मीनाक्षी जी ने कुछ किया ही नहीं. आप सुबह आती तो आपको पानी के टैंकर खड़े मिलते यहां, पानी की बड़ी किल्लत है लेकिन इन्हें क्या है, जीत जाएंगी तो फिर अगले चार साल तक चेहरा नहीं दिखाएंगी.’

यह पूछने पर कि चुनाव को लेकर गांव में क्या रुझान है? इसके पर हुक्म सिंह कहते हैं, ‘मीनाक्षी लेखी तो नहीं जीतेंगी इस बार, यह तो तय है. हम कम से कम इस बार उन्हें वोट नहीं देंगे. पिछली बार वह चुनाव के दौरान पूरे गांव में घूमी थी और सपने दिखाकर गई थीं कि कायापलट कर देगी. क्या कायापलट हुआ, आपके सामने हैं. ऐसे झूठ उम्मीदवार पर कैसे भरोसा किया जा सकता है.’

वह कहते हैं, ‘महीने में एक बार पेस्ट कंट्रोल ही करा दे सरकार, बहुत है. गांव में मच्छरों की भरमार है. रात में हम लोग सो नहीं पाते हैं लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ता.’

चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र का धीरपुर गांव

चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र से भाजपा सांसद डॉ. हर्षवर्धन ने धीरपुर गांव को गोद लिया है लेकिन इस गांव के लोग अपने सांसद से खुश नहीं हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि हमने गांव में उन्हें कभी देखा ही नहीं.

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धीरपुर गांव में राशन की दुकान चलाते अजय प्रधान (फोटोः रीतू तोमर)

गांव के अजय प्रधान (44) कहते हैं, ‘धीरपुर गांव की सबसे बड़ी समस्या पानी की किल्लत है. आपको अंदाजा नहीं है कि यहां हफ्तों पानी नहीं आता है. चार दिन से एक बूंद पानी नहीं आया है. लोगों ने अपने घरों में समरसिबल लगा रखे हैं और जिनके घर में नहीं हैं, वे पानी ढोकर लाते हैं. गांव की औरतें भौर से उठकर मोटर में प्रेशर बनाने की कोशिश करती हैं ताकि पानी आ जाए.’

वह कहते हैं कि यहां के पार्षद नवीन त्यागी हैं, जिसने पार्षदी का चुनाव जीतने के बाद अपना चेहरा तक नहीं दिखाया. तो किससे उम्मीद करें, जब पार्षद ही नहीं सुन रहा तो डॉ. हर्षवर्धन से क्या उम्मीदकरें?

गांव में रहने वाली 80 साल की बुजुर्ग महिला कौशल्या कहती हैं, ‘नालियों का भी यही हाल है, यहां की नालियां हम लोगों ने बंद करवा दी है.’  पूछने पर पता चला कि सफाई नहीं होती थी तो नालियों को बंद करा दिया गया. यहां बस सीवर है.

वह कहती हैं, ‘पार्क के नाम पर एक खाली पड़ा प्लॉट है. यहां चोरियां भी बहुत होती है. हर दूसरे दिन चोरियां होती है, कभी दोपहिया चोरी हो जाता है तो कभी बाइक, स्कूटर का कोई पुर्जा चोरी हो जाता है. प्रशासन कुछ कर नहीं पा रहा है. ‘

धीरपुर में एक बड़ी आबादी किराएदारों की है, जिनमें छात्र अधिक हैं.

ऐसे ही एक छात्र विपिन रावत कहते हैं, ‘यहां से मुखर्जी नगर पास है, तो यही सोचकर हमने यहां मकान किराया पर लिया था कि आने-जाने में सहूलियत होगी लेकिन बाद में पता चला कि यहां तो पानी की समस्या है. पानी ही नहीं आता है, कई-कई दिनों तक पानी नहीं आता है. अब कहीं और कमरा देख रहे हैं, जहां कम से कम पानी तो आता हो.’

विनोद माथुर गली की खस्ताहाल के बारे में कहते हैं, ‘यह गली 10 साल पहले बनी थी उसके बाद इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं, सांसद जी ने गांव गोद लिया है तो कम से कम यह सड़क ही बनवा देते. गांव में न कम्युनिटी सेंटर हैं, न लाइब्रेरी और न पार्क.’

वह कहते हैं, ‘धीरपुर की आबादी 7,500 है. यहां की गलियां बहुत संकरी है, कल को कहीं आग लग जाए या कोई दुर्घटना हो जाए तो फायर ब्रिगेड की गाड़ी या एंबुलेंस अंदर तक नहीं आ सकती यानी हम बहुत ही जोखिम भरे इलाके में रह रहे हैं, तो ऐसे में कैसे इस गांव को आदर्श कहा जा सकता है. वोट के लिए उलूल-जुलूल योजनाएं सरकार बना देती है लेकिन जनता तो पागल नहीं है, वह जमीनी हकीकत समझ रही है.’

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धीरपुर गांव का श्मशान घाट (फोटोः रीतू तोमर)

दिलीप सिंह कहते हैं, ‘यह गांव दिल्ली विधानसभा से सिर्फ चार किलोमीटर दूर है, तब भी इसके ऐसे हालात है. सरकार को जिंदा लोगों की कोई चिंता नहीं है, लेकिन शमशान घाट में बढ़िया काम किया है, जाकर देखिए पूरा चमकाया गया है. पानी की सुध ही ले लेते. पानी से परेशान है यहां की जनता.’

उत्तर पश्चिमी दिल्ली का जौंती गांव

बाहरी दिल्ली के जौंती गांव को उत्तर पूर्वी दिल्ली से सांसद उदित राज ने गोद लिया है. 2014 में उदित राज इस संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर जीते थे लेकिन इस बार चुनाव में पार्टी की तरफ से टिकट नहीं दिए जाने पर उदित राज भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए.

जौंती के ग्रामीण उदित राज से खासे नाराज हैं. वह कहते हैं, ‘उन्होंने (उदित राज) कुछ काम किया ही नहीं. हमारे गांव के पहले भी ऐसे ही हालात थे और अब भी हैं. कुछ काम नहीं किया इसलिए तो इस बार टिकट नहीं मिला. मिलता भी तो हमारा गांव तो वोट देता नहीं.’

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जौंती गांव की सीमा शुरू होने पर कूड़े का ढेर

दिल्ली के बाहरी इलाके में कुतुबगढ़ रोड पर स्थित जौंती मुख्य सड़क से काफी अंदर है, गांव तक पहुंचने के लिए खेतों को पार कर जाना पड़ता है. यह गांव पूरी तरह से खेतों से घिरा हुआ है. जौंती में जाट सर्वाधिक संख्या में हैं. यह जाट बहुल गांव है, यहां के अधिकतर युवा फौज में हैं. गांव की आबादी 4,000 के आसपास है.

गांव के बुजुर्ग और गेहूं की खेती करने वाले आलोक छिक्कारा कहते हैं, ‘गांव में सरकारी स्कूल है लेकिन स्कूल की इमारत जर्जर हो चुकी है. अस्पताल है लेकिन अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, डॉक्टर भी ज्यादातर गायब ही रहते हैं. स्वच्छ भारत अभियान की धज्जियां कैसे उड़ती है, यह जौंती आकर देखा जाए. कूड़े के ढेर मिल जाएंगे. कहीं साफ-सफाई नहीं है.’

इस गांव में बड़ी संख्या में किराएदार भी रहते हैं. यहां के स्थानीय निवासी बड़ी तादाद में रोहिणी और पीतमपुरा जाकर बस गए हैं. बतौर सांसद उदित राज का रिपोर्ट कार्ड जानने और गांव को गोद लिए जाने के बाद हुए कामों के बारे में पूछे जाने पर प्रेमचंद कहते हैं, ‘वह गांव में ज्यादा दिखाई नहीं दिए, किसी कार्यक्रम, समारोह में ही अमूमन दिखे होंगे. मुख्य सड़क से गांव के दूर होने पर यहां तक पहुंचने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.’

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जौंती के ग्रामीण राजकिशोर (फोटोः रीतू तोमर)

परचून की दुकान चलाने वाले 80 वर्षीय बुजुर्ग राजकिशोर कहते हैं, ‘गांव तक पहुंचना आसान है लेकिन गांव के अंदर तक जाना मुश्किल है. रात में स्थिति क्या होगी, आपको अंदाजा नहीं. गांव की लड़कियां नौकरी करके रात में आती हैं तो घरवाले उसे लेने मुख्य सड़क तक आते हैं. इसके लिए एक किलोमीटर चलना पड़ता है.’

वे कहते हैं, ‘हमारे लिए तो सबसे बड़ी समस्या यही है. मुख्य सड़क से लेकर गांव तक पहुंचने में लंबा रास्ता तय करना पड़ता है इसलिए यहां कोई आना नहीं चाहता. इस पूरे क्षेत्र में जौंती गांव सबसे पिछड़ा गांव है, इसलिए यहां के लोग मकान किराए पर चढ़ाकर बाहर रहने जा रहे हैं. आधा गांव किराएदारों का है, यहां की दुकानें चलती नहीं, बिक्री कम है.’

उन्होंने कहा, ‘सरकार ने रोजगार देने का वादा किया था, बता दो किसी को रोजगार मिला हो. हमारे गांव में लड़के-लड़कियां बेरोजगार घूम रहे हैं, दुकानें चल नहीं रही हैं. काम-धंधे बंद पड़े हैं. आदर्श गांव क्या होता है, जहां हर तरह की सुख-सुविधाएं हों, कम से कम बुनियादी सुविधाएं तो हों, लोगों के पास रोजगार हो, सुरक्षा-व्यवस्था हो लेकिन बता दो यहां आदर्श जैसा कुछ है क्या?’

जौंती में शिक्षा भी अहम मुद्दा है. यहां एक-दो सरकारी स्कूल हैं, जहां पढ़ाई नहीं होती. वजह पूछने पर सुभद्रा छिक्कारा कहती हैं, ‘मास्टर आते ही नहीं स्कूल में. सरकारी स्कूल है तो चल रहा है. बच्चे क्या करें, ट्यूशन लेकर पढ़ते हैं. हमारी बेटियां कहां से पढ़े, ट्यूशन की महंगी फीस है, स्कूल में पढ़ाई होती नहीं और ये नारा देते हैं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ.’

वह कहती हैं, ‘गांव की सड़कों का हाल बुरा है. ये तो बुनियादी सुविधाएं हैं, जो हमारे गांव में नहीं है. गांव को रहने लायक तो बनाएं, आदर्श तो बहुत दूर की बात है.’

उत्तर पूर्वी दिल्ली का कादीपुर और चौहानपट्टी-सभापुर गांव

दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष और उत्तर-पूर्वी लोकसभा सीट से सांसद मनोज तिवारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत दिल्ली के दो गांवों- चौहानपट्टी सभापुर और कादीपुर को गोद लिया हुआ है, लेकिन गांव आदर्श बनना तो दूर ये गांव बुनियादी सुविधाओं तक से महरूम हैं. प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान की हक़ीक़त इन गांवों में जाकर देखी जा सकती है.

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चौहानपट्टी सभापुर गांव. (फोटो: रीतू तोमर)

मनोज तिवारी ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चौहानपट्टी गांव को सबसे पहले गोद लिया था, लेकिन गांव की आबादी कम होने की वजह से सांसद को चौहानपट्टी से ही कटकर बने गांव सभापुर को भी गोद लेना पड़ा. आधिकारिक तौर पर यह एक ही गांव है. चौहानपट्टी में लगभग 107 परिवार रहते हैं, जबकि सभापुर की आबादी 4,000 के आसपास है. चौहानपट्टी चौहानों का गांव है, यहां चौहान परिवार रहते हैं, जबकि सभापुर ठाकुरों का गांव है.

चौहानपट्टी गांव में एक भी सरकारी स्कूल नहीं है. सिर्फ एक निजी स्कूल है, जो आठवीं तक है. यहां के बच्चों को पढ़ाई के लिए लगभग चार किलोमीटर तक का सफर कर दूसरे गांवों में या फिर सोनिया विहार के स्कूलों का रुख़ करना पड़ता है.

एक गृहिणी लता चौहान का कहना है, ‘गांव में स्कूल तक नहीं है. एक ही स्कूल है, इसमें गांव के कितने बच्चे पढ़ पाएंगे, ऊपर से वो स्कूल भी आठवीं तक है. इस स्कूल की हालत देख लेंगे तो यहां शिक्षा की स्थिति का पता चल जाएगा.’ 

हैरानी की बात है कि गांव में एक अस्पताल भी नहीं है, सिर्फ एक छोटा सा क्लीनिक है, जिस पर ज़्यादातर समय ताला लटका रहता है. इस क्लीनिक पर न कोई बोर्ड लगा है और न ही इसके खुलने या बंद होने की किसी को कोई जानकारी है.

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चौहानपट्टी गांव के एकमात्र क्लीनिक पर लगा ताला. (फोटो: रीतू तोमर)

गांव में किराने की दुकान चलाने वाले महेश कहते हैं, ‘पिछले साल पड़ोस में रहने वाली एक महिला को रात के समय प्रसव पीड़ा के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा था. रात के डेढ़ बजे किस तरह हम लोगों ने गाड़ी का बंदोबस्त कर उसे सोनिया विहार के अस्पताल में भर्ती कराया, हम ही जानते हैं. थोड़ी सी देर होने पर कुछ भी हो सकता था. अगर यही अस्पताल हमारे गांव में खुला होता तो इतनी परेशानी नहीं होती.’

पूरे गांव में कूड़े के ढेर देखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान के सफल होने के दावे की पोल खुलती दिखती है. जगह-जगह कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं.

गांव की सीमा शुरू होने से लेकर गांव ख़त्म होने तक पूरा गांव कूड़े के ढेर से पटा पड़ा है. पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है.

नालियां गंदे पानी और कूड़े की वजह से जाम हुई पड़ी हैं, जिस वजह से पानी गलियों में इकट्ठा हो रहा है. इसी गंदे पानी में मच्छर पनप रहे हैं, जिनसे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का ख़तरा रहता है.

गांव के निवासी पीतम सिंह (62) कहते हैं, ‘मनोज तिवारी जी ने जब से गांव को गोद लिया है, वह एक-दो बार ही गांव आए हैं. ऐसा लगता है कि गांव को गोद लेकर लावारिस छोड़कर चले गए हैं. गांव का प्रवेश-द्वार और एक टर्मिनल बनवाने के अलावा उन्होंने कोई काम नहीं किया. न सफाई, न स्कूल, न बैंक, न अस्पताल कुछ भी तो नहीं है. सड़कों की हालत देख लो, टूटी हुई हैं, पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है. हर साल लगभग आधा गांव डेंगू की चपेट में आता है.’

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चौहानपट्टी सभापुर गांव में कूड़े का ढेर. (फोटो: रीतू तोमर)

उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए हुकूम सिंह कहते हैं, ‘गांव की सबसे बड़ी समस्या पानी की है, पानी की पाइपलाइन बिछी हुई नहीं है. टैंकर से पानी सप्लाई होता है, जो दो-तीन दिन में एक बार आता है. पानी की बड़ी समस्या है, गर्मियों में हालत और ख़राब हो जाती है. सिर्फ प्रवेश-द्वार बनवाकर पल्ला झाड़ने वाली बात है.’

ऐसे समय में हर हर सड़क और गली-नुक्कड़ के चौराहे पर एटीएम खुले हुए हैं. इस गांव की स्थिति यह है कि यहां एक भी बैंक नहीं है. बैंक के लिए यहां के लोगों को दूसरे गांवों में जाना पड़ता है.

सतीश चौहान. (फोटो: रीतू तोमर)

सतीश चौहान. (फोटो: रीतू तोमर)

सतीश चौहान कहते हैं, ‘गांव में कुछ भी तो नहीं है, न स्कूल, न अस्पताल, ऐसे में बैंक न होने की बात पर चौंकने की ज़रूरत नहीं है. हमारा तो घर-बार, खेती-बाड़ी यही है, वरना कब के यहां से चले गए होते.’

गांव के लोगों का कहना है कि गांव गोद लेने के बाद मनोज तिवारी ने बीते सालों में चौहानपट्टी सभापुर गांव में सिर्फ एक प्रवेश द्वार और बस टर्मिनल बनवाया है.

कादीपुर गांव

सांसद मनोज तिवारी ने उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के कादीपुर गांव को भी गोद लिया हुआ है, जहां के हालात भी कमोबेश सभापुर चौहानपट्टी जैसे ही हैं. कुशकनगर-1 और कुशकनगर-2 के साथ कादीपुर की आबादी लगभग 8,000 है. कादीपुर में जाट, ब्राह्मण और झीमर तीन जातियों के लोग रहते हैं.

दिल्ली जैसे शहर में होकर भी इस गांव तक पहुंचना आसान नहीं है. इस गांव में सिर्फ एक रूट की ही बस चलती है, जो फिलहाल इलाके में पुल निर्माण की वजह से बंद है. इसलिए इस गांव तक पहुंचने के लिए कोई बस सेवा फिलहाल नहीं है.

गांव तक निजी वाहन, टैक्सी, ऑटो या रिक्शा से ही आया जा सकता है.

यहां रहने वाले फतेह सिंह कहते हैं, ‘इस गांव में सिर्फ एक ही रूट की बस चलती थी, लेकिन पुल बनने की वजह से वह भी पिछले कई महीनों से बंद है. ऑटो या रिक्शा लेकर या किसी अन्य साधन से ही गांव वाले आते-जाते हैं. इसके अलावा कोई और विकल्प ही नहीं है.’

इस गांव में सिर्फ दो स्कूल हैं, जहां क्षमता से अधिक बच्चे पढ़ते है. गांव में कॉलेज निर्माण के लिए 16 एकड़ की जमीन अधिग्रहित की गई है.

दिल्ली विकास समिति के अध्यक्ष हरपाल सिंह राणा कहते हैं, ‘स्कूलों की हालत बहुत बदतर है. ऐसे में यहां कॉलेज निर्माण का शिगूफा छोड़ा गया है. लगभग सालभर पहले इसके लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी लेकिन अब तक मामला वहीं पर ही अटका हुआ है.’

पानी की समस्या यहां की बहुत बड़ी समस्या है, गांव में हर तीसरे दिन पानी आता है.

गांव की एक महिला सोनू सैनी कहती हैं, ‘पानी हर तीसरे से चौथे दिन आता है. वह भी रात में तीन बजे के आसपास. कभी-कभी रात में दो बजे के आसपास आता है. ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं इसलिए पानी ख़रीदकर पीना पड़ रहा है, इससे बजट गड़बड़ा जाता है.’

गांव में कूड़े का अंबार लगा हुआ है. कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है. लोग खेतों में कूड़ा डाल देते हैं. हर खेत में कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं.

ग्रामीण कहते हैं कि पूरे गांव में कच्ची सड़कें हैं, जिनमें गड्ढे हैं और बरसात के मौसम में इनमें पानी भर जाता है. गांव में सिर्फ एक पक्की सड़क बनी है, वह भी निगम पार्षद के घर के सामने की सड़क है. दो-चार स्ट्रीट लाइट लगवाई गई हैं.

Park-Kadipur

कादीपुर का पार्क. (फोटो: रीतू तोमर)

कादीपुर की निगम पार्षद उर्मिला राणा मनोज तिवारी द्वारा गांव में कराए गए कामों का हवाला देते हुए कहती हैं, ‘गांव की सड़क पक्की कराई गई है, आप जाकर देख लो. स्ट्रीट लाइटें भी तिवारी जी ने ही लगवाई हैं. अब गांव में पार्क बन रहा है.’

पार्क के सवाल पर गांव की महिला कृष्णा (61) कहती हैं, ‘पार्क के नाम पर सिर्फ़ ज़मीन का एक टुकड़ा सालभर पहले आवंटित किया था. इस ज़मीन पर बोर्ड लगवा दिया गया है, लेकिन काम अभी तक नहीं हुआ है.’

कादीपुर के बारे में कहा गया था कि यह दिल्ली का पहला गांव है, जहां फ्री वाई-फाई है लेकिन दिल्ली विकास समिति के अध्यक्ष हरपाल सिंह राणा कहते हैं कि ऐलान तो किया गया था कि कादीपुर दिल्ली का ऐसा गांव है, जहां फ्री वाई-फाई है लेकिन यह महीनों से बंद पड़ा है.

गांव के राकेश सैनी कहते हैं, ‘फ्री वाई-फाई की बातें हवाहवाई हैं. अगर यह फ्री होता तो गांव के लोगों को हर महीने इंटरनेट रिचार्ज नहीं कराना पड़ता. शुरुआत में कुछ महीने फ्री वाई-फाई की सुविधा मिली थी, बाद में इसे बंद कर दिया गया. असल में निगम पार्षद के घर की चारदीवारी के आसपास ही वाई-फाई फ्री है.’

Kadipur-Hos

बुराड़ी में 2008 से निर्माणाधीन अस्पताल. (फोटो: रीतू तोमर)

वह कहते हैं, ‘पूरे गांव में कोई अस्पताल नहीं है, सिर्फ एक डिस्पेंसरी है. गांव के लोगों को इलाज के लिए नरेला जाना पड़ता है. पास में बुराड़ी में अस्पताल है, जो साल 2008 से बन ही रहा है, 10 साल बाद भी बनकर तैयार नहीं हो पाया है. इस अस्पताल का तीन बार शिलान्यास हो चुका है. पहली बार 2008 में दूसरी बार 2012 में और तीसरी बार 2016 में मनोज तिवारी ख़ुद इसका शिलान्यास कर चुके हैं.’

कादीपुर के गवर्मेंट बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल की विद्यालय प्रबंध समिति के वाइस चेयरमैन विकास सैनी का कहना है, ‘गांव में कायदे का कोई स्कूल नहीं है. यहां सिर्फ दो स्कूल हैं, पहला प्राइमरी स्कूल है, जो पहली से पांचवीं तक एमसीडी का स्कूल हैं. गांव में कोई केंद्रीय विद्यालय नहीं है. यहां कोई नर्सरी स्कूल भी नहीं है. यहां के बच्चे यहां से आठ किलोमीटर दूर बख्तावरपुर पढ़ने के लिए जाते हैं.’

वे बताते हैं, ‘गांव में विकास के नाम पर सड़क का सिर्फ एक टुकड़ा बनाया गया है और गिनती की लाइटें लगी हैं. वाई-फाई सिर्फ निगम पार्षद के घर में ही चलता है.’

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