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Thursday, December 12, 2019

Dev Deepawali 2019 Katha: पौराणिक कथा, क्यों मनाई जाती है देव दीपावली, पूजा विधि, दान और महत्व

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Dev Deepawali 2019 Katha देव दीपावली के मनाए जाने के संदर्भ में भगवान शिव की एक पौराणिक कथा है जिसमें वे ​असुर त्रिपुरासुर का वध करके त्रिपुरांतक बनते हैं।

Dev Deepawali 2019 Katha: कार्तिक मास की पूर्णिमा को काशी में देव दीपावली मनाई जाती है, जो इस वर्ष 12 नवंबर दिन मंगलवार को मनाई जाएगी। देव दीपावली के मनाए जाने के संदर्भ में भगवान शिव की एक पौराणिक कथा है, जिसमें वे ​असुर त्रिपुरासुर का वध करके त्रिपुरांतक बनते हैं। देव दीपावली के दिन गंगा पूजा के साथ भगवान शिव की आराधना करने का विधान है, जिससे लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। देव दीपावली के दिन काशी में गंगा के सभी घाटों पर दीपक जलाए जाते हैं। पूरी काशी जगमगा रही होती है। आइए जानते हैं कि काशी में देव दीपावली क्यों मनाई जाती है?

देव दीपावली की कथा

भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के सेनापति भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। इसके बाद उसके तीनों बेटे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने देवताओं से बदला लेने के लिए ब्रह्म देव को अपने कठोर तप से प्रसन्न किया और अमरत्व का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि वे अमरता का वरदान नहीं दे सकते हैं, कुछ और मांगो। इन तीनों भाइयों को त्रिपुरासुर के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरासुर ने कहा कि हमारे लिए निर्मित तीन पुरियां जब अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में हों और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत होकर असंभव रथ पर सवार असंभव बाण से मारना चाहे, तब ही हमारी मृत्यु हो। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया।

ब्रह्मा जी से वरदान पाकर त्रिपुरासुर देवताओं, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों पर अत्याचार करने लगे। सभी देवता मिलकर भी उनको हरा नहीं पा रहे थे। त्रिपुरासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर आधिपत्य कर लिया। सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे। महादेव ने उनसे कहा कि तुम सब मिलकर उससे युद्ध करो। तब देवताओं ने कहा कि हम ऐसा कर चुके हैं। तब भगवान शिव ने कहा कि उनका आधा बल ले लो और जाकर उनसे लड़ो। लेकिन सभी देवता भगवान शिव के बल को संभाल नहीं पाए, तब उन्होंने स्वयं त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया।

इसके बाद सभी देवताओं ने महादेव को अपना आधा बल दे दिया। फिर भगवान शिव ने धरती को असंभव रथ बनाया, जिसमें सूर्य और चंद्रमा उसके दो पहिए बने। भगवान विष्णु बाण, वासुकी धनुष की डोर और मेरूपर्वत धनुष बने, ऐसे तैयार हुआ असंभव धनुष और बाण। फिर भगवान शिव उस असंभव रथ पर सवार होकर असंभव धनुष पर बाण चढ़ा लिया और अभिजित नक्षत्र में तीनों पुरियों के एक पंक्ति में आते ही प्रहार कर दिया। प्रहार होते ही तीनों पुरियां जलकर भस्म हो गईं और त्रिपुरासुर का अंत हो गया। उस दिन कार्तिक पूर्णिमा थीं।

त्रिपुरासुर का अंत होने पर सभी देवी देवता बहुत प्रसन्न हो गए। वे सभी भगवान शिव की नगरी काशी पहुंचे। फिर उन सभी ने गंगा पूजन के साथ दीप दान किया। इसके बाद से ही हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाने लगी।

Dev Deepawali 2019 Puja Vidhi: कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाएगी देव दीपावली, जानें पूजा विधि, दान और महत्व

Dev Deepawali 2019 Puja Vidhi: कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाएगी देव दीपावली, जानें पूजा विधि, दान और महत्व

Dev Deepawali 2019 Puja Vidhi काशी में देव दीपावली कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह दीपावली के 15 दिनों ​बाद मनाई जाती है।

Dev Deepawali 2019 Puja Vidhi: काशी में देव दीपावली कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष देव दीपावली 12 नवंबर को मनाई जाएगी। दीपावली के 15 दिनों ​बाद काशी की देव दीपावली मनाई जाती है। इस दिन शाम के समय वाराणसी में मंदिरों और गंगा के घाटों को दीयों से जगमग कर दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन सभी देवी-देवता दीपावली मनाते हैं और भगवान शिव की नगरी काशी जाते हैं।

देव दीपावली का महत्व

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदि ने देव दीपावली को महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। ऐसे में इस दिन स्नान, दान, होम, यज्ञ और उपासना करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन सायंकाल के समय मत्स्यावतार हुआ था, इसलिए आज के दिन दान आदि करने से 10 यज्ञों के समान फल की प्राप्ति होती है।

देव दीपावली पूजा विधि

कार्तिक पूर्णिमा के दिन संध्या के समय गंगा पूजन किया जाता है। गंगा पूजन के पश्चात काशी के 80 से अधिक घाटों पर दीपक जलाए जाते हैं। उन दीपकों के प्रकाश पूरी काशी जगमग हो जाती है, उस रात की अलौकिक छठा देखते ही बनती है।

इस दिन श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा सुनना चाहिए। फिर शाम के समय मन्दिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाएं। कार्तिक पू​र्णिमा के दिन गंगा जी को दीपदान भी किया जाता है।

स्कन्दपुराण के काशी खण्ड के अनुसार, देव दीपावली वाले दिन कृत्तिका में भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का दर्शन करें, तो ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपारग और धनवान होते हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार, देव दीपावली के दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, प्रीति, संतति, अनसूया और क्षमा- इन छः कृत्तिकाओं का विधि विधान से पूजन करें, तो शौर्य, धैर्य, वीर्यादि बढ़ते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा को स्नान-दान

कार्तिक मास में पूरे मास स्नान का अत्यधिक महत्व है। जो लोग पूरे मास स्नान करते हैं, उनका व्रत कार्तिक पूर्णिमा के स्नान से पूर्ण होता है। स्नान आदि के बाद गाय, हाथी, रथ, घोड़ा और घी का दान करने से संपत्ति में वृद्धि होती है। इस दिन नक्तव्रत करके बैल का दान करने से शिवपद प्राप्त होता है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन उपवास करने और भगवान का स्मरण करने से अग्निष्टोम के समान फल प्राप्त होकर सूर्य लोक की प्राप्ति होती है।

देव दीपावली को सुवर्णमय भेड़ का दान करने से ग्रह योग के कष्ट दूर हो जाते हैं।

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