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आर्थिक सर्वेक्षण: विकास दर 6-6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान-सुस्ती का दौर खत्म होगा

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आर्थिक सर्वेक्षण: विकास दर 6-6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान-सुस्ती का दौर खत्म होगा

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक सर्वे पेश करते हुए कहा है कि आर्थिक विकास दर में सुस्ती का दौर खत्म होने की संभावना है। अगले वित्त वर्ष 2020-21 में विकास दर सुधरकर 6-6.5 फीसदी हो सकती है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान आर्थिक विकास दर पांच फीसदी रहने का अनुमान है जो पिछले 11 साल में सबसे धीमी विकास दर होगी।

रफ्तार के लिए राजकोषीय घाटे में ढिलाई जरूरी

वित्त मंत्री ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए आर्थिक सर्वे लोकसभा में पेश किया। आज से ही शुरू हुए बजट सत्र के दौरान केंद्रीय आम बजट कल एक फरवरी को पेश किया जाएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के लिए रोजकोषीय घाटे के लक्ष्य में ढिलाई बरतने की आवश्यकता है ताकि विकास दर को रफ्तार दी जा सके। उन्होंने कहा कि अगले एक अप्रैल से शुरू होने वाले अगले वित्त वर्ष में विकास दर 6-6.5 फीसदी के बीच रहने की संभावना है।

सर्वे में कहा गया है कि आर्थिक विकास दर की सुस्ती का दौर खत्म हो रहा है। जीडीपी विकास दर में सुस्ती विकास दर के चक्र का हिस्सा है। सरकार को अगले वित्त वर्ष में विकास दर तेज करने के लिए आर्थिक सुधारों पर तेजी से काम करना होगा।

पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था दूर की कौड़ी

पिछले साल जुलाई में चालू वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था को 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आर्थिक विकास दर आठ-नौ फीसदी के बीच रहना आवश्यक है। ऐसे में मौजूदा िवकास दर को देखते हुए यह लक्ष्य हासिल करना बहुत मुश्किल दिखाई देता है।

रफ्तार के लिए नए विचारों की दरकार

विकास दर को रफ्तार देने के लिए सर्वे में नए विचारों और तरीकों की जरूरत बताई है। जैसे विश्व के लिए भारत में असेंबल करने पर जोर दिया जा सकता है। इससे रोजगार पैदा होंगे। देश में कारोबार करना और आसान बनाने के लिए सर्वे में बंदरगाहों पर नौकरशाही खत्म करने पर जोर दिया गया है ताकि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। कारोबारी सुगमता के लिए प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन, कर भुगतान और अनुबंध लागू करने नियम आसान बनाने होंगे। बजट पूर्व सर्वे में कहा गया है कि संपदा के वितरण के लिए सबसे पहले इसके निर्माण पर जोर देना होगा। इसलिए संपदा के निर्माताओं को सम्मान देने की जरूरत है।

सरकारी बैंकों में गवर्नेंस सुधार पर जोर

सर्वे में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में गवर्नेंस सुधार पर जोर दिया गया है और ज्यादा सूचनाएं सार्वजनिक करने की बात कही गई है। इसमें बैंकिंग सेक्टर की समस्या पर विस्तार से चर्चा की है। सर्वे में बाजार और अर्थव्यवस्था की सहूलियत के लिए दस नए आइडियाज पर काम करने पर जोर दिया है।

सर्वे के अनुसार प्याज जैसी खाद्य वस्तुओं के मूल्य में स्थिरता लाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप अप्रभावी प्रतीत होते हैं। दो वॉल्यूम वाले आर्थिक सर्वे की प्रतियां इस साल बैंगनी रंग में छापी गई हैं। देश में प्रचलित 100 रुपये का करेंसी नोट इसी रंग का है।

आर्थिक सर्वे की खास बातें

चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विकास दर में सुधार के पीछे दस कारक हैं जिनमें विदेशी निवेश और मांग में वृद्धि के अलावा जीएसटी में राजस्व में बढ़ोतरी भी शामिल है।

अप्रैल-नवंबर 2019 के बीच केंद्र का राजस्व संग्रह 4.1 फीसदी बढ़ा।

रफ्तार मे तेजी लाने को सुधार कार्यक्रम में तेजी लाने के लिए सरकार से सिफारिश।

2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी के लिए ईमानदारी के साथ संपदा सृजन महत्वपूर्ण।

औपचारिक रोजगारों की हिस्सेदारी 2017-18 में बढ़कर 22.8 फीसदी हो गई जबकि वर्ष 2011-12 मे 17.9 फीसदी थी। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का विकास दिखाई देता है।

2024-25 तक पांच ट्रिलियन डॉलर जीडीपी हासिल करने के लिए भारत को इन वर्षों में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 1.4 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने होंगे।

वर्ष 2011-12 से 2017-18 के बीच नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए 2.62 करोड़ नई नौकरियां पैदा हुई। ये नौकरियां ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पैदा हुए।

वर्ष 2011-12 से 2017-18 के बीच महिलाओं के लिए नियमित रोजगार 8 फीसदी बढ़े।

बाजारों में सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप हुआ जिससे आर्थिक स्वतंत्रता बाधित होती है। जबकि बाजार खुद ही नागरिकों की भलाई के लिए यह काम कर सकता है।

कर्ज माफी ने क्रेडिक कल्चर प्रभावित की। इससे किसानों को औपचारिक कर्ज की सुविधा बाधित हुई।

सरकार से रिफारिश की गई है कि वह ऐसे क्षेत्रों पर गौर करे जहां वह अनावश्यक दखल देती है और बाजार शक्तियों का नजरंदाज करती है।

विश्व बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के कारण चालू खाते के घाटे में कमी। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में निर्यात के मुकाबले आयात तेजी से घटा।

महंगाई की दर अप्रैल 2019 में 3.2 फीसदी थी जो दिसंबर 2019 में घटकर 2.6 फीसदी रह गई। इससे अर्थव्यवस्था में मांग का दबाव कम होने के संकेत मिलते हैं।

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