वाराणसी कई चीज़ों के लिए प्रख्यात है लेकिन इसकी असल रौनक गंगा घाटों से है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से इस प्राचीन आध्यात्मिक नगरी में कई स्तरों पर काम हुआ है.

यहां सड़कें बेहतर हुई हैं और घाटों की स्थिति भी पहले के मुक़ाबले बेहतर दिखती है.

वाराणसी के विकास को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा, विवाद और मतभेद हैं.

लेकिन पांच साल में उन लोगों का जीवन क्या बदला है जो बनारस के अहम किरदार माने जाते हैं?

हमने ऐसे पांच लोगों से बात की जो बनारस की पहचान के अहम किरदार हैं.

उन्हीं के शब्दों में पढ़िए पांच साल में उनके जीवन में क्या बदला:

बुनकर मोहम्मद अजमल अंसारी
Image captionबुनकर मोहम्मद अजमल अंसारी

बुनकरः मोहम्मद अजमल अंसारी, 58 वर्ष

(बनारस अपनी रेशमी साड़ियों के लिए मशहूर है और यहां के रेशम उद्योग की चर्चा 12वीं-14वीं सदी से बताई जाती है. यहां के बुनकर अपने काम में बड़े हुनरमंद माने जाते हैं.)

मैं सिगरा के पास लल्लापुरा में रहता हूं और बीते चालीस साल से हथकरघे (हैंडलूम) से बुनाई का काम कर रहा हूं. ये हमारा पुश्तैनी काम है.

बीते पांच साल में मेरी ज़िंदग़ी और पीछे चली गई है. पांच साल पहले हमारे चार हथकरघे चल रहे थे लेकिन तीन हमें बंद करने पड़े और अब एक ही चल रहा है.

अपने बच्चों को ये काम नहीं सिखाया क्योंकि उनका भविष्य बर्बाद हो जाता. वो मशीन के काम में चले गए हैं और अब धागे का काम करते हैं.

पहले हम अपना माल ख़ुद बाज़ार में बेचते थे लेकिन अब मज़दूर की तरह काम करते हैं. मशीन वाले जब से आए उनका माल सस्ता पड़ने लगा और हमारा बाज़ार ख़त्म हो गया. अब हमें प्रति दिन 200 से 250 रुपये मज़दूरी मिलती है. पांच साल पहले 300-350 रुपये मिल जाते थे. अब महंगाई भी बढ़ गई है और आमदनी घट गई है.

हमारी ज़िंदग़ी पर इसका असर ये हुआ कि अपने बच्चों की पढ़ाई बंद करनी पड़ी. हमारी दो लड़कियों ने बीए, एक ने बारहवीं और दो लड़कों ने दसवीं तक पढ़ाई की है.

सोचा ज़रूर था पहले कि कभी अच्छा घर बनाएंगे पर अब स्वीकार कर लिया है कि हमें इसी मकान में रहना है और यहीं मरना है.

प्रधानमंत्री ने हम लोगों के लिए जो पैकेज का ऐलान किया, वो हमारे लिए ठीक था. लेकिन वो हम तक पहुंचा क्यों नहीं? ये बात प्रधानमंत्री को पता करनी चाहिए.

बनारस, वाराणसी, काशी

सरकार कर्मचारियों की तनख़्वाह महंगाई के हिसाब से बढ़ाती है पर हम और पीछे धकेल दिए गए हैं. हम अपनी ज़िंदग़ी में कितनी कटौती करेंगे?

पहले बनारस में सैकड़ों की तादाद में हथकरघे थे लेकिन आज वो सिमट कर दहाई के अंक में रह गए हैं. लोग पावरलूम की ओर चले गए हैं लेकिन वहां भी अब हालात बहुत अच्छे नहीं रहे.

58 उम्र हो गई है, ज़्यादा समय तो बचा नहीं है. हमने अपनी ज़िंदग़ी में बनाया क्या? एक ही चीज़ सोची थी कि बच्चों को अच्छी तालीम देंगे, वो भी नहीं हो पाया.

नाविक दिनेश मांझी
Image captionनाविक दिनेश मांझी

नाविकः दिनेश मांझी, 37 वर्ष

(वाराणसी की पहचान घाटों और नावों से भी है. यहां के घाटों पर मांझी परिवारों के बीच नावों का संचालन बंटा हुआ है. नाविक वाराणसी के अहम किरदार हैं.)

हम 11 साल की उम्र से काशी के अस्सी घाट पर नाव चला रहे हैं. 2014 से पहले हमारे पास एक नाव थी, अब चार नावें हो गई हैं.

प्रधानमंत्री के यहां से जीतने के बाद हमारे जीवन में बदलाव तो आया है. कस्टमर ज़्यादा आने लगे हैं तो धंधा बेहतर हो गया है.

आज से सात-आठ साल पहले बिल्कुल कस्टमर नहीं थे लेकिन अब पर्यटक बढ़ रहे हैं.

घाटों पर सफ़ाई भी बेहतर हुई है, इसलिए लोग भी ज़्यादा आने लगे हैं.

2014 से पहले हमें कस्टमर ढूंढना पड़ता था और दिन भर में 300-400 रुपये कमा लेते थे अब 1000-1500 रुपये कमा लेते हैं.

सितंबर से सीज़न आ जाएगा तब दिन भर पर्यटक रहते हैं और हमारी अच्छी आमदनी हो जाती है.

बनारस, वाराणसी, काशी

सभी नाविकों की आमदनी बढ़ गई है. अस्सी घाट पर चार परिवारों की नावें चलती हैं. सबकी आमदनी बढ़ी है.

हमारा घर का ख़र्च आराम से चल जाता है और दो पैसे बचा भी लेते हैं. मेरा बेटा निजी स्कूल में पढ़ता है, यूकेजी में.

हमें लगता है कि शायद हम लोगों को अब भविष्य में भी कभी दिक्कत नहीं होगी.

हम लोगों की जाति से कुछ लोग पहले कांग्रेस के साथ थे, लेकिन वे भी अब बीजेपी को ही वोट दे रहे हैं.

पंडित कृष्ण कुमार तिवारी
Image captionपंडित कृष्ण कुमार तिवारी

पुरोहित (पंडा): पंडित कृष्ण कुमार तिवारी, 62 वर्ष

(हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, वाराणसी भगवान शिव की नगरी है. यहां आने वाले तीर्थयात्री घाट किनारे तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं. ये अनुष्ठान यहां घाट किनारे बैठने वाले पुरोहित/पंडे कराते हैं.)

मैं तीर्थ पुरोहित हूं और दशाश्वमेध घाट पर बीते चालीस वर्षों से बैठता हूं. इसके पहले मेरे पिता, चाचा, दादा, भाई सब लोग यही काम करते रहे हैं.

जब हम लोगों ने यहां बैठना शुरू किया तो शहरवासियों से हमें दस-बीस रुपये मिलते थे. तब से धीरे धीरे आमदनी बढ़ी. लेकिन इन पांच साल में पर्यटन उद्योग तेज़ी से बढ़ा और यहां घाट के आस-पास सभी का कारोबार बेहतर हुआ.

हमारी आमदनी भी बिल्कुल बढ़ी. 2014 से पहले 200-300 रुपये मिलते थे और आज अच्छे दिनों में 1000-2000 रुपये भी मिल जाते हैं.

मेरे परिवार में एक बेटा है और पत्नी हैं. बेटा टूर एंड ट्रेवल्स का काम करता है. ऐसा तो नहीं है कि बीते पांच साल में हमारी कोई संपत्ति बनी हो. पर जीवन में समृद्धि इस तरह है कि खाना-नहाना आनंद से है और पुश्तैनी घर है ही. बाबा के दरबार में मज़ा ले रहे हैं.

बनारस, वाराणसी, काशी

ये ज़रूर सोचते हैं कि जब तक संभव हो मोदी जी बने रहें. 2014 से पहले ये बात नहीं थी. साफ़-सफ़ाई और व्यवस्थाएं नहीं थीं. पहले सिर्फ़ सीज़न में यात्री आते थे और अब हर सीज़न में आते हैं.

आमदनी बढ़ी है तो जीवन बेहतर हुआ ही है. पानी टैक्स, बिजली टैक्स, आवास टैक्स, साग-सब्ज़ी, मेहमान का आवागमन और रोज़मर्रा का घर ख़र्च सब आराम से निपट जाता है. बाक़ी बांधकर तो यहां से लेकर जाएंगे नहीं.

हम एकदम प्रसन्न हैं. हमारे चेहरे से नहीं लग रहा क्या? एकदम चकाचक हैं.

रिक्शा वाला बंसराज
Image captionरिक्शा वाला बंसराज

रिक्शा वालाः बंसराज, 43 वर्ष

(वाराणसी के घाटों के किनारे गलियां हैं और व्यस्त ट्रैफ़िक के बीच यहां लंबे समय से रिक्शे वालों की ख़ासी मौजूदगी रही है. बनारस में गोदौलिया चौहारे से लेकर घाटों के किनारे किनारे तक रिक्शे वालों का एक जमघट दिखता है.)

मैं बनारस में, ख़ास तौर से गोदौलिया इलाक़े में 17 साल से रिक्शा चला रहा हूं.

बीते पांच साल में हमारे लिए कुछ नहीं बदला बल्कि परेशानी हो गई.

जब से बैटरी रिक्शा चला है हमारी कमाई बहुत कम हो गई. हम लोग भगाए जाते हैं. बैटरी रिक्शा वाले लोग पैसा देते हैं, हम लोग दे नहीं पाते हैं.

पांच साल पहले तक चार-पांच सौ का धंधा हो जाता था. अब दो-ढाई सौ होना भी मुश्किल हो गया है. पांच साल से सौ-डेढ़ सौ रुपया प्रतिदिन की कमाई कम हो गई है.

हमारे पांच बच्चे हैं. तीन लड़की और दो लड़के. यही रिक्शा चलाकर पढ़ा रहे हैं. तीन बच्चे प्राइवेट में हैं और दो सरकारी में. सबको प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़ा सकते.

बनारस, वाराणसी, काशी

सुबह और शाम को जब समय मिलता है तो अब खेती-बाड़ी में मज़दूरी का काम भी कर लेते हैं. पांच साल पहले उसकी ज़रूरत नहीं पड़ती थी.

बीते पांच साल में सड़कों का फैलाव हुआ है और बताइए हमें क्या लाभ हुआ है. कुछ नहीं हुआ.

हम लोगों को ऑटो से कोई नुकसान नहीं है लेकिन बैटरी रिक्शा से है. हम बैटरी रिक्शा ख़रीद नहीं सकते. पुलिस वाले पैसा लेते हैं, वो भी हम नहीं दे पाएंगे. सरकार को इस बारे में हमारी मदद करनी चाहिए.

डोम राजा, शालू चौधरी
Image captionशालू चौधरी

डोम राजाः शालू चौधरी, 29 वर्ष

(यहां का मणिकर्णिका घाट अंतिम संस्कारों के लिए जाना जाता है. यहां शव जलाने वाले लोग डोम राजा कहलाते हैं. डोम जाति को श्मशान का चौकीदार भी कहा जाता है.)

मैं बीते छह-सात साल से मणिकर्णिका घाट पर शव जलाने का काम कर रहा हूं. ये हमारा पुश्तैनी काम है और हमारे बाप-दादा-रिश्तेदार भी यही काम करते हैं.

बीते पांच साल में कुछ स्तरों पर बदलाव ज़रूर हुआ है. नि:शुल्क शववाहिनी से मुर्दा वालों को सुविधा मिली है. घाट के ऊपर की तरफ़ जो लाशें जलती थीं, वहां टिन शेड और चिमनी वगैरह लग रहा है तो हमारे लिए हालात बेहतर हुए हैं.

हालांकि हमारे घर-परिवार में कोई विशेष समृद्धि तो नहीं आई है लेकिन उम्मीदें बनी हुई हैं.

आमदनी से ख़ास मतलब नहीं है क्योंकि मसाननाथ की कृपा से हमें मसान पर इतना मिल जाता है कि काम आसानी से चल जाता है. दाल-रोटी आराम से चल जाती है. पांच साल पहले भी स्थिति ठीक ही थी.

एक आदमी काम करके परिवार के दस-बारह लोगों का पेट भर लेता है.

मैंने बारहवीं तक पढ़ाई की है. फिर लगा कि अपना बना बनाया काम ही किया जाए. ये पेशा छोड़ने के बारे में नहीं सोचा क्योंकि अपना काम छोड़कर भाग नहीं सकते. ये हमारे लिए ज़िम्मेदारी है.

बनारस, वाराणसी, काशी, मणिकर्णिका घाट
Image captionमणिकर्णिका घाट

कहीं सरकारी नौकरी मिले तो हम करना ज़रूर चाहेंगे, पर इधर उधर काम करने से तो यही बेहतर है.

महंगाई बढ़ी है लेकिन आमदनी भी उसी हिसाब से बढ़ी है. हमें कोई आर्थिक समस्या नहीं है.

इस बार प्रधानमंत्री के चुनाव प्रस्तावकों में एक डोम राजा भी हैं, वो हमारे मामा ही लगते हैं. हमें बहुत गर्व महसूस होता है कि प्रधानमंत्री ने हमारी बिरादरी का सम्मान किया.

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