भारत-नेपाल विवाद: ओली क्या चीन के कारण हो गए हैं भारत विरोधी?

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नेपाल और भारत के रिश्ते हमेशा अच्छे ही माने जाते रहे हैं. लेकिन कुछ समय से दोनों देशों के बीच कुछ है, जो ठीक नहीं चल रहा है.

बात यहाँ तक आ पहुँची है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कह रहे हैं कि उन्हें उनके पद से हटाने के लिए भारत और नेपाल में साज़िश रची जा रही है. नेपाल के प्रमुख अख़बार काठमांडू पोस्ट के मुताबिक़ ओली ने ये बातें 28 जून को एक कार्यक्रम में कही. उन्होंने कहा कि दिल्ली से आ रही मीडिया रिपोर्ट, काठमांडू में भारतीय दूतावास की गतिविधियाँ और अलग-अलग होटलों में चल रही बैठकों से ये समझना मुश्किल नहीं है कि कैसे लोग सक्रिय रूप से उन्हें हटाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वो सफल नहीं होंगे. तो ओली ने सीधे-सीधे भारत सरकार पर आरोप लगाया है लेकिन ओली तो किसी वक़्त भारत के बहुत क़रीब माने जाते थे. तो ऐसा क्या हुआ कि भारत के लिए उनकी कड़वाहट बढ़ गई है?

नेपाल के नए संविधान से शुरू हुआ मामला

2015 में नेपाल का नया संविधान लागू हुआ, तो संविधान के मुताबिक़ प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को इस्तीफ़ा देना पड़ा. नए प्रधानमंत्री बने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के केपी शर्मा ओली. उन्हें दूसरी पार्टियों का भी समर्थन हासिल था. लेकिन जुलाई 2016 में जब दूसरी पार्टियों ने उनसे समर्थन खींच लिया तो उनकी सरकार अल्पमत में आ गई और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा. ख़ास बात ये कि तब भी ओली ने कहा था कि भारत इसके लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन क्यों? क्योंकि नेपाल के नए संविधान को लेकर भारत ने भी अपनी आपत्ति जताई थी. भारत का कहना था कि इसमें मधेशी और थारू लोगों की मांग को शामिल नहीं किया गया. इस संविधान को लेकर जब मधेशी और दूसरे अल्पसंख्यकों ने नेपाल सीमा को बंद कर दिया तो ओली सरकार ने भारत को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया. हालाँकि भारत ने इस आरोप को ख़ारिज किया था.

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Image captionनए संविधान के ख़िलाफ़ 2016 में नेपाल में मधेशी और जातीय अल्पसंख्यकों ने कई दिनों तक सड़कों को बंद रखा था

तब भारत से नेपाल में पेट्रोल, दवाइयां और दूसरी कई तरह की सप्लाई पूरी तरह से बंद हो गई थी. 135 दिन तक चली आर्थिक नाकेबंदी के बाद नेपाल और भारत के रिश्तों में खटास आ गई थी और एक तरह की भारत-विरोधी भावना नेपाल में पैदा हुई. ये वो वक़्त था जब नेपाल भूंकप के प्रभावों से पहले ही जूझ रहा था. उस वक्त तो ओली को अपना पद छोड़ना पड़ा लेकिन 2017 में वे दोबारा प्रधानमंत्री बने. कहा जाता है कि वो भारत विरोधी भावना के कारण ही चुनाव जीते थे. भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि को लेकर ओली सख़्त रहे हैं. उनका कहना है कि संधि नेपाल के हक़ में नहीं है. इस संधि के ख़िलाफ़ ओली नेपाल के चुनावी अभियानों में भी बोल रहे थे.

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Image captionजानकार कहते हैं कि ओली राष्ट्रवाद की भावना के सहारे अपने देश की राजनीतिक परिस्थिति से निपटने की कोशिश कर रहे हैं

भारत को लेकर कड़वे बोल क्यों?

लेकिन मामला चुनावों से आगे बढ़ गया. पिछले साल जब भारत सरकार ने जम्मू और कश्मीर और लद्दाख़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद देश का नक़्शा जारी किया, तो इस नक़्शे में कालापानी और लिपुलेख इलाक़ों को भारत के अंदर दिखाया. नेपाल को आपत्ति हुई क्योंकि वो इन इलाक़ों पर अपना दावा करता है. फिर इस साल एक सड़क को लेकर भी दोनों देशों में विवाद हो गया. भारत ने ये सड़क उत्तराखंड से लिपुलेख दर्रे तक बनाई है. नेपाल कहता है कि लिपुलेख दर्रा उसका इलाक़ा है. नेपाल में इसे लेकर भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन हुए. ओली अपनी पार्टी में ही बुरी तरह से घिरे हुए हैं. उन्हीं की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में उनकी ख़ूब आलोचना हुई और इस्तीफ़े की मांग भी ज़ोर पकड़ रही है. आर्थिक मोर्चे पर भी वे कुछ ठोस नहीं कर पा रहे और कोविड 19 से निपटने में नाकामी को लेकर भी उन्हें विरोध झेलना पड़ा है. जानकार कहते हैं कि वे राष्ट्रवाद की भावना के सहारे इस राजनीतिक परिस्थिति से निपटने की कोशिश कर रहे हैं. तभी उनकी कैबिनेट ने पिछले महीने नेपाल का नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया जिसमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया. ऐसा करके उन्होंने उनके प्रतिद्वंद्वियों, पुष्प कमल प्रचंड और माधव कुमार नेपाल को अपना साथ देने के लिए मजबूर कर दिया. इसके अगले दिन भी उन्होंने बयान दिया कि भारत से गैर-क़ानूनी तरीक़े से आने वाले लोग नेपाल में वायरस फैला रहे हैं और इसमें कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि और पार्टी नेताओं का हाथ है. उन्होंने कहा कि ‘भारत का वायरस चीन और इटली से भी ज़्यादा ख़तरनाक है.’ वे भारत को लेकर ऐसे और भी तंज़ कर चुके हैं.

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Image captionअक्तूबर 2019 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल के दो दिन के दौरे पर गए थे

ओली जाना चाहते हैं चीन के क़रीब

ओली के बारे में कहा जाता है कि नेपाल को चीन के क़रीब ले जाने में उनकी दिलचस्पी रही है. नेपाल में चीन की मौजूदगी बढ़ी है. अपने पहले कार्यकाल में भी ओली ने चीन का दौरा किया था और उन्होंने ‘ट्रांज़िट ट्रेड’ समझौते पर हस्ताक्षर किया था. ओली चाहते हैं कि चीन तिब्बत के साथ अपनी सड़कों का जाल फैलाए और नेपाल को भी जोड़े ताकि भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो. आर्थिक नाकेबंदी के बाद नेपाल के लिए यह अहम हो गया था कि वो भारत पर अपनी निर्भरता कम करे. उस वक्त भी ओली सरकार ने चीन से मदद ली थी. भारत चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट वन रोड’ का विरोध कर रहा है. दूसरी तरफ़ ओली सरकार इस परियोजना के साथ है. ओली के बारे में कहा जाता है कि वो चीन से संबंधों को आगे बढ़ाने में भारत की चिंताओं की फ़िक्र नहीं करते हैं. जानकार कहते हैं कि नेपाल के लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि वे आज़ाद रहे हैं, किसी की कॉलोनी या उपनिवेश नहीं बने. इसलिए जब कोई नेपाल की संप्रभुता को कम करके आँकता है तो वहां के लोगों को ग़ुस्सा आता है. नेपाल में ऐसी धारणा है कि भारत साल 2006 के बाद नेपाल की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है. ओली के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने इस चीज़ को मज़बूती से स्थापित करने की कोशिश की है कि नेपाल एक संप्रभु देश है और वो अपनी विदेश नीति को किसी देश के मातहत होकर आगे नहीं बढ़ाएगा.

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