अरसे तक परेशान करता रहेगा बेतरतीब दाढ़ी का दर्द..नजरबंद उमर अब्दुल्ला-महबूबा मुफ्ती पर लगा PSA

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पिछले छह महीने से हिरासत में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सफेद दाढ़ी बेतरतीब तरीके से बढ़ गई है। सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत नजरबंद उनके पिता, पूर्व केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला अपनी बहन खालिदा शाह से लगातार फोन पर बात करते वक्त काटते हैं, तो पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती टीवी समाचार चैनल देखकर। क्लीनशेव रहने वाले उमर अब्दुल्ला की दाढ़ी वाली फोटो 25 जनवरी को सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तो पहचानना मुश्किल था। लिहाजा, सोशल मीडिया पर ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। अगस्त 2019 में नजरबंदी के बाद पहली बार इस तस्वीर के जरिए लोगों के सामने आए उमर अब्दुल्ला मुस्करा भी रहे थे और उनकी जैकेट पर बर्फ के फाहे भी पड़े थे, लेकिन इसका संदेश विचलित कर रहा था। नेशनल कॉन्‍फ्रेंस के एक नेता ने कहा, “यह फोटो कश्मीर में लंबे अरसे तक भारतीय लोकतंत्र को परेशान करता रहेगा। कुछ घटनाएं देश और समुदायों में कभी भुलाए नहीं भूलतीं, न कभी उन्हें माफ किया जा सकता है। आज कश्मीरी चुप हैं, लेकिन कल वे इसके बारे में और पिछले छह महीने में घाटी में जो हुआ, उसके बारे में जवाब मांगेंगे।”

 दाढ़ी के संदेशः उमर अब्दुल्ला

पांच फरवरी को दो पूर्व मुख्यमंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती और मुख्यधारा के अन्य नेताओं की सीआरपीसी की धारा 107 के तहत नजरबंदी के छह महीने पूरे हो गए। सरकार उनकी नजरबंदी को आगे बढ़ा सकती है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि नेताओं की नजरबंदी के बारे में सरकार को फरवरी के पहले सप्ताह में फैसला लेना होगा, क्योंकि इन नेताओं ने धारा 107 के तहत ‘शांति’ बनाए रखने के लिए आवश्यक बांड पर हस्ताक्षर नहीं किया है। इन नेताओं को धारा 107 के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश पर हिरासत में लिया गया था। फारूक अब्दुल्ला के मामले में सरकार के सामने ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है, क्योंकि उन पर पीएसए लगाया गया है।

एक अधिकारी ने कहा, “सामान्य प्रक्रिया के तहत कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पर पुलिस सीआरपीसी की धारा 151 के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेती है और 24 घंटे के भीतर उसे अदालत में पेश करना होता है। लेकिन नेताओं के मामलों में जिला मजिस्ट्रेट धारा 107 के तहत उन्हें हिरासत में लेने का आदेश दे सकते हैं, या उनके घरों को उप-जेल में तब्दील कर सकते हैं।” पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के अलावा सज्जाद लोन और शाह फैजल जैसे नेताओं ने रिहा किए गए दूसरे नेताओं की तरह जमानत के लिए यह बांड नहीं भरा है। ऐसे में, पुलिस को उन्हें हिरासत में लेने के छह महीने के भीतर धारा 117 के तहत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

पुलिस रिपोर्ट और गृह विभाग के एडवायजरी बोर्ड की सिफारिश के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं के बारे में आगे का फैसला किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि एक साल तक उन्हें हिरासत में रखने के लिए धारा 107 के तहत पर्याप्त कानूनी गुंजाइश है। कश्मीर में लंबे समय तक इस धारा का इस्तेमाल नहीं किया गया, लेकिन पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सरकार ने इसी धारा के तहत 6,000 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया। सरकार ने बांड पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकांश नेताओं को रिहा कर दिया है। इस बांड में उन्हें वादा करना होता है कि वे हाल की घटनाओं पर कोई बात नहीं करेंगे। इससे स्पष्ट है कि वे अनुच्छेद 370 के बारे में कोई चर्चा नहीं करेंगे। लेकिन तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत करीब 1,000 लोग अभी तक धारा 107 और पीएसए के तहत नजरबंद हैं।

एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “पुलिस ने नेताओं और अन्य लोगों को धारा 151 के तहत गिरफ्तार किया होता, तो उन्हें जमानत मिल जाती या अदालतें आरोपों को खारिज करके नजरबंदी 24 घंटे में ही खत्म कर देतीं। इस वजह से ब्रिटिश काल की धारा 107 का इस्तेमाल किया गया।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि न तो उन्होंने और न ही सरकार में किसी अन्य ने तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दिया है। इस पर नेशनल कॉन्‍फ्रेंस के सांसद हसनैन मसूदी ने आउटलुक से कहा, “जब केंद्रीय गृह मंत्री कहते हैं कि नजरबंद तीनों पूर्व मुख्यमंत्री राष्ट्रविरोधी नहीं हैं तो स्थानीय प्रशासन को इन नेताओं को तत्काल रिहा करना चाहिए, क्योंकि अब उन्हें हिरासत में रखने का कोई आधार नहीं है।” पूर्व एडवोकेट जनरल जहांगीर गनई कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार किसी व्यक्ति को सीआरपीसी की धारा 107 के तहत छह महीने के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। इस दौरान मजिस्ट्रेट को जांच पूरी करनी होती है।

हालांकि डॉ. फारूक अब्दुल्ला की बहन सुरैया अब्दुल्ला और उनकी बेटी साफिया अब्दुल्ला की जमानत करवाने वाले एडवोकेट अल्ताफ खान कहते हैं कि धारा 107 में हिरासत में लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसलिए सभी लोगों की नजरबंदी अवैध है।

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गए जन संवाद को, कर आए प्रोजेक्ट पर्यटन

फीता काटने का सुखः श्रीनगर के रावलपोरा में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद

कश्मीरियों के लिए ‘नया कश्मीर’ का नारा और नई सुबह के वादे नए नहीं हैं। प्रसिद्ध कश्मीरी नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पहले नेता थे, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के लिए नई सुबह का वादा किया। उन्होंने 1950 के दशक में नेशनल कॉन्‍फ्रेंस की स्थापना के साथ  क्रांतिकारी दस्तावेज ‘नया कश्मीर’ पेश किया जिसमें महिला अधिकार, भूमि सुधार और शिक्षा पर जोर देने के साथ समतावादी समाज बनाने की बात थी।

शेख अब्दुल्ला ने 9 अगस्त 1953 को अपनी गिरफ्तारी से पहले राज्य में भूमि सुधारों पर काम किया। नई दिल्ली और श्रीनगर में बैठे नेताओं के लिए ‘नया कश्मीर’ कई दशकों तक पसंदीदा नारा बना रहा। पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद से लेकर गुलाम नबी आजाद तक, तमाम नेताओं ने कश्मीरियों के लिए नई सुबह का वादा किया, भले ही कश्मीर लगातार संवैधानिक गारंटी खोता चला गया। जम्मू-कश्मीर की राजनैतिक ताकत को आखिरी झटका पिछले साल 5 अगस्त को लगा जब केंद्र की भाजपा सरकार ने अनुच्छेद 370 में बदलाव करते हुए उसका दर्जा राज्य से घटाकर केंद्रशासित प्रदेश कर दिया। इसके बाद 24 जनवरी 2020 को केंद्रीय विधि, न्याय, संचार और आइटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने घाटी में नई सुबह का वादा फिर दोहराया। 20 जनवरी से 24 जनवरी तक 37 मंत्रियों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया, उनमें रविशंकर प्रसाद भी थे। उत्तरी कश्मीर के सोपोर में उन्होंने कहा कि कश्मीर में जल्द ही शांति और विकास की नई शुरुआत दिखेगी। 37 मंत्रियों में से सिर्फ पांच ने घाटी का दौरा किया, बाकी ने पंचायत घरों, कॉलेज के सामुदायिक भवनों और ग्रामीण योजनाओं का उद्‍घाटन-शिलान्यास करके समय बिताया। सरकार का कहना था कि मंत्रियों के दौरों का उद्देश्य लोगों को सरकार की नीतियों की अहमियत और पिछले पांच महीनों में किए गए विकास कार्यों की जानकारी देना है। लेकिन घाटी के दस जिलों में से सात जिलों में कोई मंत्री गया ही नहीं। इनमें कुपवाड़ा, बांदीपोरा, बडगाम, पुलवामा, अनंतनाग, शोपियां और कुलगाम शामिल हैं।

मंत्रियों ने ट्यूबवेल, सड़कों, नालों और रोड प्रोटेक्शन वाल जैसी अनेक ‘परियोजनाओं’ का उद्‍घाटन किया। मंत्रियों के दौरों की व्यवस्था केंद्रीय गृह मंत्रालय ने की थी। रेलवे और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अखनूर में चिनाब नदी के तट पर 3.25 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले घाट का उद्‍घाटन किया। ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा, कौशल िवकास और उद्यमिता राज्यमंत्री आर.के. सिंह ने पुल डोडा स्थित डोडा स्पोर्ट्स सेंटर के कम्युनिटी हॉल में राज्य सरकार के विभागों की दुकानों का फीता काटा। इन दुकानों में विभागों के उत्पाद प्रदर्शित किए जा रहे हैं।

वस्‍त्र, महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जूनी नाला के ऊपर स्टील के फुट-ओवर ब्रिज के अलावा परोह-अली और कदमाल-धन्ना सड़कों का उद्घाटन किया। वित्त और कंपनी मामलों के राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने नगरोता के प्राइमरी हेल्थ सेंटर में एक एंबुलेंस समर्पित की। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के राज्यमंत्री जनरल (रिटायर्ड) वी.के. सिंह ने मांड में वेटनरी हॉस्पिटल बिल्डिंग और चाक में बिजली के सब-स्टेशन का उद्‍घाटन किया। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्वनी कुमार चौबे ने हरसाथ ग्राम पंचायत में जलापूर्ति योजना का उद्‍घाटन किया। उन्होंने जम्मू के गांधीनगर अस्पताल में राष्ट्रीय प्रतिरक्षण दिवस पर कार्यक्रम की शुरुआत भी की। विदेश और संसदीय मामलों के राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन ने कठुआ जिले के गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में मल्टीपर्पज हॉल का उद्‍घाटन किया और एक गांव में राज्य विवाह सहायता योजना के तहत लोगों को स्वीकृति पत्र वितरित किए। जल संसाधन, नदी विकास, गंगा पुनरोद्धार और संसदीय मामलों के राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पथियारा पंचायत में ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल की बिल्डिंग का उद्‍घाटन किया, महानपुर ब्लॉक के मारा पत्ती गांव में स्पोर्ट्स स्टेडियम का शिलान्यास इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया और वृक्षारोपण कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

पीएमओ में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने ऊधमपुर में पीएम किसान स्कीम के स्वीकृति पत्र, आयुष्मान भारत के गोल्डन कार्ड और पेंशनधारियों को स्वीकृति पत्र वितरित किए। उन्होंने खेलो इंडिया के तहत छात्रों को स्पोर्ट्स किट भी वितरित कीं।

जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के चेयरपर्सन और राज्य के पूर्व मंत्री हर्ष देव सिंह ने मंत्रियों के दौरों को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दिया। पार्टी के प्रेंसिडेंट बलवंत मनकोटिया ने कहा कि केंद्रीय मंत्रियों के हाथों से उद्‍घाटन के लिए ये परियोजनाएं बहुत छोटी हैं। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. मनोहर लाल शर्मा ने आरोप लगाया कि बिलावर में गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज के जिस मल्टीपर्पज हॉल का उद्‍घाटन वी. मुरलीधरन ने किया है, उसके निर्माण की मंजूरी 2011-12 में दी गई थी। तब वह जम्मू-कश्मीर के उच्च शिक्षा राज्यमंत्री थे और हॉल पर 5.06 करोड़ रुपये लागत का अनुमान था। उन्होंने भाजपा पर पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू और पूरी की गई परियोजनाओं का फीता काटने और वाहवाही बटोरने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस हॉल का काम जेएंडके प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिया गया था और कुछ वर्ष पहले पूरा भी हो गया था।

कांग्रेस ने ट्वीट किया, “भाजपा प्रोपेगंडा अभियान में जुट गई है। उसने कश्मीरियों को अनुच्छेद 370 हटाने के फायदे बताने का फैसला किया है। यह पहली सरकार है जो पहले कानून पारित करती है और बाद में लोगों से समर्थन मांगती है। कश्मीर में दौरे के लिए विपक्षी नेताओं को कब अनुमति दी जाएगी?”

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर कुछ ज्यादा नाराज हैं। उन्होंने कहा, “मंत्रियों ने उन परियोजनाओं का शिलान्यास किया है, जिनका विधायक पहले ही उद्‍घाटन कर चुके हैं। हाइप्रोफाइल मंत्री स्मृति ईरानी ने फुटओवर ब्रिज का शिलान्यास किया। अब तो विधायक भी फुटओवर ब्रिज का शिलान्यास करने को तैयार नहीं होते हैं। मुख्तार अब्बास नकवी ने मेरे चुनाव क्षेत्र डूरू में एक रिजर्व टैंक का ई-उद्‍घाटन किया। उन्होंने एसकेआइसीसी, श्रीनगर से इसका उद्‍घाटन किया और अखबारों में इसकी लागत 2.5 करोड़ रुपये बताई गई। वास्तव में यह पुराना टैंक है जिसे 20 लाख रुपये में तैयार किया गया था। एक केंद्रीय मंत्री ने बनिहाल में स्कूल का उद्‍घाटन किया जिसे 2014 में तैयार किया गया था। इस स्कूल का उद्‍घाटन पहले भाजपा के विधायक ने किया था।” मीर कहते हैं कि पिछले साल सरकार ने संविधान में जो संशोधन किए, उससे जम्मू में भाजपा के मतदाता नाराज हैं। वे अपनी जमीन और नौकरियों को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मीर का कहना है कि मंत्री जनता को सांत्वना देने आए थे। लेकिन जनसंपर्क अभियान से सांत्वना देने के बजाय जनता का मखौल उड़ाया। यह ‘नई सुबह’ नहीं है।

मीर ने कहा, “वित्त मंत्री ने बजट भाषण में कश्मीरी कवि नदीम साहब (दीनानाथ नदीम) की कविता का उल्लेख किया। शायद उन्हें पता नहीं कि नदीम ने यह कविता शेख अब्दुल्ला के सम्मान में लिखी थी।” वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में नदीम की कविता म्यों वतन (मेरा देश) का उल्लेख किया था। नदीम वामपंथ से प्रभावित कवि थे, उन्होंने शेख अब्दुल्ला के सम्मान में उस समय यह कविता पाठ किया था, जब उन्हें 1946 में जेल से रिहा किया गया। यह अजीब विडंबना है कि जब निर्मला सीतारमण ने नदीम की कविता पढ़ी, उस समय शेख अब्दुल्ला के पुत्र फारूक अब्दुल्ला और पौत्र उमर अब्दुल्ला अगस्त 2019 से जेल में बंद हैं।

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मंत्रियों के दौरों का उद्देश्य सरकारी नीतियों की अहमियत की जानकारी देना है। लेकिन घाटी के दस जिलों में से सात जिलों में कोई मंत्री गया ही नहीं

कश्मीर में नजरबंद उमर अब्दुल्ला-महबूबा मुफ्ती पर लगा PSA, चिदंबरम बोले- यह लोकतंत्र का सबसे घटिया कदम

कश्मीर में नजरबंद उमर अब्दुल्ला-महबूबा मुफ्ती पर लगा PSA, चिदंबरम बोले- यह लोकतंत्र का सबसे घटिया कदम

जम्मू-कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) लागू किया गया है। पिछले 6 महीनों से दोनों नेताओं को नजरबंद किया गया है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से ही दोनों पूर्व मुख्यमंत्री हिरासत में हैं। वहीं, पीएसए लागू होने के साथ ही दोनों नेताओं को बिना ट्रायल के तीन महीने की जेल भी हो सकती है। जानकारी के मुताबिक दोनों नेताओं पर सीआरपीसी की धारा 107 के तहत पीएसए में केस दर्ज किया गया है। वहीं, केंद्र सरकार के इस कदम पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं। प्रशासन के इस फैसले पर जहां पीडीपी भड़क उठी है वहीं, पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मोदी सरकार पर हमला बोला है।

बता दें कि उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती से पहले, दिन में नेशनल कॉन्फ्रेंस के महासचिव तथा पूर्व मंत्री अली मोहम्मद सागर और पीडीपी के वरिष्ठ नेता सरताज मदनी पर भी पीएसए लगाया गया।

राजनीतिक दलों ने की निंदा

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) लगाने पर पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, “उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और अन्य के खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) की क्रूर कार्रवाई से हैरान हूं। आरोपों के बिना किसी पर कार्रवाई लोकतंत्र का सबसे घटिया कदम है। जब अन्यायपूर्ण कानून पारित किए जाते हैं या अन्यायपूर्ण कानून लागू किए जाते हैं, तो लोगों के पास शांति से विरोध करने के अलावा क्या विकल्प होता है?”

उन्होंने आगे कहा, “ पीएम मोदी का कहना है कि विरोध प्रदर्शन से अराजकता होगी और संसद-विधानसभाओं द्वारा पारित कानूनों का पालन करना होगा। वह इतिहास और महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला के प्रेरक उदाहरणों को भूल गए हैं।”

प्रशासन के इस फैसले पर पीडीपी के प्रवक्ता मोहित भान ने कहा, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के खिलाफ पीएसए लगाए जाने की पीडीपी कड़ी आलोचना करती है। प्रवक्ता ने कहा, अगर सरकार का विरोध करने पर मुख्यधारा के नेताओं पर मुकदमे होते हैं तो यह लोकतंत्र की हत्या है।

पीडीपी ने कहा कि इस तरह के ‘अलोकतांत्रिक’ कदम उठाकर केंद्र लोगों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। पीडीपी के प्रवक्ता ने कहा, ”जम्मू-कश्मीर में यदि सबकुछ सामान्य है तो मुख्यधारा के नेताओं के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव क्यों किया जा रहा है?”

दोनों नेताओं को सौंपा गया डॉजियर 

साल 2000 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में विदेश राज्य मंत्री तथा वाणिज्य मंत्री रहे उमर को तीन पन्नों का एक डॉजियर सौंपा गया है, जिसमें उनपर अतीत में व्यवस्था के खिलाफ बयान देने का आरोप है। उमर 2009 से 2014 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ भी पिछले साल सितंबर में पीएसए के तहत मामला दर्ज किया था, जिसकी दिसंबर में समीक्षा की गई थी।

इसी प्रकार, मजिस्ट्रेट और एक पुलिस अधिकारी ने महबूबा मुफ्ती के सरकारी आवास पर जाकर उन्हें 2010 में दिये गए बयानों को लेकर डॉजियर सौंपा, जिसमें उन भाषणों को उन्हें हिरासत में रखने का कारण बताया। महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी 2014 से भाजपा की सहयोगी पार्टी थी। दोनों ने मिलकर 2018 तक जम्मू-कश्मीर में सरकार चलाई। भाजपा ने अचानक सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिसके बाद वहां राज्यपाल शासन लगा दिया गया।

यह फैसला केंद्र के जम्मू-कश्मीर में सामान्य हालात के दावे पर लगाता है सवालिया निशाना

माकपा की जम्मू-कश्मीर इकाई ने केंद्र के इस कदम की निंदा की। माकपा के वरिष्ठ नेता एम.वाई. तारिगामी ने कहा कि यह फैसला केंद्र के जम्मू-कश्मीर में सामान्य हालात के दावे पर सवालिया निशाना लगाता है। कांग्रेस की जम्मू-कश्मीर इकाई के मुख्य प्रवक्ता रवींद्र शर्मा ने चार नेताओं पर पीएसए लगाने को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया।

5 अगस्त से हैं नजरबंद

बता दें कि 49 वर्षीय उमर और महबूबा मुफ्ती पांच अगस्त, 2019 से नजरबंद हैं। इसी दिन केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा वापस लेकर उसे दो केन्द्रशासित प्रदेशों लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में विभाजित कर दिया था।

क्या है यह पीएसए कानून

जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत दो प्रावधान हैं-लोक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा को खतरा। पहले प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के छह महीने तक और दूसरे प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

कब आया था यह कानून

जम्मू-कश्मीर में पीएसए को पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने साल 1978 में लागू किया था। उन्होंने ये कानून उस समय जम्मू-कश्मीर के जंगलों की अवैध कटाई कर रहे लोगों को रोकने के लिए लागू किया था। बाद में इस पीएसए कानून का इस्तेमाल उन लोगों के लिए भी किया जाने लगा, जिससे राज्य की कानून-व्यवस्था के ‌‌लिए संकट माना जाता है।

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