सात समंदर लांघ मिसाल बन गईं मजदूर की ये बेटियां, जानें इनके बारे में….

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रांची । राजधानी रांची के पिछड़े़ गांवों में शुमार रूक्का, हुटुप, डुहू जैसे गांव के बच्चों के लिए अमेरिका से आए फ्रैंज गास्टलर किसी मसीहा से कम नहीं है। कभी घर के काम करने के बाद खेतों में या इधर- उधर घूमकर समय व्यतीत करने वाली लड़कियों को न सिर्फ जीवन का उद़़देश्‍य बताया बल्कि खेल के बाद पढ़ाई में भी राह दिखाई। 2009 में गाॅस्टलर ने रूक्का में युवा संस्था की नींव डाली। उन्हीं के परिश्रम का ही परिणाम है कि आज इन गांवों के कई बालाओं ने विदेश भ्रमण किया और अपनी प्रतिभा से सबको कायल कर दिया। यहां की ग्रमीण लड़कियों ने स्पेन व अमेरिका में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

2013 में युवा के खिलाडिय़ों ने दुनिया के सामने आई प्रतिभा
फ्रैज गस्टलर ने ग्रामीण इलाकों के लड़कियों को फुटबॉल सिखाना तो 2009 से ही शुरू कर दिया था। लेकिन उनकी इस टीम ने 2013 में पूरे विश्‍व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 2013 में स्पेन में आयोजित गैस्तिज कप फुटबॉल टूर्नामेंट में पूरे विश्‍व की लगभग साढ़े तीन सौ टीमों ने भाग लिया था। उस प्रतियोगिता में युवा की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा स्थान प्राप्त किया।

2013 में युवा के खिलाडिय़ों ने दुनिया के सामने आई प्रतिभा
फ्रैज गस्टलर ने ग्रामीण इलाकों के लड़कियों को फुटबॉल सिखाना तो 2009 से ही शुरू कर दिया था। लेकिन उनकी इस टीम ने 2013 में पूरे विश्‍व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 2013 में स्पेन में आयोजित गैस्तिज कप फुटबॉल टूर्नामेंट में पूरे विश्‍व की लगभग साढ़े तीन सौ टीमों ने भाग लिया था। उस प्रतियोगिता में युवा की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा स्थान प्राप्त किया।

यहां के लड़कियों के खेल से विदेशों के खेल प्रेमी के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी मंत्रमुग्ध हो गई और फिर क्या था यहां के बच्चों की चर्चा सात समंदर पार भी होने लगी। 2014 में एक बार फिर युवा टीम ने स्पेन में दोनेस्ती कप में बेहतरीन प्रदर्शन किया। इन लड़कियों की इतनी चर्चा होने लगी कि 2015 में अमेरिका में आयोजित यूएसए कप के लिए आमंत्रित किया गया। इसमें सबसे बड़ी बात यह थी कि देश से सिर्फ युवा की टीम को ही उक्‍त टूर्नामेंट के लिए आमंत्रित किया गया था।

फ्रैंज गस्‍टलर की मेहनत ने बिखेरी चमक
फ्रैंज गस्टलर ने अपने परिश्रम से युवा को बुलंदी तक पहुंचाया। जो लड़कियां इधर उधर भटकती थी वे युवा के स्कूल में पढ़ती भी है और फुटबॉल भी सीखती है। जो कल तक हिंदी भी सही तरीके से नहीं बोल पाती थी वह आज अंग्रेजी फर्राटेदार बोल रही है। लॉरियस पुरस्कार लेने गई युवा की हीमा, नीता, राधा व कोनिका ने वहां फर्राटा अंग्रेजी बोलकर सबको चकित कर दिया। 2009 में फ्रैंज गस्टलर एक एनजीओ में काम करने के लिए भारत आए थे।

उन्होंने बताया कि एनजीओ ओरमांझी के गांवों में काम करता था। मैं धीरे-धीरे लोगों से मेल जोल बढ़ाने लगा। शुरू में सब मुझे सशंकित नजरों से देखते थे। मैं ओरमांझी के गांवों में बच्चों को इधर उधर भटकते देखता था। धीरे-धीरे मैं उनलोगों को ट्यूशन पढ़ाने लगा। बच्चों के और निकट आने के लिए मैं उन्हें फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। देखते-देखते फुटबॉल खेलने वाले खिलाडिय़ों की संख्या बढ़ती चली गई। यहां की लड़कियों में प्रतिभा निखरने लगी। इसके बाद मैने रूक्का में एक स्कूल खोला जहां मैं ग्रामीण बच्चों को पढ़ाता और फिर समय मिलने पर फुटबॉल सिखाता था। आज स्थिति यह है कि आसपास गांव की पांच सौ बच्चे स्कूल भी आते हैं और फुटबॉल भी खेलते हैं। इन लड़कियों में से कई लड़कियों ने राज्य टीम का भी प्रतिनिधित्व किया।

युवा की सबसे पुरानी खिलाड़ी रेणु कुमारी ने 2009 में ही फ्रैंज गस्टलर से फुटबॉल सीखना शुरू किया। गस्टलर की मेहनत व रेणु का परिश्रम ने रंग दिखाया और किसान की बेटी जो कल तक खेतों में काम करती थी और फिर घर में चौका बर्तन कर समय बिताती थी वह एक अच्छी फुटबॉलर बन गई। 2015 में अमेरिका जाने वाली टीम में वह भी शामिल हो गई। यहीं नहीं वह अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलने लगी है।

डुहू गांव की एक किसान की बेटी राधा कुमारी जो शुरू में पढ़ाई से दूर भागती थी उसने पहले फुटबॉल के गुर सीखे फिर पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन किया। समर कार्यक्रम के तहत बेहतर कार्य कुशलता दिखाने के बाद उसका चयन येल विवि यूएसए में हो गया। 2018 में हुए समर कार्यक्रम में चयन होने वाली राधा भारत की एकमात्र लड़की थी। हुटुप गांव की सीमा के पिता एक कारखाने में काम करते हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद उसके फुटबॉल प्रेम को गेस्टलर ने समझा और उसकी प्रतिभा को निखारा। सीमा स्पेन व अमेरिका दोनों देशों में जाने वाली युवा फुटबॉल टीम की सदस्य थी।

यहां की नीता कुमारी गांव से निकलकर सात समुंद्र पार भी अपनी प्रतिभा को लोहा मनवाने में सफल रही। नीता का चयन अलास्का में 2018 में हुए अवयेरनेस कायकिंग वाइल्डनेस एक्सपीडिशन के लिए हुआ था। इंस्पायङ्क्षरग गल्र्स नाम की संस्था की ओर से हर साल कराए जाने वाले नेचर अवेयरनेस कार्यक्रम के तहत उसका चयन हुआ था। विश्व की आठ लड़कियों का चयन किया गया था जिसमें नीता अकेली भारतीय थी।

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