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Thursday, May 23, 2019

बुंदेलखंड की धरती पर मिले दुर्लभ जुड़वां कल्प वृक्ष, दो हजार साल पुराने ओलिएसी कुल के हैं वृक्ष

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महोबा के सिचौरा गांव में जुडवां कल्प वृक्ष का एनबीआरआई के पूर्व वैज्ञानिक ने परीक्षण करके जानकारी दी।

कानपुर- देश में चुनिंदा स्थानों पर मौजूद कल्प वृक्षों में धर्म और विरासत की धरती बुंदेलखंड में भी दुर्लभ जुड़वां कल्प वृक्ष की पहचान हुई है।

एनबीआरआई के पूर्व वैज्ञानिक ने इन्हें दो हजार साल पुराना और ओलिएसी कुल का वृक्ष बताया है। हालांकि इसमें एक वृक्ष का ताना खोखला होने पर चिंता भी जताई है, संरक्षण का अभाव होने से सैकड़ों वर्ष पुरानी विरासत के विलुप्त होने का खतरा बन गया है।
यहां पर स्थित हैं वृक्ष
कानपुर से करीब डेढ़ सौ किमी दूर स्थित महोबा जनपद के कबरई से करीब तीस किलोमीटर पर सिचौरा ग्राम है। महोबा आज भी बुंदेलखंड की एतिहासिक विरासत को संजोए है, इसके गांव सिचौरा में जुड़वां कल्प वृक्ष हैं। यहां आसपास के गांवों में रहने वाले बुजुर्ग भी जन्म के बाद होश संभालने के बाद और पूर्वजों द्वारा भी कल्प वृक्ष देखे जाने की बात कहते हैं।


सैकड़ों वर्षों से ये कल्प वृक्ष धार्मिक मान्यता का केंद्र बने हैं और आस्थावान लोग वृक्ष में धागा बांधकर मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। इन वृक्षों की सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए शासन व प्रशासन ने अबतक कोई ध्यान नहीं दिया है। ग्रामीण बताते हैं, धार्मिक आस्था को देखते हुए पूर्व सांसद गंगा चरण राजपूत ने कल्प वृक्ष के चारों ओर चबूतरा बनवा दिया था।
एनबीआरआई के पूर्व वैज्ञानिक ने किया परीक्षण
सुदूर क्षेत्र में जुड़वां कल्प वृक्ष की दुर्दशा देखकर बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर ने चिंता जताई। उन्होंने अपने परिचित महोबा में रहने वाले लखनऊ के राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक रह चुके डा. राम सेवक चौरसिया से संपर्क किया। डॉ. चौरसिया अपनी टीम के साथ सिचौरा पहुंचे और कल्प वृक्ष का परीक्षण किया।

वह कहते हैं उनकी जानकारी के अनुसार देश में 10-15 कल्प वृक्ष हैं। सबसे पुराना यूपी बाराबंकी के रामनगर में है, जिसकी आयु पांच हजार साल से अधिक है। इसके अलावा झारखंड के रांची,  राजस्थान के अजमेर, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हैं। बुंदेलखंड के हमीरपुर में भी यमुना किनारे एक कल्प वृक्ष है। सिचौरा के जुड़वां कल्प वृक्ष बेहद दुर्लभ हैं, ये ओलिएसी कुल के हैं। इनका वनस्पति नाम ओलिया कस्पीडाटा है।
डेढ़ हजार साल से भी अधिक होगी आयु
डा. राम सेवक चौरसिया ने बताया कि आसपास के गांव वालों से बातचीत में जुड़वां कल्प वृक्ष करीब दो हजार साल पुराने होने की बात सामने आई है। कल्प वृक्ष का परीक्षण करने पर डायामीटर बहुत चौड़ा है, यह करीब बीस फीट से भी ज्यादा है। उनके अनुमान के मुताबिक जुड़वां कल्प वृक्ष डेढ़ हजार साल से अधिक पुराने हैं। वैसे वृक्ष की सही आयु की जानकारी मर्फोलॉजिस्ट या टेक्सोनॉमिस्ट ही करते हैं, जो वृक्ष के आंतरिक और बाहरी सिस्टम की स्टडी करके आयु की गणना करते हैं। इसके साथ देहरादून और प्रयागराज में बीएसआई द्वारा सर्वे करके जानकारी दी सकती है।


कम क्यों होते हैं कल्प वृक्ष
कल्प वृक्ष की संख्या बेहद कम क्यों होती है, इस सवाल पर डॉ. चौरसिया ने बीज का फर्टाइल न होना बताया। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय पतझड़ी मौसम के कारण कल्प वृक्ष में पत्तियां नहीं। अभी कुछ ही दिनों में कोपल फूटने के बाद एक माह में अंदर के पत्तियां आ जाएंगी। इसके बाद फूल आने पर बीज भी आएंगे। कल्प वृक्ष के फूलों में बीज में फर्टालाइजेशन कम होता है। इसी वजह से कल्प वृक्षों की संख्या काफी कम होती है।

दुर्लभ वृक्ष की सुरक्षा व संरक्षा की जरूरत
बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर कहते हैं कि देश में इकलौते दुर्लभ जुड़वां कल्प वृक्ष की सुरक्षा व संरक्षा की जरूरत है। डॉ. रामसेवक चौरसिया ने बताया है कि जुड़वां कल्प वृक्ष के एक पेड़ का तना खोखला हो रहा है। मुख्य तना काफी क्षतिग्रस्त है, अगर जल्दी उचित उपचार नहीं किया गया तो पहले वृक्ष को भी नुकसान हो सकता है। इससे प्राचीन कल्प वृक्ष का अस्तित्व खतरे में है।
तारा पाटकर ने बताया कि उन्होंने इस बारे में जिला वन अधिकारी को भी अवगत कराया है। अब वह जिला प्रशासन और एनबीआआई लखनऊ को पत्र भेजकर कल्प वृक्षों की सुरक्षा एवं संरक्षा की मांग करेंगे। सिचौरा के सचिन खरे, दिनेश खरे,  प्रवीण चौरसिया, अवधेश गुप्ता व ग्यासी लाल ने भी दुलर्भ कल्प वृक्षों की सुरक्षा की मांग उठाई है।
डीएफओ को नहीं थी जानकारी
महोबा के डीएफओ रामजी राय कहते हैं कि उन्हें सिचौरा में कल्प वृक्ष होने की जानकारी अबतक नहीं थी। गांव में वन विभाग की टीम को भेजकर जुड़वां कल्प वृक्षों को देखकर सुरक्षा का प्रबंध किया जाएगा। इसके साथ ही संरक्षण के लिए शासन को लिखा जाएगा।

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