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Sunday, February 23, 2020

करतारपुर साहिब: बंटवारे से लेकर अब तक क्या हुआ ,जहां श्री गुरु नानक देव ने सिखों को किया था एकजुट

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14 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ। इससे पहले जुलाई 1947 में बाउंड्री कमीशन बना और इसका चेयरमैन साइरिल रेडक्लिफ को बनाया गया।

 जालंधर। सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी ने करतारपुर साहिब में ही सिख समुदाय को एकजुट किया था। श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की नींव उन्होंने स्वयं संवत् 1522 में रखी थी। यहीं से लंगर प्रथा की शुरुआत की थी। 1539 में ज्योति जोत समाने तक वह 18 साल यहां रहे थे। यहीं पर उन्होंने ‘किरत करो, नाम जपो, वंड छको’ (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का उपदेश दिया।

गुरु नानक देव जी के आने से पहले यहां की जमीन उपजाऊ नहीं थी। दुनी चंद नामक व्यक्ति ने सौ एकड़ जमीन उन्हें खेती के लिए दे दी। गुरु जी ने यहां खेती की तो फसलें लहलहाने लगीं और पैदावार काफी बढ़ गई। इसी अनाज से उन्होंने लंगर शुरू किया।

गुरुद्वारा परिसर में हैं तीन कुएं 

बताते हैं कि उनके उपदेशों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें गुरु का दर्जा दे दिया। गुरुद्वारा परिसर में तीन कुएं हैं। एक कुआं अंदर है जिसके बारे में माना जाता है कि यह गुरु नानक देव जी के समय से है। इस कुएं को लेकर श्रद्धालुओं में अगाध श्रद्धाभाव है। इसके पास ही एक बम का टुकड़ा भी सहेजकर शीशे में रखा गया है। बताया जाता है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय यह बम कुएं में गिरा था और इस कारण यह इलाका तबाह होने से बच गया था।

गुरु नानक देव जी की दो समाधियां 

गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब की दूसरी मंजिल पर श्री दरबार साहिब स्थित है। यहीं पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सुशोभित हैं। यहां गुरु नानक देव जी की दो समाधियां हैं। एक सिखों और हिंदुओं ने मिलकर बनाई हैं जबकि दूसरी मुस्लिम समुदाय की तरफ से बनाई गई है, जहां वे सजदा करते हैं। दोनों धर्म के लोग सेवा करते हैं। सिख रूमाला साहिब बांधकर अंदर जाते हैं तो मुस्लिम टोपी पहन कर दर्शन करते हैं।

पटियाला के महाराजा ने कराया पुनर्निर्माण

श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा रावी नदी के पास स्थित है। नदी में आई बाढ़ की वजह से गुरुद्वारे को काफी नुकसान पहुंचा था। 1920 से 1929 के बीच पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने इसे फिर से बनवाया था। तब इस पर 1.36 लाख रुपये से ज्यादा खर्च आया था।

कहां है स्थित: करतारपुर का पवित्र गुरुद्वारा पाकिस्तान के नारोवाल जिले में रावी नदी के किनारे स्थित है। लाहौर से इसकी दूरी लगभग 120 किलोमीटर है। भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा से इसकी दूरी चार किलोमीटर है।

बंटवारे से लेकर अब तक, कब और क्या

14 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ। इससे पहले जुलाई 1947 में बाउंड्री कमीशन बना और इसका चेयरमैन साइरिल रेडक्लिफ को बनाया गया। रेडक्लिफ ने करतारपुर पाकिस्तान के हिस्से में दे दिया।

  • 1941- देश के विभाजन के दौरान गुरदासपुर जिला दो हिस्सों में बंट गया और गुरुद्वारा करतारपुर साहिब पाकिस्तान के नारोवाल जिले में चला गया।
  • 1971-पाकिस्तान के नारोवाल और भारत के गुरदासपुर को जोड़ने वाला रावी नदी पर बना पुल दोनों देशों के बीच हुई जंग में तबाह हो गया
  • 2000- पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब के लिए वीजा मुक्त यात्रा की घोषणा की, तब कॉरिडोर नहीं बना था।
  • 2001-पाकिस्तान ने पहली बार भारतीय जत्थे को करतारपुर साहिब जाने की अनुमति दी।
  • 2008- तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने डेरा बाबा नानक का दौरा किया और फिजिबिलिटी रिपोर्ट बनाने की बात कही।
  • 2018- 17 अगस्त को प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह के बाद पाक सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने नवजोत सिंह सिद्धू से बातचीत में मार्ग खोलने का भरोसा दिया।
  • 2019- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 9 नवंबर को कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे। इसी दिन इमरान खान भी अपने क्षेत्र में कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे।

Prakash Parv 2019: धार्मिक पर्यटन के लिए मशहूर डेरा बाबा नानक का ऐतिहासिक सफर

Prakash Parv 2019: धार्मिक पर्यटन के लिए मशहूर डेरा बाबा नानक का ऐतिहासिक सफर
गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा डेरा बाबा नानक में करतारपुर गलियारे का उद्घाटन श्रद्धालुओं व धार्मिक पर्यटकों के लिए एक बड़ी सौगात होगा।

पर्यटन की दृष्टि से किसी भी स्थल की एक खास विशेषता होती है कि उससे धार्मिक या राजनीतिक इतिहास जुड़ा होता है। पंजाब का गुरदासपुर जिला भी ऐसे ही कुछ प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। यहां स्थित डेरा बाबा नानक और बटाला इन दिनों खासे चर्चा में हैं। ये स्थान सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी की यादों को समेटे हुए है। श्री गुरु नानक देव जी यहां 12 वर्ष तक रहे थे। मक्का जाने पर उनको दिए गए कपड़े भी यहां संरक्षित हैं। हर साल चार से आठ मार्च तक यहां पर विशाल मेला लगता है, जहां देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मेले में शामिल होने के लिए होशियारपुर के गांव खंडियाला सैनियां के गुरुद्वारा बारण साहिब से एक विशेष दल पैदल यात्रा कर यहां पहुंचता है।

पंजाब के गुरदासपुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डेरा बाबा नानक को गुरुद्वारा करतारपुर साहिब की दर्शनी ड्योढ़ी कहा जाता रहा है। यहीं स्थित है ऐतिहासिक गुरुद्वारा चोला साहिब, जहां श्री गुरुनानक देव जी के अंगवस्त्र सुशोभित हैं। आज चलते हैं डेरा बाबा नानक और आसपास के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सफर पर..

बदलाव की नई आहट

डेरा बाबा नानक में पिछले साल की तुलना में काफी बदलाव आया है। कॉरिडोर खुलने के बाद यहां से भारत-पाकिस्तान सीमा से लगभग 4.5 किलोमीटर दूर पाकिस्तान में स्थित करतारपुर साहिब के दर्शन सुलभ हो सकेंगे। उल्लेखनीय है कि करतारपुर साहिब में गुरु नानक देव जी ने जिंदगी के 18 साल गुजारे थे। यहां पहले दर्शन के लिए सिख संगत को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। वे पहले भारत से लाहौर जाते थे और फिर वहां से करतारपुर साहिब। इस सफर में 125 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी या फिर श्रद्धालु डेरा बाबा नानक से दूरबीन के जरिये करतारपुर साहिब के दर्शन करते थे। इससे दर्शन तो हो जाते थे, पर उस पवित्र स्थल की मिट्टी को माथे पर लगाने की कसक मन में बनी रहती थी। पर अब जब करतारपुर के लिए नौ नवंबर को दोनों देशों के प्रधानमंत्री ऐतिहासिक कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे तो श्रद्धालुओं की दशकों पुरानी मनोकामना पूरी हो सकेगी। उसी दिन पहला जत्था करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए जाएगा। अवसर जब श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व का है तो यह खुशी और भी बढ़ गई है।

बसाई गई है टेंट सिटी

प्रकाश पर्व मनाने के लिए डेरा बाबा नानक में 40 एकड़ में टेंट सिटी बसाई गई है। आम दिनों की तुलना में इस समय चहल-पहल ज्यादा बढ़ गई है। टेंट सिटी-एक में 17 हजार, सिटी-दो में 5500 और सिटी-तीन में 13,500 श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था की जा रही है। तीनों टेंट सिटी में अंडर ग्राउंड सीवरेज सिस्टम होगा।

वैश्विक भाईचारा वर्ष 

प्रकाश उत्सव को भव्य बनाने के लिए तमाम तरह के इंतजाम किए गए हैं। श्री दरबार साहिब की नींव रखने वाले सूफी संत साईं मियां मीर के परिवार को भी आमंत्रित किया गया है। इसके अलावा, श्री गुरु नानक देव जी की यात्राओं में उनके साथ रहने वाले भाई मरदाना के परिवार के वंशजों से कीर्तन करवाया जाएगा। यह परिवार आज भी पाकिस्तान में भाई मरदाना की विरासत संभाले हुए है। साथ ही, अपनी चार उदासियों यानी पावन यात्राओं के दौरान भारत और विदेश के विभिन्न स्थानों तक गुरु नानक जी ने जिन-जिन रागों में अपनी वाणी का उच्चारण किया है, उसका गायन भी इस राग के दक्ष कीर्तनियों से कराया जाएगा।

कैसे जाएं

डेरा बाबा नानक आप दिल्ली से हवाई मार्ग से अमृतसर आ सकते हैं। अन्य स्थानों से भी अमृतसर के लिए सीधी उड़ानें हैं। 120 अमृतसर से डेरा बाबा नानक के लिए कई पैसेंजर ट्रेन चलती हैं। बस और अन्य वाहनों से भी आप डेरा बाबा नानक जा सकते हैं। इसके अलावा, आप दिल्ली से ट्रेन के जरिये गुरदासपुर पहुंच सकते हैं। वहां से टैक्सी से डेरा बाबा नानक और अन्य स्थलों का भ्रमण कर सकते हैं।

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