हमारी असंवेदनशील भाषा में सबकुछ एक ‘कांड’ है – तंदूर कांड, निठारी कांड, कठुआ कांड, अलीगढ़ कांड. ये कांड आते-जाते रहते हैं और हम बहस का कारोबार चलाते रहते हैं

कठुआ में बलात्कार झेलने वाली बच्ची के बारे में मैंने नहीं लिखा. अब भी उसका नाम लेते हुए जीभ और लिखते हुए कलम दोनों सिहर उठती है. अलीगढ़ में भी बुरी तरह मारी गई बच्ची के बारे में लिख पाना संभव नहीं हो सका. हमारे समाज की ऐसी और भी वीभत्सताएं रहीं जिनके बारे में लिखना स्थगित होता रहा. ऐसे हादसे कुछ लोगों को अक्सर चुप कर देते हैं.

तो क्या ऐसे लोग उनके मुक़ाबले कुछ कम संवेदनशील होते हैं जो ऐसी घटनाओं के विरोध में तत्काल कलम लेकर उठ खड़े होते हैं? क्या मैं उन फिल्मी सितारों से गया-गुज़रा हूं जो ऐसे वीभत्स अपराधों के गुनहगारों को सरेआम फांसी पर लटका देने की वकालत कर रहे हैं? ऐसा क्या है जो वे देख ले रहे हैं और मुझसे अनदेखा रह जा रहा है? नफ़रत का वह आवेग मेरे भीतर पैदा क्यों नहीं हो पाता जो ऐसे मामलों में दूसरों के भीतर दिखता है?

यहां उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो किसी भी बलात्कार, उत्पीड़न या यंत्रणा में पहले अपना पक्ष चुनते हैं और उसके अनुकूल अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. कठुआ में भी ऐसे लोग सक्रिय थे और अलीगढ़ में भी. यहां उन लोगों की बात हो रही है जो कठुआ के समय भी रोए, अलीगढ़ के समय भी रो रहे हैं और जिन्होंने 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुई ज़्यादती पर भी ईमानदारी से आवाज़ उठाई थी.

दरअसल संवेदना भी हमारे सामाजिक पर्यावरण और अनुकूलन की देन होती है. बहुत सारे बड़े-बड़े अन्यायों और बहुत गहरी असमानताओं के प्रति हम बहुत असंवेदनशील हो सकते हैं, जबकि बहुत सारी छोटी-छोटी नाइंसाफ़ियां हमें भीतर से छील कर रख देती हैं. मार्टिन लूथर किंग जूनियर का यह प्रसिद्ध वाक्य हम अक्सर भूल जाते हैं कि कहीं भी चल रहा छोटा सा अन्याय दुनिया भर के न्याय के लिए ख़तरा होता है.

हमारे चारों तरफ़ यंत्रणा, उत्पीड़न, बलात्कार और अन्याय की अनगिनत कहानियां छींटी-बिखरी पड़ी रहती हैं. लेकिन हम इनसे लगातार आंखें मूंदे रहते हैं. फिर अचानक किसी एक घटना के प्रति हम ऐसे उत्तेजित दिखाई पड़ते हैं जैसे हम जीवन में कोई भी अन्याय होने नहीं देंगे. यह याद करना बहुत तकलीफ़देह है – लिखना शायद उससे भी ज़्यादा – कि हमारे देश में हर घंटे औसतन तीन बलात्कार होते हैं. यानी जब यह टिप्पणी लिखी जा रही है या जब कोई पाठक इसे पढ़ रहा है तब भी कहीं न कहीं कोई लड़की सताई जा रही होगी.

16 दिसंबर 2012 की घटना हो या कठुआ वाली घटना या फिर अलीगढ़ वाला मामला – तीनों के आरोपी बहुत जल्दी पुलिस की गिरफ़्त में आ गए. 2012 वाली घटना के आरोपियों को फांसी तक की सज़ा सुनाई जा चुकी है. अलीगढ़ में कई पुलिस वाले ढिलाई के आरोप में निलंबित किए जा चुके हैं. कठुआ के मामले को दुर्भाग्य से कुछ अतिरिक्त राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग दिया गया, लेकिन इस मामले में भी छह लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है. इन तीनों मामलों में कानून-व्यवस्था की प्रक्रिया उन दूसरे हज़ारों या लाखों मामलों से कही ज़्यादा चुस्त, तेज़ और मुस्तैद चली है जिनके अदालत तक पहुंचने में ही कई साल लग जाते हैं.

लेकिन इन मामलों में भी अगर किसी करोड़पति या अरबपति का बेटा या कोई रसूखदार आदमी शामिल होता तो क्या उसे सज़ा दिलवाना आसान होता? इस देश के सबसे बड़े वकील सबसे ज़्यादा पैसे वालों पर लगे आरोपों के बचाव के लिए हाथ बांध कर खड़े रहते हैं. तब इस समाज की न्याय बुद्धि कुंद पड़ती दिखाई पड़ती है. आसाराम बापू और उसके बेटे जैसे व्यभिचार और अत्याचार के आरोप झेल रहे लोगों के वकीलों की सूची देखकर हैरानी होती है. राम जेठमलानी, सुब्रह्मण्यम स्वामी, सलमान ख़ुर्शीद और केटीएस तुलसी जैसे वकील अलग-अलग मौक़ों पर इनके लिए खड़े हो चुके हैं. जेसिका लाल को मारने के जुर्म में उम्रक़ैद काट रहे मनु शर्मा के लिए भी राम जेठमलानी खड़े हुए थे.

अलीगढ़ मामले में आरोपियों को सरेआम फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे हमारे बड़े-बड़े कलाकारों के ट्वीट देखकर यह लगता है कि उन्हें शायद न्याय की चिंता नहीं है. उन्हें प्रतिशोध भी नहीं लेना है. उन्हें बस यह दिखाना है कि वे न्याय के साथ खड़े हैं. न्याय के साथ खड़े होने का दिखावा बहुत ख़तरनाक क़िस्म के अन्यायों का जनक होता है, शायद वे यह नहीं जानते. मुश्किल यह है कि इतना ही आवेग उनमें एक घंटे में तीन की दर से होने वाले दूसरे मामलों के प्रति नहीं दिखता.

कठुआ हो या अलीगढ़ या फिर हमारे समाज में बच्चों, महिलाओं या कमज़ोरों के साथ लगातार हो रहे तरह-तरह के अन्याय और उत्पीड़न – ये सब हमारे रुग्ण होते, बीमार पड़ते, समाज की सूचना हैं. यह एक सामाजिक बीमारी है जिसके स्रोत लगातार अमानवीय होती जा रही हमारी व्यवस्था में हैं. इस व्यवस्था में बराबरी के लिए, न्याय के लिए, मनुष्यता के लिए, असहमति के लिए, संस्कृति के लिए जगह घटती जा रही है. एक खाया-पिया-अघाया समाज है जिसके मनोरंजन के स्रोत भी उतने ही सतही और अमानवीय होते जा रहे हैं.

जो फिल्मी सितारे अलीगढ़ को लेकर आंसू बहा रहे हैं, वे यह नहीं देखते कि उनके पूरे फिल्मोद्योग ने स्त्री को पहले देह में और फिर वस्तु में बदल डाला है. वह अपने दर्शकों को ज़्यादातर ऐसी काल्पनिक कहानियों की खुराक देता है जिसमें खलनायक नायिकाओं का उत्पीड़न करते हैं और नायक उन्हें बचाते हैं. बेशक हाल में इस चलन में एक बदलाव भी दिख रहा है, लेकिन अंततः मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा ने स्त्री को पीड़ित और शिकार में बदला है, सहज व्यक्ति नहीं रहने दिया है. यही नहीं, न्याय की उसकी अवधारणा भी बस प्रतिशोध की अवधारणा है या फिर किसी एक व्यक्ति के पराक्रम की. जाहिर है, हमारे फिल्मी कलाकारों की ही नहीं, हमारी फिल्मों की भी लोकतांत्रिक समझ दयनीय है.

अलीगढ़ के मुजरिमों को सज़ा मिलनी ही चाहिए. वह मिलेगी भी. लेकिन अलीगढ़ का मामला एक समाज के भीतर जिस सदमे, जिस आत्मालोचना का सबब बनना चाहिए, वह नहीं बन पाएगा. क्योंकि अलीगढ़ को लेकर एक दिखाऊ क़िस्म की भावुकता का बाजार बनाया जा चुका है. आज के मीडिया को भी यही बाज़ार रास आता है. अलीगढ़ के बाद सभी चैनल चार मेहमानों को बुलाकर, महिला उत्पीड़न और बलात्कार के आंकड़े जुटा कर, यह बताते हुए कि हमारे यहां दोषसिद्धि का प्रतिशत कितना कम है, बहस कराने में जुटे हुए हैं. इसमें समाज की टूटन के नाम पर चंद जुमले हैं या फिर पुलिस और प्रशासन के नाम लगाए जा रहे आरोप हैं.

हमारे समाज में टूटन और दरार बढ़ रही है, यह समझने के लिए किसी कठुआ या अलीगढ़ जैसी वीभत्स घटना की ज़रूरत नहीं है. हमारे परिवार लगातार टूटते जा रहे हैं, हम बहुत आक्रामक भाषा बोलने लगे हैं, बहुत उथली भावुकता से भरी फिल्में देखने लगे हैं, नकली देशभक्ति और धार्मिकता को मूल्य मान कर चल रहे हैं, संबंधों और सरोकारों का स्थायित्व ख़त्म हो चुका है, किसी भी संकट या सवाल के ब्योरों में जाना हम छोड़ चुके हैं. हमारी असंवेदनशील भाषा में सबकुछ एक ‘कांड’ है – तंदूर कांड, निठारी कांड, कठुआ कांड, अलीगढ़ कांड. ये कांड आते और जाते रहते हैं, हम बहस का कारोबार चलाते रहते हैं. इससे हमारा दिखावा और धंधा भले चलता हो, न्याय का लक्ष्य हासिल नहीं होता.

हम एक बहुत बोलने, और बहुत कम विचार करने वाले समाज में बदलते जा रहे हैं. हमारे भीतर न्याय की इच्छा नहीं. फ़ैसला सुनाने का उतावलापन है. और यह हमारा एक सामाजिक अपराध-बोध है जो अक्सर दूसरों को सज़ा देने निकल पड़ता है. ध्यान से देखें तो बर्बरों की तरह इंसाफ़ करने के लिए निकल रहे हम इंसानियत के इम्तिहान में ही नाकाम हो रहे हैं. हमारे अवचेतन में सक्रिय एक सामूहिक हीनता ग्रंथि हमें और हिंसक बना रही है और हम कुछ कम मनुष्य होते चले जा रहे हैं.

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