पृथ्वीराज कपूर : कपूर खानदान का ‘अकबर’ जिसे रंगमंच की विधा का ‘सिकंदर’ भी कहा जाना चाहिए

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मुगल-ए-आजम के सेट पर मेकअप रूम में जाते हुए वे कहते थे, ‘पृथ्वीराज जा रहा है’ और उससे बाहर निकलते हुए ठसक के साथ मुनादी करते थे, ‘अकबर आ रहा है’

हाल के कुछ दिनों में कपूर खानदान में काफ़ी उथलपुथल रही है. कृष्णा राज कपूर का निधन हो गया है. सुनने में आया है ऋषि कपूर बीमार हैं, राज कपूर निर्मित ‘आरके स्टूडियो’ 170 करोड़ रूपये में गोदरेज प्रॉपर्टीज को बेच दिया गया है. इन सबके बीच पृथ्वी थिएटर अपने 40 साल पूरे करने जा रहा है. आज पृथ्वी थिएटर और फ़िल्मी ‘कपूर खानदान’ की स्थापना करने वाले ‘पापाजी’ उर्फ़ पृथ्वीराज कपूर साहब का जन्म दिन है.

पृथ्वीराज कपूर का जन्म समुंदरी, ज़िला फैसलाबाद, पाकिस्तान में हुआ था. उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज से वकालत का कोर्स किया. चूंकि पिता पुलिस अफसर थे, तो उन्हें यही करना ठीक लगा. पर किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था. और उनको वकालत भी रास नहीं आ रही थी, सो वे लायलपुर में काम के साथ नाटक भी करते रहे. वैसे पृथ्वीराज बेहद शानदार शख्सियत के धनी थे. दिखने में गोरे-चिट्टे, कोई छह फुट दो इंच की भरपूर ऊंचाई, दमदार आवाज़ के मालिक. और हां, कुछ हलकी नीली आंखें. पूरे यूनानी दीखते थे और ‘सिकंदरी’ उनके खून में थी. तो अब मंज़िल साफ़ नज़र आ रही थी. दोस्तों से कुछ रुपये उधार लिए और लायलपुर से बम्बई आने के लिए ट्रेन पकड़ ली. यह बात साल 1928 की है.

यहां पर वे बंबई की इंपीरियल फिल्म्स कंपनी के साथ जुड़ गए. शुरुआत में उन्हें एक्स्ट्रा कलाकारों का किरदार करने को मिला पर जब कंपनी मालिकों की नज़र उन पर पड़ी तो 1929 में ‘सिनेमा गर्ल’ फिल्म में मुख्य किरदार मिल गया. यह मूक सिनेमा का दौर था जिसमें उन्होंने ‘दोधारी तलवार’, ‘शेर-ए-अरब’ आदि फ़िल्मों में काम किया. 1931 में जब पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ बनी तो पृथ्वीराज कपूर ने उसमें भी एक किरदार निभाया.

1941 में सोहराब मोदी की ‘सिकंदर’ में जब उन्हें मुख्य किरदार करने को मिला तो मानो यूनान का वो लड़ाका परदे पर जीवंत हो उठा. फिल्म की इस तस्वीर को देखिये और आपको लगेगा कोई यूनानी देवता मुस्कुरा रहा है!

फ़िल्मों से कमाना, नाटकों में लगाना

पृथ्वीराज कपूर को रंगमंच से बेहद लगाव था. वे 1942 में स्थापित ‘इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन’ यानी इप्टा के संस्थापकों में से एक थे. उनके अलावा बलराज साहनी, ज़ोहरा सहगल, उत्पल दत्त, ख्वाजा अहमद अब्बास, सलिल चौधरी, पंडित रविशंकर जैसे महान लोग इप्टा से जुड़े हुए थे. ये सब समाजवादी विचारधारा के लोग थे और इसलिए इप्टा पर इस विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा.

पृथ्वीराज ने 1944 में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की थी और फिर पूरे देश में घूम-घूमकर वे नाटक करने लगे. इस थिएटर के तहत कालिदास रचित ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ और ‘पठान’ काफी चर्चित रहे. इसके अलावा कुछ और चर्चित नाटक थे जैसे ‘ग़द्दार’, ‘आहुति’ और ‘पैसा’, जिनमें पृथ्वीराज साहब ने मुख्य किरदार निभाया था. वे थिएटर के जरिए जो पैसा कमाते, वह सब फिल्मों में लगा दिया करते थे.

आपको जानकार हैरत होगी कि संगीतकार शंकर-जयकिशन पृथ्वीराज की ही खोज थे. इस जोड़ी की मुलाकात राज कपूर से पृथ्वी थिएटर में ही हुई और आगे चलकर इस तिकड़ी ने हिंदुस्तानी सिनेमा को कई यादगार गाने दिए. इन तीनों का मिलना भी एक इत्तेफ़ाक ही था. दरअसल, शंकर पृथ्वी थिएटर से सबसे पहले जुड़े. जब थिएटर को हारमोनियम वादक की ज़रूरत हुई, तो वे जयकिशन को ढूढ़कर लाये. फिर राज कपूर ने 1948 में ‘आग’ बनाई तो शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने बतौर सहायक संगीतकार इसके लिए काम किया. राज कपूर ने ही अपनी दूसरी फिल्म ‘बरसात’ में इस जोड़ी को मुख्य संगीतकार के तौर पर लिया था.

1950 के आते-आते पृथ्वीराज को यकीन हो गया था कि हिंदुस्तान में रंगमंच का भविष्य नहीं है. पूरे लाव लश्कर के साथ कहीं जाकर महीनों ठहरना और नाटक करना अब घाटे का सौदा बन गया था. उनके ख़ास कलाकारों ने भी फिल्मों से नाता जोड़ लिया था, हालांकि सार्थक नाटकों को लोगों तक पहुंचाने का जुनून अब भी उनमें बरक़रार था सो उन्होंने बंबई के जुहू में जमीन खरीदी ताकि इस थिएटर कंपनी को एक स्थायी ठिकाना दिया जा सके.

1972 में उनकी मौत के बाद शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कैंडल कपूर ने इसकी स्थापना का ज़िम्मा लिया. नवम्बर, 1978 को जुहू में पृथ्वी थिएटर शुरू हुआ. ‘उदावस्त धर्मशाला’ पहला नाटक था जो यहां खेला गया. जेनिफर और शशि कपूर के प्रयासों की वजह से नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, रत्ना पाठक शाह, दिनेश ठाकुर, बेंजामिन गिलानी जैसे रंगमंच के कलाकार इसके साथ जुड़ गए. आज पृथ्वी थिएटर हिंदुस्तान के सांस्कृतिक इतिहास में अपना अहम मुक़ाम रखता है.

बात कुछ और फिल्मों की

1960 में आई ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में पृथ्वीराज द्वारा अभिनीत ‘अकबर’ का किरदार अमर है. बहुत सालों तक जब तक कि ऋतिक रोशन अभिनीत ‘जोधा-अकबर’ नहीं आई थी लोगों के ज़ेहन में पृथ्वीराज कपूर का निभाया ‘अकबर’ का किरदार ही छाया रहा. आपको जानकर हैरत होगी कि डायरेक्टर के आसिफ ने ‘अकबर’ के किरदार के लिए पहले अभिनेता चंद्रमोहन का चयन किया था. हालांकि बाद में पृथ्वीराज कपूर ही इस किरदार के लिए चुने गए. उन्होंने इस फिल्म को इतनी अहमियत दी कि यह किरदार निभाने के लिए अपना वजन तक बढ़ाया. मेकअप रूम में जाने से पहले वे कहते थे ‘पृथ्वीराज कपूर जा रहा है’ और जब तैयार होकर बाहर आते तो कहते ‘अकबर आ रहा है’. वे इतने पेशेवर कलाकार थे कि ‘अकबर’ का शॉट शुरू होने से पहले अपने आपको बड़े से शीशे में कुछ देर तक निहारते थे. जब उनसे पूछा गया कि वे ऐसा क्यूं करते हैं तो उन्होंने कहा कि इससे वे किरदार में घुस जाते हैं. शायद यही वजह है कि उनका निभाया हुआ ‘अकबर’ आज भी सबसे ज़्यादा विश्वसनीय नज़र आता है.

पृथ्वीराज कपूर के जन्मदिन से पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल की शुरुआत की जाती है. पांच नवंबर को रत्ना पाठक शाह द्वारा निर्देशित फ्लोरियन ज़लर के नाटक ‘दा ट्रुथ’ का मंचन किया जाएगा जिसमें नसीरुद्दीन शाह मुख्य किरदार निभायेंगे. हैरत की बात है कि पृथ्वी थिएटर उन गिनी चुनी नाट्य संस्थाओं में से एक है जिसका उद्देश्य पैसे कमाना न होकर कला का सृजन है. शशि कपूर के चले जाने के बाद उनके पुत्र कुणाल कपूर इसकी देखभाल कर रहे हैं. राज कपूर साहब की फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत की पंक्तियां थीं

‘ये मेरा गीत, जीवन संगीत, कल भी कोई दोहराएगा

जग को हंसाने, बहरूपिया, रूप बदल फिर आएगा’

आरके स्टूडियो तो बिक गया, उम्मीद है पृथ्वी थिएटर बचा रहे. आनेवाली पीढ़ियां इसकी देखभाल करती रहें. राज कपूर कहा करते थे, ‘द शो मस्ट गो ऑन’

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