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कोरोना संकट: क्या भारत में लॉकडाउन अब नहीं बढ़ेगा?

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कोरोना संकट: क्या भारत में लॉकडाउन अब नहीं बढ़ेगा?

भारत में रेल सेवा चरणबद्ध तरीक़े से शुरू हो गई है. श्रमिक ट्रेनों के बाद राजधानी रूट पर 30 ट्रेनें शुरू की गईं, अब एक जून से 200 और ट्रेनें चलाई जाएंगी. 25 मई से हवाई सेवा भी शुरू होने जा रही है.

कहा जा रहा था कि आवागमन के ये साधन सबसे आख़िर में खुलेंगे, तो क्या ये संकेत है कि देश में लॉकडाउन अब आगे नहीं बढ़ेगा? अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि कारोबारों का प्रेशर है, जिसके चलते मौजूदा चरण में ही लॉकडाउन में रियायतें मिली हैं. उम्मीद है कि जल्द ही लॉकडाउन से छुटकारा मिलेगा. फ़िलहाल देश लॉकडाउन के चौथे चरण में है, जो 31 मई तक चलेगा. चौथे चरण के दौरान ही देश में कई चीज़ों में ढील दी गई. कई तरह की आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने की इजाज़त मिली है. लोगों ने काम पर निकलना शुरू कर दिया है. सड़कों पर मोटरसाइकल, कार और ऑटो रिक्शा दिखने लगे हैं. अंतर-राज्यीय यात्री परिवहन दो राज्यों की आपसी सहमति के बाद शुरू करने की भी अनुमति मिली. हालांकि लोगों को अधिक संख्या में इकट्ठा होने से रोकने के लिए कई तरह की रोक अभी भी जारी है. सभी सिनेमा हॉल, शॉपिंग मॉल, जिम, स्विमिंग पूल, इंटरटेनमेंट पार्क, थियेटर, ऑडिटॉरियम, बार, असेंबली हॉल बंद रखे गए हैं.

सबसे पहले प्रतिबंध लगाने वाले देशों में एक

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भारत उन चंद देशों में से एक था, जिन्होंने पहले ही सख़्त यात्रा प्रतिबंध लगा दिए थे. शुरू में ज़्यादातर वीज़ा को सस्पेंड कर दिया गया और सभी इंटरनेशनल फ्लाइट को रोक दिया गया. लॉकडाउन शुरू होते ही भारत ने देश के अंदर भी ट्रेन और हवाई सेवा रोक दी. 25 मई को लॉकडाउन को दो महीने हो जाएंगे. इस लगातार चल रहे लॉकडाउन ने देश के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी की हैं. जब 21 दिन के लॉकडाउन का पहला चरण ख़त्म हुआ और इसे आगे बढ़ाया गया था तबसे ही कोरोना संकट से जूझ रहे देश के सामने एक और संकट खड़ा हो गया. दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले प्रवासी कामगार अपने गाँव जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े.

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उनके लिए स्पेशल श्रमिक ट्रेनें और बसें चलाई गईं, लेकिन उसके बाद भी प्रवासी मज़दूरों की चिंता कम नहीं हुई और उनका अपने गृह क्षेत्रों की ओर जाना जारी रहा. मई की शुरुआत में कुछ ट्रांस्पोर्टर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बात करते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा भी था कि जल्द ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट शुरू किया जाएगा. जिससे पब्लिक में कॉन्फिडेंस आए और अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूर भी रुक जाए, क्योंकि फिर उन्हें लगेगा कि अब स्थिति सामान्य हो रही है. अपोलो अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ सुब्रमण्यम भी मानते हैं कि अब लॉकडाउन खोलना इसलिए भी ज़रूरी हो गया है, क्योंकि इससे लोगों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है. वे कहते हैं, “सरकार ने कुछ रियायतें देकर इस समस्या का हल करने की कोशिश की, लेकिन लिमिटेड कारोबार और दुकानें खुलेंगी तो माँग भी बढ़ेगी. इससे लोगों की भीड़ एक जगह ज़्यादा होगी. इसलिए हो सकता है सरकार विचार करे कि लॉकडाउन पूरी तरह हटा ही दिया जाए.”

क्या हालात सामान्य हो जाएंगे

लेकिन लॉकडाउन ख़त्म होने से क्या हालात सामान्य हो जाएंगे? इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञ इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. डॉ सुब्रमण्यम कहते हैं, “सरकार कह रही है कि ट्रेन, हवाई सेवा के दौरान सोशल डिस्टेंसिग का पालन किया जाएगा. हर तरह की एहतियात बरतकर कोरोना के साथ जीना सीखना होगा.” लेकिन भारत में आए दिन रिकॉर्ड मामले बढ़ रहे हैं. भारत में गुरुवार को 24 घंटे में 5,609 नए मामले दर्ज किए गए. ऐसे में अगर लॉकडाउन ख़त्म किया जाएगा तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ये ख़तरनाक भी हो सकता है. क्योंकि वैज्ञानिक नज़रिए से ये सलाह दी जाती रही है कि, लॉकडाउन तब खुलने चाहिए जब प्रति दिन के हिसाब से मामले कम होने लगें

डॉ सुब्रमण्यम कहते हैं, “अगर देश की इस वक़्त की स्थिति को देखा जाए, तो मेरे ख़्याल में लॉकडाउन को धीरे-धीरे हटाना तो पड़ेगा. लेकिन पहली चीज़ ये देखना ज़रूरी है कि क्या लॉकडाउन हटाने का ये सही वक़्त है और क्या जिस तरह से लॉकडाउन को हटाया जा रहा है, वो सही तरीक़ा है. अगर हमने लॉकडाउन खोल दिया और हम सोशल डिस्टेंसिंग बनाए नहीं रख पाए और भीड़ इकट्ठा होने से नहीं रोक पाए. तब मामलों की संख्या बढ़ना तय होगी.”

रेलवे ने ट्रेनों की संख्या 200 और बढ़ाने की तैयारी कर ली है. लेकिन ट्रेनों में कितनी सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन हो पाएगी और लोग एक दूसरे से संपर्क में आने से कितना बच पाएंगे ये चिंता का विषय बना हुआ है. साथ ही नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप पुरी ने भी कहा है कि वो विमानों में बीच की सीट ख़ाली नहीं रखेंगे. ज़ाहिर है इसके पीछे आर्थिक वजहें हैं, लेकिन इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है.

सबसे ज़्यादा नए मामलों वाले चार देशों में शामिल भारत

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में, गुरुवार से पहले 24 घंटे के दौरान जो नए मामले सामने आए, उनमें से दो-तिहाई मामले सिर्फ़ चार देशों में दर्ज किए गए, जिनमें भारत भी शामिल है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बुधवार को ही यह चेतावनी दी थी कि ‘कोरोना वायरस महामारी को लेकर यह ना समझा जाए कि ये समाप्ति की ओर है.’ जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस ऐडहेनॉम गेब्रीयेसस ने कहा कि “जैसे-जैसे अमीर और विकसित देश लॉकडाउन से उभर रहे हैं, कोरोना वायरस संक्रमण ग़रीब देशों में फैल रहा है.” उन्होंने कहा, “हमें अभी भी बहुत लंबा सफ़र तय करना है. हमें चिंता है कि यह महामारी अब निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बढ़ रही है.”

दूसरे दौर के संक्रमण का ख़तरा

नई दिल्ली में दुकानें खुलींइमेज कॉपीरइटHINDUSTAN TIMES

ऐसे कई देश हैं जहां लॉकडाउन को हटाया गया या फिर प्रतिबंधों में छूट दी गई. लेकिन कई जगह देखने को मिले कि लॉकडाउन के बाद वहां संक्रमण की सेकेंड वेभ आने का ख़तरा बढ़ गया. चीन में नए मामले सामने आने लगे, दक्षिण कोरिया में भी नाइट क्लब से जुड़े नए मामले देखे गए, जिसके बाद वहां फिर से प्रतिबंध लगाने पड़े. लंबे लॉकडाउन के बाद यूरोप के कई देश भी अब अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे रहे हैं और लोगों पर लगाई गई पाबंदियों में ढील दे रहे हैं. लेकिन यूरोपीय संघ की एजेंसी यूरोपियन सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ प्रिवेन्शन एंड कंट्रोल की निदेशक डॉक्टर एंड्रिया अम्मॉन ने चेतावनी दी है कि यूरोप को कोराना की दूसरी लहर के लिए तैयार रहना चाहिए. अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि लॉकडाउन खोला तो कहीं भारत के साथ भी ऐसा ना हो, क्योंकि एक बार लॉकडाउन खोलने के बाद फिर से लॉकडाउन जैसे प्रतिबंध लगाने पड़े तो इससे अर्थव्यवस्था को और नुक़सान होगा.

कोरोना मरीजों की संख्या 1 लाख के पार, फिर क्यों सरकार ने नियमित प्रेस ब्रीफिंग से बनाई दूरी

देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक लाख से अधिक हो गए हैं। मृतकों का आंकड़ा भी 3,400 को पार कर चुका है। लेकिन इस बीच कोरोना को लेकर नियमित रूप से सरकार की ओर से होने वाली प्रेस ब्रीफिंग पर विराम लग गया है।  पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी इस पर चिंता जाहिर की है। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि आखिर भारत सरकार कोरोना संकट की घड़ी में रोज प्रेस ब्रीफिंग करने से क्यों बच रही है? जब मामले ज्यादा बढ़ रहे हैं तो सरकार क्यों सवालों से भाग रही है? हालांकि आउटलुक से बातचीत में स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर के अधिकारियों ने इसकी वजह साफ की है।

इस तरह कम होता गया प्रेस ब्रीफिंग का सिलिसिला

जब से कोविड-19 का संक्रमण देश में तेज़ी से फैलना शुरू हुआ है, तब से स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी लगातार मीडिया को इससे जुड़ी जानकारी साझा करते रहे। शुरुआत में कुछ दिन तक लगातार प्रेस ब्रीफिंग हुई। फिर सप्ताह में तीन से चार दिन और अब संबधित अधिकारी 11 मई के बाद सीधे 20 मई को मीडिया से मुखातिब हुए। गौर करने वाली बात है कि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन 25 मार्च को लागू हुआ था। 25 मार्च से लेकर 20 अप्रैल के बीच स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोविद -19 पर नियमित रूप से प्रेस ब्रीफिंग की। इस दौरान रोजाना मीडिया से मुखातिब होने का सिलसिला जारी रहा। जबकि 21 अप्रैल से 20 मई के बीच के 20 दिनों में मंत्रालय ने सिर्फ 12 दिन ही प्रेस ब्रीफिंग की है। हालांकि 22 अप्रैल को सरकार ने फैसला किया था कि देश में कोरोना वायरस पर हालात की जानकारी देने के लिए हर रोज शाम चार बजे होने वाली स्वास्थ्य मंत्रालय की दैनिक स्वास्थ्य ब्रीफिंग अब सप्ताह में चार दिन होगी। साथ ही प्रेस विज्ञप्ति और कैबिनेट ब्रीफिंग वैकल्पिक दिनों पर की जाएगी। लेकिन अब सप्ताह में चार दिन भी प्रेस ब्रीफिंग नहीं हो रही है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

सरकार की ओर से नियमित प्रेस कांन्फ्रेंस नहीं किये जाने को लेकर विपक्ष की ओर से भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जयराम रमेश ने ट्वीट कर कहा है कि महामारी के इस दौर में देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि देश इस समय किस स्थिति से गुजर रहा है। कोरोना संक्रमण को लेकर देश में जिस तरह के हालात बन चुके हैं उसके बारे में जानकारी देने के लिए हर दिन स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े किसी बड़े डॉक्टर या फिर स्वास्थ मंत्रालय के किसी बड़े चेहरे को प्रेस ब्रीफिंग करनी चाहिए। उन्होंने कहा स्वास्थ्य मंत्री खुद एक डॉक्टर हैं इसलिए उन्हें हर दिन कोरोना से संबंधित ब्रीफिंग करनी चाहिए। उन्होंने इस दौरान सरकार को सुझाव देते हुए हा कि एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया को हर रोज प्रेस ब्रीफिंग करनी चाहिए और जनता के सामने देश के स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए।

क्या कहते हैं अधिकारी?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि सरकार कोरोना वायरस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से बच रही है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। आउटलुक  सेे उन्होंने कहा, “अभी डब्ल्यूएचओ का इंवेट था। इसके अलावा जो अधिकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने जाते हैं वे अलग-अलग राज्यों का दौरा कर रहे हैं। इसलिए प्रेस ब्रीफिंग नहीं हो पाई। इसका कोई और कारण न निकाला जाए।”

वहीं आईसीएमआर के वैज्ञानिक और मीडिया कोऑर्डिनेटर डॉ. लोकेश शर्मा इसके पीछे अलग कारण बताते हैं। उन्होंने कहा, “प्रेस कॉन्फ्रेंस पीआईबी आयोजित कराती है और वही स्लॉट देती है। इससे पहले आर्थिक पैकेज को लेकर सरकार की ब्रीफिंग चल रही थी फिर अम्फन चक्रवात पर ब्रीफिंग होने लगी इसलिए कोविड-19 की ब्रीफिंग नहीं हो पाई।” उन्होंने आगे बताया कि ब्रीफिंग नहीं करने का सिलसिला ज्यादा लंबित न हो इसीलिए बुधवार को चक्रवात और कोविड-19 की ब्रीफिंग एक साथ हुई। डॉ शर्मा भी प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचने के आरोप को खारिज करते हैं।

क्यों ज़रूरी है प्रेस ब्रीफिंग

अमेरिका जैसे देश में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प खुद नियमित प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते हैं। कोरोना से संबंधित घटनाक्रम और सरकार का पक्ष वो खुद मीडिया के समक्ष रखते हैं। जबकि हमारे देश में स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी, आईसीएमआर के शीर्ष अधिकारी कोरोना पर मीडिया के सामने ब्रीफिंग करते हैं। ऐसी स्थिति में भी अब प्रेस ब्रीफिंग की संख्या घट रही है। सरकार फिलहाल नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बजाय अब प्रेस रिलीज के जरिये संबंधित जानकारियां उपलब्ध करा रही है। लेकिन प्रेस रिलीज प्रेस ब्रीफिंग का विकल्प नहीं हो सकता। प्रेस रिलीज एक पक्षीय संवाद है जबकि प्रेस ब्रीफिंग द्विपक्षीय चर्चा है। एक तरफा संवाद में कोई चैनल नहीं होता जिसके माध्यम से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या प्रश्न पूछ सकते हैं। जबकि मीडिया ब्रीफिंग में अधिकारियों के पास एक मंच होता है जहां वे विषय के बारे में विस्तार से बता सकते हैं, साथ ही मीडिया को स्पष्टीकरण मांगने का मौका भी मिलता है, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा दी गई सूचनाओं के अलावा अन्य मामलों पर सवाल पूछा जा सकता है। प्रेस ब्रीफिंग ज्यादा लोकतांत्रिक होती है। लिहाजा कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच प्रेस ब्रीफिंग की संख्या घटना परेशान करने वाली बात है।

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