महा-उत्सव, महा-कारोबार! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जैसे-जैसे चुनाव विशुद्ध सत्ता के खेल में बदलते गए, कारोबार में बेहिसाब तेजी की वजह भी बनते गए। आज यह दुनिया का सबसे खर्चीला चुनाव होने का रिकॉर्ड बनाने जा रहा है। फर्क यह है कारोबार के तौर-तरीके बदल गए हैं। पहले पोस्टर-बैनरों का कारोबार उफान पर होता था, तो अब हवाई जहाजों और हेलीकॉप्टरों, सोशल मीडिया, विज्ञापनों, वातानुकूलित मंच, टेंट-शामियाने, एसयूवी वगैरह के कारोबार की चांदी हो गई है। जाहिर है, अब यह खेल छोटे कारोबारियों के हाथ से निकल कर कॉरपोरेट तंत्र के पास पहुंच गया है। आलम यह है कि घाटे में चलने वाली बिजनेस एयरक्रॉफ्ट इंडस्ट्री केवल 30-45 दिन में ही पूरे साल की कमाई की भरपाई कर लेगी। इसी तरह विज्ञापन इंडस्ट्री को 2,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई होने का अनुमान है। सोशल मीडिया पर हर उम्मीदवार 25-30 दिनों के लिए 20-25 लाख रुपये खर्च करने को तैयार है।

इसकी शुरुआत तो 2014 के चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा के अभियान से ही हो गई थी, जब सब कुछ पांच सितारा होने लगा था। लेकिन इस बार यह विशाल पैमाने पर पहुंच गया है। चुनाव खर्च पर नजर रखने वाले सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के चेयरमैन एन.भास्कर राव का कहना है, “इस बार करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च का मोटा अनुमान है जो दुनिया में सबसे महंगे अमेरिकी चुनाव से भी ज्यादा खर्चीला होगा।” उनके मुताबिक, 2014 में करीब 30 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए होंगे।

) रायबरेली से नामांकन के दौरान सोनिया गांधी का रोड शो

एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री हवा-हवाई

चुनावों में स्टार प्रचारकों के लिए सबसे ज्यादा प्राइवेट प्लेन की डिमांड रहती है। आलम यह है कि बड़ी पार्टियों ने जनवरी-फरवरी से ही प्लेन की बुकिंग करा रखी है। एक घंटे की उड़ान के लिए 80 हजार रुपये से लेकर 3.50 लाख रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं। बिजनेस एयरक्रॉफ्ट ऑपरेटर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार देश में 246 हेलीकॉप्टर, 100 टर्बो प्रॉप्स और 142 प्राइवेट जेट हैं, जो पूरी तरह से बुक हैं। बिजनेस एयरक्रॉफ्ट इंडस्ट्री इस समय करीब 14,000 करोड़ रुपये की है।

बिजनेस एयरक्रॉफ्ट ऑपरेटर्स एसोसिएशन के मैनेजिंग डायरेक्टर आर.के.बाली का कहना है कि “सामान्य तौर पर 40-50 फीसदी सीट ही बुक रहती है लेकिन चुनावों में वेटिंग की स्थिति आ जाती है। नेताओं के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाने में चार्टर प्लेन काफी फायदेमंद होते हैं। जिन नेताओं को एक घंटे से ज्यादा की उड़ान भरनी होती है वे जेट प्लेन का इस्तेमाल करते हैं, जो सामान्यतया 16-20 सीट के होते हैं। 4-8 सीट वाले हेलीकॉप्टरों का ज्यादा इस्तेमाल होता है। वीवीआइपी नेता सुरक्षा के लिहाज से डबल इंजन वाले हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं। इनका खर्च भी इसी हिसाब से बढ़ता रहता है। इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, 50 फीसदी से ज्यादा चार्टर प्लेन की बुकिंग भाजपा ने कर रखी है। ऐसे में दूसरी पार्टियों के लिए चार्टर प्लेन की वेटिंग भी है।

विज्ञापन जगत की चांदी

बिजनेस एयरक्रॉफ्ट की तरह चुनाव विज्ञापन इंडस्ट्री के लिए भी काफी बूस्ट लेकर आया है। इंडस्ट्री को पिछले एक साल से काफी काम मिल रहा है। ब्रांड गुरु हरीश बिजूर के अनुसार, “अकेले लोकसभा चुनावों से विज्ञापन इंडस्ट्री को 2,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त आय का अनुमान है।”  पिछली बार भाजपा के ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ और ‘अबकी बार मोदी सरकार’  कैंपेन करनी वाली कंपनी का हिस्सा रहे एक ऐड एक्सपर्ट के अनुसार “2014 में मोदी की एंट्री ने पूरे चुनाव अभियान को बदल दिया। विज्ञापन एजेंसी के लिए राजनैतिक दल अब एक उत्पाद की तरह बन गए हैं। इस बार भाजपा ने ओगिलवे और कांग्रेस ने पर्सेप्ट को अपने कैंपेन की जिम्मेदारी सौंपी है।” इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, दोनों पार्टियां करीब 800-1000 करोड़ रुपये इस पर खर्च कर रही हैं। एजेंसी के ऊपर पूरी जिम्मेदारी होती है, वह स्क्रिप्ट लिखने से लेकर मीडिया प्रबंधन तक का काम देखती है।

इसके अलावा उम्मीदवार अपने स्तर पर भी प्रोडक्शन हाउसों की सेवाएं ले रहे हैं, जो उनके लिए स्थानीय स्तर पर प्रमोशन फिल्म बना रहे हैं। चुनावों में काम को देखते हुए ऐसा अनुमान है कि इस साल कंपनियों के टर्नओवर में दो से ढाई गुना तक बढ़ोतरी हो जाएगी। किसी भी कैंपेन में सबसे अहम उसका थीम गाना होता है। जैसे कि 2014 में ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ के प्रोडक्शन से लेकर प्रमोशन पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। ठीक इसी तरह 2019 में भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने थीम गाने पर अच्छा खासा पैसा खर्च कर रही हैं। कांग्रेस के थीम गाने ‘अब न्याय होगा’ को जावेद अख्तर ने  लिखा है और निखिल आडवाणी ने निर्देशन किया है। इसी तरह भाजपा ने ‘एक बार फिर मोदी सरकार’ कैंपेन लॉन्च किया है।

प्रधानमंत्री एक दिन में कई रैलियां करते हैं

चुनावों में स्क्रिप्ट राइटिंग का भी बिजनेस काफी बढ़ गया है। कर्नाटक में एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले विप्लव का कहना है कि मुझे पांच मिनट की स्क्रिप्ट लिखने के लिए 25 हजार रुपये मिले। चुनावों में राजनीति से प्रेरित फिल्मों की कमाई भी बढ़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी ‘पीएम मोदी’, मनमोहन सिंह पर बनी ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, बालठाकरे पर बनी ‘ठाकरे’ इसके अलावा एन.टी.रामाराव, राजशेखर रेड्डी और राहुल गांधी पर भी बॉयोपिक ने बॉलीवुड से जुड़े लोगों को अच्छा काम दिया है।

सोशल मीडिया की बल्ले-बल्ले

2019 का चुनाव सोशल मीडिया के लिए तो वरदान बनकर आए हैं। देश के आधे से ज्यादा उम्मीदवार इस बार ‘वॉर रूम’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। मकसद है हर हाथ के मोबाइल या स्मार्ट फोन तक पहुंचना। सबसे ज्यादा जोर फेसबुक और वॉट्सऐप का है। देश में करीब 80 हजार राजनैतिक वॉट्सऐप ग्रुप बन गए हैं, जो 90 करोड़ मतदाताओं को रिझाने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं। अनुमान है कि 3,000-4,000 करोड़ रुपये केवल सोशल मीडिया पर खर्च होंगे।

कई उम्मीदवारों के लिए सोशल मीडिया कैंपेन बना रहे पी.आर.गुरु कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज शर्मा के अनुसार, “सोशल मीडिया कैंपेन में वाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर और विकीपीडिया पेज का खास इस्तेमाल है। बड़ी चुनौती फेक न्यूज से निपटने की है। टीम को 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है।” सोशल मीडिया पर पूरा चुनाव दो तरह से लड़ा जा रहा है। पहला जहां राजनीतिक दल पूरे भारत के आधार पर सोशल मीडिया और प्रचार अभियान की रणनीति बना रहे हैं, वहीं प्रत्याशी अपने स्तर पर अपने क्षेत्र के आधार पर रणनीति बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान में कई प्रत्याशियों के लिए प्रचार अभियान संभाल रहे एक व्यक्ति ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर बताया कि हम पैकेज के रूप में उम्मीदवारों को ऑफर कर रहे हैं। इसके तहत अगर कोई उम्मीदवार नुक्कड़ नाटक से लेकर, शॉर्ट वीडियो, पोस्टिंग आदि सब कुछ की जिम्मेदारी सौंपता है, तो करीब 15-20 लाख रुपये का खर्च आता है। केवल सोशल मीडिया के लिए कैंपेन बनाने पर करीब 3-4 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। प्रत्याशियों के लिए वॉर रूम मैनेज कर रही एक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, देश में इस समय करीब 50 फीसदी उम्मीदवार वॉर रूम स्ट्रेटेजी पर काम कर रहे हैं। इसके तहत छह-सात लोग काम करते हैं।

इसमें कंटेट राइटर, डिजाइनर, वीडियो एडिटर, इंजीनियर प्रमुख रूप से होते हैं। उनके अनुसार एक महीने के लिए वॉर रूम चलाने पर करीब 12-25 लाख रुपये खर्च आ रहा है।

छोटे-छोटे वीडियो का बाजार

चुनावों में छोटे-छोटे वीडियो बनाकर मतदाताओं को लुभाने का भी बहुत तेजी से ट्रेंड उभरा है। 30-45 सेकेंड के वीडियो बनाने के लिए 5,000-7,000 रुपये खर्च किए जा रहे हैं। अब मतदाताओं तक सही समय पर अपनी बात पहुंचाने के लिए भी फेसबुक पोस्ट की रणनीति बनाई जा रही है। हर रोज दो-तीन वीडियो पोस्ट किए जा रहे हैं। यानी एक महीने के अंदर 60-90 वीडियो मतदाताओं तक पहुंचेंगे, जिस पर करीब पांच से छह लाख रुपये का खर्च होगा।

भाजपा सबसे खर्चीली

इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, पूरे चुनाव में सबसे तेज अभियान भाजपा का है। सोशल मीडिया पर होने वाले खर्च में पार्टी की करीब 75-80 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके अलावा इन चुनावों में सबसे ज्यादा खर्च हरियाणा और तमिलनाडु में सोशल मीडिया पर किया जा रहा है। इस बात को फेसबुक और गूगल पर पार्टियों के खर्च से भी समझा जा सकता है। फेसबुक की ऐड रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, 6 अप्रैल 2019 तक भाजपा और उसके समर्थकों ने सबसे ज्यादा विज्ञापन दिए हैं। सबसे ज्यादा ‘भारत के मन की बात’ नाम के दो पेज से 2.23 करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए गए हैं। इसी तरह ‘माई फर्स्टवोट मोदी डॉटकॉम’ से 1.05 करोड़, ‘नेशनल विद नमो’ नाम के दो पेज से 1.09 करोड़ और भाजपा के पेज से 36 लाख रुपये के विज्ञापन दिए गए हैं। कांग्रेस के पेज से 25.75 लाख रुपये के विज्ञापन दिए गए हैं। इसी तरह गूगल द्वारा जारी ट्रांसपैरेंसी रिपोर्ट के अनुसार, 19 फरवरी से लेकर 3 अप्रैल तक राजनैतिक पार्टियों ने 3.76 करोड़ रुपये का विज्ञापन दिया है। इसमें से 32 फीसदी विज्ञापन यानी 1.21 करोड़ रुपये अकेले भाजपा ने दिए हैं। जबकि कांग्रेस ने केवल 54,100 रुपये के विज्ञापन दिए हैं।

पार्टियों ने इस बार उम्मीदवारों के चयन में भी टेक्नोलॉजी का खूब इस्तेमाल किया है। भाजपा से लेकर कांग्रेस के लिए काम करने वाले ‘नेता ऐप’ के फाउंडर प्रथम मित्तल ने बताया, “हमने भाजपा के लिए 449 संसदीय क्षेत्र और कांग्रेस के लिए 406 संसदीय क्षेत्र में ऐसा किया है। जिन उम्मीदवारों की रैंकिंग हमारे ऐप पर अच्छी थी, उसमें से 60 फीसदी से ज्यादा लोगों को टिकट मिले हैं।”

इवेंट मैनेजमेंट की अंगुलियां घी में

चुनावों में इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के बिजनेस भी 40-50 फीसदी बढ़े हैं। डोम वाले पांडाल और बड़े स्टेज पर जब रैलियां होती हैं, तो उस पर 20-25 लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि छोटी रैलियों का खर्च कम आता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रत्याशियों के लिए स्टेज बनाने से लेकर ई-रिक्शा का प्रबंधन करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि स्टेज बनाने, कुर्सियां लगाने और साउंड-पंखे पर 35-40 हजार रुपये का खर्च आ रहा है। उनके अनुसार, इसके अलावा इन चुनावों में ई-रिक्शा की मांग भी काफी है।

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