मीडिया जब अपने कारोबारी हितों के हिसाब से ही चलेगा तो बाकी मामलों में उसकी क्या विश्वसनीयता बचेगी?

बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल पर मुख्यधारा मीडिया का चरित्र एक बार फिर सामने आ गया। चैनलों और अखबारों ने यह तो बताया कि पिटाई के विरोध में डॉक्टर हड़ताल पर हैं, लेकिन यह बताने में उसकी स्याही सूख गई कि बंगाल सरकार वोट बैंक की खातिर हमलावरों को बचा रही है। जिस तरह दूसरे राज्यों में ऐसे मामलों में मीडिया एक लाइन ले लेता है, वैसा बंगाल में देखने को क्यों नहीं मिलता? क्या उन्हें ममता बनर्जी और तृणमूल के गुंडों से डर लगता है? बंगाल के कई शहरों में हड़ताल कर रहे डॉक्टरों पर मुस्लिमों ने हमले किए, एक विधायक ने बलात्कार और हत्या की धमकियां दीं, लेकिन ये सब कुछ तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों से गायब रहा।
मानवीय त्रासदी के मामलों में मीडिया का अधकचरापन नई बात नहीं है। बिहार में ‘चमकी’ बुखार से बच्चों की मौत की कवरेज हैरान करने वाली है। टीआरपी के लिए एक नए-नवेले चैनल का संपादक अस्पताल के आईसीयू में घुस गया और एक जूनियर डॉक्टर पर सवाल दागने लगा, जिनके लिए जवाबदेही बड़े सरकारी अफसरों और राज्य सरकार की होनी चाहिए। देखादेखी सबसे तेज चैनल ने भी अपनी पत्रकार को आईसीयू में भेजा और उसने भी लगभग वैसा ही हंगामा मचाया। समाचार चैनलों की संस्था एनबीए के दिशानिर्देशों के अनुसार कोई भी पत्रकार अस्पताल के वॉर्ड में घुसकर मरीजों की तस्वीरें नहीं दिखा सकता। सेल्फ रेगुलेशन के नाम पर बनाए गए मीडिया के ये नियम क्या सिर्फ शोभा बढ़ाने के लिए हैं?
भारतीय मीडिया का पाकिस्तान प्रेमी चरित्र समय-समय पर सामने आता रहता है। किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के बाद कई चैनलों ने ‘पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से’ ब्रेकिंग न्यूज चलाई कि प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान के बीच मुलाकात हुई है। जबकि भारतीय अधिकारी कहते रहे कि मुलाकात नहीं, एक शिष्टाचार अभिवादन भर हुआ। समझना मुश्किल नहीं है कि यह झूठ पाकिस्तान पर भारत की नीति को ढुलमुल दिखाने के लिए फैलाया गया होगा। सवाल यह है कि भारतीय पत्रकार आखिर किस ‘पाकिस्तानी सूत्र’ से खबरें लेते हैं और उसे बिना पुष्टि या जांचे-परखे चला देते हैं?
उधर हिंदुस्तान टाइम्स ने कश्मीर में मारे गए आतंकी सज्जाद अहमद भट के महिमामंडन की कोशिश की। एक ऐसी श्रद्धांजलि छापी, जिसे पढ़कर लोगों में आतंकवादी के ‘मानवीय पक्षों’ के बारे में पता चले। ऐसी कोशिश बुरहान वानी के समय हम देख चुके हैं। न्यूज पोर्टल इंडिया स्पीक्स डेली ने रिपोर्ट छापी कि जिस दिन पुलवामा हमला हुआ था, उसके अगले दिन समाचार एजेंसी पीटीआई के संपादकों ने दिल्ली के एक रेस्तरां में जश्न मनाया था। इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सरकारी मदद से चलने वाली यह समाचार एजेंसी पिछले 5 साल में कई फर्जी खबरें उड़ाने में सबसे आगे रही है।
मीडिया का कांग्रेस प्रेम उल्लेखनीय है। कर्नाटक में बड़े जमीन घोटाले का भंडाफोड़ हुआ है। राज्य में इसे लेकर विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं, लेकिन दिल्ली के मीडिया में कोई खास चर्चा नहीं है। किसी ने राहुल गांधी से भी नहीं पूछा कि उनकी राज्य सरकार एक उद्योगपति को इस तरह कौडि़यों के भाव जमीन क्यों दे रही है?
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने बिजली कटौती के खिलाफ फेसबुक पोस्ट के लिए एक व्यक्ति पर देशद्र्रोह कानून लगा दिया। टाइम्स नाऊ और एकाध चैनलों को छोड़ दें तो ज्यादातर ने इसका जिक्र तक नहीं किया। इंडिया टुडे-आजतक समूह ने तो इसे सप्रयास दबाया, क्योंकि खबर दिखाने पर कांग्रेस के केंद्र्रीय नेताओं से पूछना पड़ता कि वे तो देशद्र्रोह कानून ही खत्म करने का वादा कर रहे थे और अब बिजली कटौती की शिकायत पर भी देशद्र्रोह कानून लगाने लगा?
पाकिस्तान पर क्रिकेट में जीत का जश्न मनाने पर उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में एक दलित हिंदू युवक को पड़ोसी मुसलमानों ने जिंदा जला दिया। दलितों का हितैषी बनने वाले मीडिया को इस खबर पर मानो सांप सूंघ गया। कुछेक ने खबर छापी भी तो युवक की पहचान किसान के रूप में बताई। जिन्होंने दलित बताया भी वे हत्यारों की पहचान छिपा गए। बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि दलितों में मीडिया की रुचि हिंदुओं में जातीय वैमनस्य पैदा करने से ज्यादा कुछ नहीं है।

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