नंदा देवी शिखर पर चढ़ने की कोशिश करते आठ पर्वतारोहियों के साथ हुए हालिया हादसे ने कई जरूरी बातों की तरफ ध्यान खींचा है

एवरेस्ट पर हुए हादसों के दौरान उत्तराखंड हिमालय में हुए एक बड़े हादसे ने एक बार फिर पर्वतारोहण के शौक से जुड़े खतरों की तरफ ध्यान खींचा है. राज्य के पिथौरागढ़ जिले में 7434 मीटर ऊंचे नंदा देवी ईस्ट शिखर के आरोहण के लिए निकले एक अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही दल के आठ सदस्यों के साथ हुए हादसे ने एक बार फिर इस बेहद कठिन और दुरूह पर्वत शिखर को जानलेवा साबित कर दिया है. साथ ही इसने भारतीय हिमालय क्षेत्र में बचाव अभियानों के बौनेपन की भी पोल खोल दी है. नंदा देवी ईस्ट अभियान का नेतृत्व कर रहे जाने-माने पर्वतारोही इंग्लैण्ड के मार्टिन मोरान भी हादसे का शिकार होने वालों में हैं.

भारतीय पर्वतारोहण संस्थान द्वारा अनुमोदित इस अभियान दल में कुल 12 पर्वतारोही शामिल थे. 13 मई को यह दल मुनश्यारी से मिलम ग्लेशियर की ओर रवाना हुआ. मारतोली गांव से होकर 90 किलोमीटर की यात्रा पूरी करके अभियान दल ने नंदाकोट और चागुंच शिखरों के नीचे भितल ग्वार में आधार शिविर बना लिया था. इसके बाद कुछ ही दिनों में दल ने नंदा देवी शिखरों से जुड़ने वाली लॉन्गस्टाफ कोल पर अग्रिम शिविर भी स्थापित कर लिया था. लॉन्गस्टाफ कोल नंदा देवी ईस्ट की दक्षिणी रिज है जो नंदादेवी सेंक्चुरी की सीमा भी बनाती है. पहले इसे नंदा देवी खाल कहा जाता था. 1905 में नंदा देवी क्षेत्र में पहली बार प्रवेश करने के प्रयास में 5919 मीटर ऊंचे इस स्थान पर सर्वप्रथम पहुंचने वाले डाक्टर टीजी लॉन्गस्टाफ के नाम पर इसे नया नाम मिला. यहां तक पहुंचना बेहद कठिन माना जाता है.

लॉन्गस्टाफ कोल पहुंचने के बाद नंदा देवी ईस्ट पर चढ़ने से पहले अभियान दल के आठ सदस्य 25 मई को अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाले 6477 मीटर ऊंचे एक अनाम शिखर पर अनुकूलन और अभ्यास के लिए निकले थे जबकि उनके अन्य साथी बेस कैंप पर वापस लौट आए थे. लेकिन जब निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक जब ये आठ सदस्य वापस नहीं लौटे तो शेष सदस्यों को चिंता होनी शुरू हुई.

फिर भारवाहियों ने मार्तोली वापस आकर बड़े हादसे की आशंका जताई. इसके बाद जिला प्रशासन और राज्य सरकार हरकत में आए. सबसे पहले बेस कैंप में बेहद कमजोर मनोबल और अनहोनी की आशंका से आहत चार पर्वतारोहियों को हेलीकाप्टरों के जरिए बचाया गया और आवश्यक उपचार के बाद उनमें से एक दल के उपनेता मार्क थाॅमस को वायुसेना अपने साथ आरोहण क्षेत्र में हादसे की संभावित जगहों तक ले गई. मौसम खराब होने के बावजूद एरियल सर्वे में इस बचाव दल को पांच पर्वतारोहियों के शव और उसके पास ही कुछ रकसैक आदि दिखाई दिए. अब एसडीआरएफ,आईटीबीपी और वायुसेना मिलकर शवों की तलाश और उन्हें नीचे लाने का प्रयास कर रहे हैं.

नंदा देवी के नजदीक एक शिखर के करीब दिखते पर्वतारोहियों के शव
नंदा देवी के नजदीक एक शिखर के करीब दिखते पर्वतारोहियों के शव

इसके साथ ही इस बात को लेकर सवाल उठाए जाने लगे हैं कि जब अभियान दल के पास नंदा देवी ईस्ट के आरोहण की ही अनुमति थी तो उन्होने दूसरे अनाम शिखर पर आरोहण का जानलेवा प्रयास क्यों किया. हालांकि इस बारे में अभियान दल के उपनेता मार्क थाॅमस ने एक पत्र के जरिए प्रशासन को सफाई दी है कि नंदा देवी ईस्ट के आरोहण के लिए कैंप दो स्थापित करने के बाद अभियान दल ने जब 6477 मीटर ऊंचे अनाम शिखर पर आरोहण का प्रयास किया तो उससे पहले दल के साथ भारतीय पर्वतारोहण संस्थान द्वारा नियुक्त लायजन आफीसर चेतन पांडे को लिखित रूप में इसकी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अनुरोध पत्र दे दिया गया था. अच्छे पर्वतारोही चेतन बाद में इस अभियान के साथ आरोही के रूप में जुड़ गए थे और लापता आरोहियों में उनका भी नाम है.

अभियान दल के नेता मार्टिन मोरान 2009 में भी नंदा देवी ईस्ट आरोहण के लिए इस इलाके में आए थे. लेकिन इस शिखर के लिए अपनी तैयारियों को अपेक्षित स्तर का न पाकर और तकनीकी तौर पर संसाधनों की कमी को देखते हुए तब भी उन्होंने अपने साथियों के साथ नंदा देवी से जुड़े 6,322 मीटर ऊंचे चांगुच शिखर पर आरोहण का प्रयास किया था. पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले की सीमा पर स्थित चांगुच तब तक अविजित था.

इसे आरोहण के लिए काफी कठिन शिखर माना जाता है. पिंडारी ग्लेशियर की ओर से इस शिखर पर आरोहण के लिए 1987, 1997 और 2007 में प्रयास हुए थे. 2009 में भी इस शिखर पर आरोहण के दो भारतीय प्रयास असफल रहे मगर नंदा देवी ईस्ट आरोहण के लिए आए मार्टिन के ब्रिटिश दल ने नौ जून 2009 को चांगुच शिखर पर झण्डा फहराने में कामयाबी हासिल की. मार्टिन ने अपने सफल चांगुच अभियान के बारे में हिमालयन जर्नल के 2010 के अंक 66 में ‘द फर्स्ट एसेंट ऑफ चांगुच एंड ए क्राॅसिंग ऑफ ट्रेल्स पास ‘शीर्षक से एक विस्तृत लेख भी लिखा था. इस बार अभियान दल ने मार्तोली से आगे ल्वान गाड़ वाले उसी मार्ग को चुना था जिस पर मार्टिन इस बार नंदा देवी ईस्ट के आरोहण के लिए निकले थे. लेकिन इस बार कुदरत उन पर मेहरबान नहीं रही.

ऊंचाई में कम होते हुए भी नंदा देवी ईस्ट को आरोहण के लिए बेहद खतरनाक और तकनीकी रूप से अत्यधिक चुनौती पूर्ण शिखर माना जाता है. प्रथम एवरेस्ट आरोही तेनजिंग नोर्गे ने नंदा देवी को एवरेस्ट से ज्यादा कठिन शिखर माना है. अपनी आत्म कथा ‘टाइगर ऑफ द स्नोज’ में तेनजिंग लिखते हैं, ‘हाल के वर्षों में भी जब लोग मुझसे यह पूछते हैं कि आपकी अब तक की सबसे मुश्किल और खतरनाक चढ़ाई कौन सी है. तो उनके मन में यह उम्मीद रहती है कि मैं एवरेस्ट का ही नाम लूंगा. लेकिन यह एवरेस्ट नहीं है. वह तो नंदा देवी ईस्ट है.’

नंदा देवी ईस्ट को जानलेवा शिखर यों ही नहीं कहा जाता. इसके साथ हादसों का एक सिलसिला जुड़ा है. पहले जानलेवा हादसे के गवाह तो तेनजिंग नोर्गे खुद रहे थे. तेनजिंग ने अपने जीवन में उत्तराखंड से बहुत कुछ सीखा था. 1931 से 1950 के बीच वे कई पर्वतारोहण अभियानों में उत्तराखंड आए और बंदरपूंछ, केदारनाथ, नंदा देवी आदि अनेक शिखरों के आरोहण में शामिल रहे. उनकी आत्मकथा में इस बारे में विवरण मिलता है कि नंदा देवी ईस्ट में उनके अभियान दल के साथ हुआ हादसा कितना दर्दनाक था.

1951 में इरिक शिप्टन के नेतृत्व में एवरेस्ट आरोहण के लिए एक अभियान आयोजित हो रहा था. तेनजिंग इसमें शामिल होना चाहते थे. मगर वे पहले ही हिमालयन क्लब से नंदा देवी अभियान के लिए अनुबन्ध कर चुके थे. तेनजिंग के साथ ऐसा पहले भी हुआ था. 1950 में जब वे बंदरपूंछ पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त कर रहे थे तो उसी दौरान फ्रेंच आरोही अन्नपूर्णा शिखर पर पहली विजय हासिल कर रहे थे. साथी शेरपाओं से उस अभियान के किस्से सुन कर तेनजिंग को इस बात का बहुत अफसोस हुआ कि वे उस अन्नपूर्णा अभियान में क्यों नहीं थे.

इसी तरह 1950 में ही जब तेनजिंग नंगा पर्वत अभियान पर थे तो उनके इलाके यानी सोल खुम्भू से एवरेस्ट आरोहण का एक प्रयास हो रहा था. टिलमैन और अमेरिकी आरोही डाॅ चार्ल्स हाॅस्टन का यह अभियान दक्षिणी मार्ग यानी नेपाल की ओर से एवरेस्ट के आधार तक पहुंचा था और इसके बाद इसी मार्ग से एवरेस्ट आरोहण के लिए कई योजनाएं बनीं. तेनजिंग को इस अभियान में शामिल न हो पाने का भी बहुत मलाल था.

एवरेस्ट को ‘अपना पर्वत’ कहने वाले तेनजिंग को इन एवरेस्ट अभियानों में शामिल न होने का दुख तो बहुत हुआ, मगर उन्होंने अपनी आत्मकथा में खुद को ढाढस बंधाते हुए लिखा है कि ‘आप दो जगहों पर कभी एक साथ नहीं रह सकते.’ नंदा देवी के फ्रैंच अभियान का नेतृत्व रोजर डूप्ला कर रहे थे और उस अभियान की योजना बहुत महत्वाकांक्षी थी. दरअसल अन्नपूर्णा अभियान की सफलता के बाद समूचे फ्रांस में हिमालय का आकर्षण एकाएक बढ़ गया था. डूप्ला भी दक्षिणी मार्ग से एवरेस्ट आरोहण करना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक अनुमति न मिल पाने से फ्रेंच अरोहियों ने नंदा देवी पर आरोहण की एक अनूठी योजना बनाई.

नंदा देवी मुख्य शिखर पर 1936 में टिलमैन और ओडेल ने सबसे पहले सफलता पाई थी तो 1939 में एक पोलिस अभियान दल ने अपेक्षाकृत छोटे नंदा देवी ईस्ट शिखर पर सफल आरोहण किया था. लेकिन अब तक इन दोनों शिखरों पर एक साथ आरोहण नहीं हुआ था. फ्रेंच आरोहियों की योजना दोनों शिखरों पर एक साथ आरोहण करने की थी और इसके दौरान दोनों शिखरों को जोड़ने वाली बेहद संकरी रिज पर ट्रेवर्स करने की योजना थी. यानी एक बार आधार शिविर से ऊपर चढ़कर एक शिखर पर आरोहण करने के बाद नीचे उतरने के बजाय दोनों शिखरों को जोड़ने वाली रिज से दूसरे शिखर पर आरोहण करने का प्रयास.

शिखर से शिखर आरोहण का यह प्रयास बेहद घातक और चुनौतीपूर्ण था. उस समय तक हिमालय के पर्वतारोहण इतिहास में ऐसा कोई प्रयास किसी भी शिखर समूह के लिए नहीं हुआ था. अभियान दल में कुल 18 आरोही थे. आठ फ्रांसीसी आरोही थे. भारतीय सेना से नंदू जुयाल थे. नौ शेरपा थे और तेनजिंग को शेरपा सरदार की जिम्मेदारी मिली थी. नंदू जुयाल के साथ तेनजिंग 1946 के बन्दरपूंछ अभियान में आरोहण कर चुके थे. दल के साथ बड़ी संख्या में स्थानीय भारवाही भी थे और उनके साथ भाड़े की दरों को लेकर अभियान दल की अनेक बार बहस हुई और विवाद भी हुए. लेकिन अनेक कठिनाइयों को पार करते हुए अभियान दल ऋषि गौर्ज को पार कर नंदा देवी के आधार में फूलों से भरी सेंक्चुरी में पहुंच गया.

तेनजिंग ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘मेरे सामने पवित्र देवी का पवित्र शिखर था. अपने पिछले नंदा देवी अभियान में जब हम यहां सर्वेक्षण के लिए आए थे तो मैं प्रायः नंदा देवी शिखर के सौन्दर्य से ही अभिभूत रहा, लेकिन इस बार स्थिति एकदम भिन्न थी. इस बार भी शिखर अलौकिक रूप से सुंदर था.’

25660 फुट ऊंचे मुख्य शिखर और 24400 फुट ऊंचे पूर्वी शिखर के बीच लगभग 23000 फुट ऊंची और दो मील से कुछ अधिक लंबी रिज पर से होकर एक शिखर से दूसरे शिखर तक जाने की योजना तेनजिंग को रोमांचित भी कर रही थी और चुनौती भी दे रही थी. लेकिन फ्रेंच आरोही बहुत आशावान थे. अभियान दल के नेता डूप्ला के मन में आत्मविश्वास भरा था और वे कुछ ही दिनों में अभियान को पूरा करने की योजना बना रहे थे.

मौसम अच्छा था. जल्द ही मुख्य शिखर पर कैंप थ्री स्थापित कर लिया गया. यहां से तय हुआ कि पहले मुख्य शिखर आरोहण होगा और फिर ऊंचाई से निचले शिखर की ओर बीच की रिज से होकर जाने का प्रयास किया जाएगा. 23600 फुट पर चौथा शिविर भी स्थापित कर लिया गया. यहां से शेरपाओं को नीचे के शिविरों में लौटना था और डूप्ला के साथ 21 वर्षीय गिलबर्ट विंग्स नामक कुशल राॅक क्लाइंबर को नंदा देवी शिखर आरोहण का प्रयास करना था. 29 जून, 1951 की सुबह वे शिखर के लिए निकल पड़े. उनके पास आपातकालीन स्थितियों के लिए एक हल्का टेंट भी था.

तेनजिंग को लुई डुबोस्ट और अभियान दल के चिकित्सक डॉ. पयान के साथ एक दूसरी जिम्मेदारी दी गई थी कि जब दोनों आरोही शिखर आरोहण से वापस लौटें तो ये लोग नंदा देवी ईस्ट की ढलान पर उनकी मदद के लिए मौजूद रहें. ये लोग पहले ही बाकी साथियों से अलग होकर चोटी के पास एक ऊंचे दर्रे, जिसका ब्रिटिश अन्वेषक थॉमस लांगस्टाॅफ के नाम पर नामकरण किया गया था, की ओर निकल पड़े थे. 29 जून को उनके तंबू वहां गड़ चुके थे.

इसी तारीख को सुबह के समय इन लोगों ने अपने कैंप से दो आकृतियों को नंदा देवी शिखर के बेहद करीब चढ़ाई करते देखा. काफी देर तक तेनजिंग और डुबोस्ट उन्हें ऊपर चढ़ते देखते रहे. मगर शिखर के एकदम समीप पहुंचकर उनका दिखना बंद हो गया. वे आकृतियां डुप्ला और विंग्स की थीं. यह पहले से तय था कि वे उसी दिन वापस नहीं आ सकेंगे. योजनानुसार उन्हें शिखर आरोहण के बाद किसी सुरक्षित स्थान पर रात में प्रवास करना था.

तेनजिंग ने लिखा है, ‘अगली सुबह अपनी योजनानुसार हमने लॉन्ग स्टाॅफ कोल से नंदा देवी ईस्ट की ओर चढ़ना शुरू किया जहां हमें उन दोनों से मिलना था. सुबह से दोपहर हो गई मगर उन दोनों का कहीं पता नहीं था. हमने ऊपर पहाड़ों में उन्हें देखने बहुत प्रयास किया. उनका नाम ले लेकर उन्हें जोर जोर से पुकारा भी, मगर कोई जवाब नहीं आया. जब अंधेरा होने लगा तो हमें मजबूर होकर लाॅन्ग स्टाॅफ कोल स्थित अपने शिविर में वापस लौटना पड़ा.

तेनजिंग ने आगे लिखा है, ‘यह तय था कि अगर वे दोनों किसी कारण वापसी में हमारी ओर न आकर सीधे बेस कैंप की ओर लौट जाएंगे तो बेस कैंप से हमें इसका सिग्नल दे दिया जाएगा. मगर वहां से भी कोई खबर नहीं थी. इससे हमें लगने लगा कि उनके साथ कुछ अनहोनी हो गई है. हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते थे. इसलिए डाॅ. पयान को छोड़कर अगली सुबह हम नंदा देवी ईस्ट की खड़ी चढ़ाई पर चढ़ने लगे. लॉन्गस्टाफ कोल से ऊपर हमने तीन जगहों पर कैंप लगाया. हम मुख्य शिविर के ठीक सामने की रिज पर थे जो अब अधिक चट्टानी और ठोस बर्फ के कारण खतरनाक हो चुकी थी.’

‘यह वही मार्ग था जिस पर चल कर 12 वर्ष पहले 1939 में पोलैंड के आरोहियों ने नंदा देवी पर्वत शिखर पर सफल आरोहण किया था. बर्फ में हमें कई जगह बंधी हुई रोप और पिटोन्स (चढ़ाई में मदद करने वाले उपकरण) भी दिखे, लेकिन कई वर्षों से बंधे रहने से उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था. इसलिए हमको अपने लिए रोप खुद ही फिक्स करनी पड़ रही थी. आरोहण बहुत खतरनाक था….दोनों शिखरों को जोड़ने वाली दो मील लंबी रिज पर चलना भी असम्भव था. किसी भी क्षण सैकड़ों फुट नीचे गिरने का खतरा बना हुआ था.’

हालांकि अब डुप्ला और विंग्स के जीवित बचे होने की उम्मीद धूमिल पढ़ चुकी थी, फिर भी तेनजिंग और डुबोस्ट ने आगे बढ़ना नहीं छोड़ा. चढ़ाई अब और विकट तथा खतरनाक हो चुकी थी, लेकिन मौसम साफ था. छह जुलाई को जब डुप्ला और विंग्स को लापता हुए ठीक एक हफ्ता बीत चुका था, तेनजिंग और डुबोस्ट ने अपने तीसरे शिविर से आगे बढ़ना शुरू कर दिया. उनकी खाद्य सामग्री तेजी से खत्म हो रही थी फिर भी वापसी से पूर्व उन्होंने शिखर आरोहण का एक प्रयास करने का निर्णय लिया. चढ़ाई अब और तीखी हो गई थी. उन्हें कहीं-कहीं चाकू की धार जैसी जगहों पर आरोहण करना पड़ रहा था.

तेनजिंग लिखते हैं, ‘हमने आगे बढ़ने के लिए सब कुछ किया, पर मुझे अब भी इस बात की हैरानी होती है कि हम बच कैसे गए. चढ़ते-चढ़ते हम एक ऐसे स्थान पर पहुंच गए जहां से ऊपर और कुछ नहीं था. हम पवित्र नंदा देवी ईस्ट शिखर पर थे. मनुष्य दूसरी बार इस शिखर पर पहुंच रहा था. मेरे लिए तो वह हमेशा के लिए एवरेस्ट के बाद सबसे ऊंची चोटी बनी रहने वाली थी. इस विजय के बाद भी हमने वहां से दिख रहे तिब्बत की ढलानों के बजाय नंदा देवी शिखर और बीच की रिज को देखना ज्यादा जरूरी समझा. हमने उस अद्भुत शिखर और दो मील लंबी रिज के चप्पे-चप्पे पर अपने साथियों के निशान ढूंढ़ने का प्रयास किया. मगर कुछ भी तो नहीं था वहां.

नंदा देवी पूर्व के सफल आरोहण ने तेनजिंग के नाम पर एक खतरनाक शिखर पर आरोहण की सफलता दर्ज हो चुकी थी. अपने साथी आरोहियों के बलिदान की कड़वी यादों के बावजूद तेनजिंग के पर्वतारोही जीवन में यह बड़ी उपलब्धि थी. इस उपलब्धि ने तेनजिंग के एवरेस्ट शिखर पर पहुंचने की पटकथा भी तैयार कर दी थी. केदारनाथ, बंदरपूंछ, नंदा देवी ईस्ट जैसे शिखरों ने तेनजिंग के पर्वतारोहण कौशल को निखारा, हिमालय की चुनौतियों से जूझना समझाया और अंततः उत्तराखंड के इस अनुभव ने तेनजिंग के एवरेस्ट विजेता बनाने की राह प्रशस्त कर दी.

2019 के हादसे ने तेनजिंग के दुःस्वप्न को फिर ताजा कर दिया है. इस शिखर पर 2007 में कुमाऊं रेजिमेंट के नंदा देवी ईस्ट अभियान को भी हादसे का शिकार होना पड़ा था. दल के चार सदस्यों को जान गंवानी पड़ी थी. लेकिन 2019 के हादसे ने एक बार फिर पर्वतारोहियों को झकझोरा है और यह चेताया है कि पर्वतारोहण में लापरवाही, अपरिपक्वता और गैर पेशेवर रवैये की कोई गुंजाइश नहीं है.

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