नेपाल के नागरिकता संशोधन प्रस्ताव से भारत में क्या बदलेगा?

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नेपाल की संसद की प्रतिनिधि सभा की राज्य व्यवस्था समिति ने नागरिकता क़ानून में संशोधन के सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पाटी के प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया है.

नए प्रस्ताव के तहत नेपाली पुरुषों के साथ विवाह करने वाली विदेशी महिलाओं को शादी के बाद नेपाल की नागरिकता पाने के लिए सात साल का लंबा इंतज़ार करना होगा.

हालांकि समिति से अधिकतर सदस्यों ने इस प्रस्ताव को सहमति दे दी है लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस और कुछ अन्य पार्टियों ने इस विवादित संशोधन प्रस्ताव का विरोध किया है.

नेपाली नागरिकरता यानी अंगीकृत नागरिकता पाने के लिए विदेशी महिला को सात साल बाद अपनी पुरानी नागरिकता त्यागने का प्रमाण या उससे जुड़ा प्रमाण दिखाना होगा.

पार्टी के सचिवालय में शनिवार हुई एक बैठक में ये फ़ैसला लिया गया है. ये क़ानून भारत सहित सभी विदेशी महिलाओं पर लागू होगा

सत्तारुढ़ नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद में दो साल पहले बने नागरिकता क़ानून 2006 में संशोधन करना पड़ोसी भारत जैसा क़दम उठाना है जहां भारतीय पुरुष से शादी करने वाली विदेशी महिला को क़ानूनी तौर पर नागरिकता का अधिकार पाने के लिए सात साल का इंतज़ार करना पड़ता है.

वहीं कम्युनिस्ट पार्टी, विपक्षी नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि शादी के बाद किसी महिला के नागरिकता पाने के क़ानूनी हक के मूलभूत हक पर इस प्रस्ताव का असर पड़ेगा.

इन नेताओं का कहना है कि कम्युनिस्ट पार्टी की जिस बैठक में इस नए प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई है उसमें नौ पुरुष सदस्य थे. उनका कहना है कि भारत और नेपाल के सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वाले नागरिकों के बीच अंतर-देशीय शादियां सदियों से होती रही हैं और इस नए प्रस्ताव से नागरिकों के बीच के आपसी संबंध बिगड़ सकते हैं.

नेता ये डर भी जता रहे हैं कि नागरिकता क़ानून को लेकर जारी विवाद से नागरिकता सुधारों और इस नए क़ानून को संसद से मंज़ूरी मिलने में देरी हो सकती है, और इसका असर नागरिकता सर्टिफ़िकेट का इंतज़ार कर रहे लोगों पर पड़ सकता है.

नेपाल में नागरिकता का सर्टिफिकेट ज़रूरी प्रमाण पत्र होता है जिसकी ज़रूरत ढेरों काम के लिए होती है, यहां तक मोबाइल फ़ोन के सिम कार्ड लेने के लिए भी इसे दिखाना होता है.

नागरिकता क़ानून 2006 में लाए गए क़ानून में नेपाली पुरुष से शादी करने वाली विदेशी महिला की नागरिकता सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. लेकिन दो साल बाद भी इस मुद्दे पर विवाद जारी है. और अब इस नए प्रस्ताव के बाद विवाद और गहरा रहा है.

नागरिकता क़ानून 2006 को लेकर हुई संसदीय समिति की बैठक में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेताओं ने मांग की थी कि इस क़ानून में विदेशी महिलाओं को एक ही वक़्त में नागरिकता और ‘सिंदूर’ देने के प्रावधान को ख़त्म किया जाए. नेताओं का कहना था कि इस प्रावधान की क़ीमत नेपाल को चुकानी पड़ सकती है.

नागरिकता क़ानून 2006 के तहत शादी के तुरंत बाद ही विदेशी महिला को नेपाल की नागरिकता मिल जाती है. कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबास चंद्र नेमबांग ने बैठक में कहा कि नागरिकता के प्रावधान में बदलाव का ये प्रस्ताव भारत को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि पार्टी के अधिकांश नेता इस क़ानून में बदलाव के विचार से सहमत हैं.

हालांकि मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस नेता बिमलेन्द्र निधि विदेशी महिलाओं को लंबे इंतज़ार के बाद नागरिकता देने के इस नए प्रस्ताव का विरोध करते हैं. उनका कहना है कि नागरिकता क़ानून 2006 में इस संबंध में उचित प्रावधान हैं जिसे बदले जाने की ज़रूरत नहीं है.

निधि नेपाल दक्षिण में स्थित तराई मधेश इलाक़े के जानेमाने शहर जनकपुरधाम से हैं जहां भारत और नेपाल के नागरिकों के बीच शादियां आम बात है. माना जाता है कि सैंकड़ो सालों पहले यहां पर जन्मी जानकी की शादी भारत के अयोध्या के राजकुमार राम से हुई थी.

राजेन्द्र महतो नई बनी जनता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं जिसमें पूर्व मधेशी नेता और पूर्व माओवादी नेता बाबूराम भट्टाराई शामिल हैं. बीबीसी हिंदी को उन्होंने बताया कि नागरिकता संशोधन क़ानून में प्रस्तावित सात साल के इंतज़ार के प्रावधान के साथ दो बड़ी समस्याएं हैं.

वो कहते हैं, “पहला तो ये कि इससे महिला के उस मूल अधिकार का उल्लंघन होगा जिसके अनुसार शादी के बाद ही उसे नेपाल की नागरिकता मिल जानी चाहिए. दूसरा ये कि इसका बुरा असर भारत और नेपाल के लोगों के बीच के रिश्ते पर पड़ेगा. रामायण काल या फिर शायद उससे पहले से दोनों के बीच अंतर-देशीय शादियां होती रही हैं और लोगों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है जो इससे ख़त्म हो सकता है.”

“ये नेपाल के तराई और सीमावर्ती भारत के लोगों के बीच इस तरह के रिश्तों को एक तरह से ख़त्म करने की कोशिश है और ये हमारे सांस्कृतिक रिश्तों पर भी हमला है. तराई के इलाक़े में रहने वाले लगभग सभी परिवारों के वैवाहिक संबंध भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और दूसरे पड़ोसी राज्यों में रहने वालों से हैं. ये प्रस्ताव अगर क़ानून बन गया तो इसका गहरा असर होगा.”

नागरिकता क़ानून में संशोधन के लिए सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रस्तावित से वो नेता भी नाराज़ हैं जो महिलाओं के भेदभाव ख़त्म करने के पक्ष में हैं. पार्टी की ही नेता और विधायक बिंदा पांडे ने नेपाल की नागरिकता देने में पुरुष और महिलाओं के बीच किए जाने वाले भेदभाद को ख़त्म करने की बात करती हैं.

पांडे ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि, “हमारी पार्टी की मौजूदा संरचना में खुद के दस्तावेज़ों का पालन नहीं किया जा रहा और न ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का. नेपाली समुदाय में अब महिला-मुक्त क्षेत्र स्वीकार्य नहीं हैं.”

उनका कहना है कि उनकी मुहिम इस कारण है क्योंकि नेपाल के मौजूदा नागरिकता क़ानून में नेपाली महिला से शादी करने वाले विदेशी पुरुष के लिए नेपाल की नागरिकता पाना और भी मुश्किल हो गया है.

नेपाली महिलाइमेज कॉपीरइटEPA/

तराई इलाक़े से कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रभु शाह ने भी पार्टी के आला कमान के फ़ैसले पर अपना विरोध जताया है. ऑनलाइनख़बर के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि इसका असर दोनों देशों के लोगों के आपसी संबंधों पर पड़ सकता है ऐसे में इस फ़ैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है.

वहीं संवैधानिक मामलों के जानकार बिपिन अधिकारी इस नए संशोधन में कोई समस्या नहीं देखते. वो कहते हैं कि 2015 में नेपाल के अपनाए संविधान में नेपाल में जन्म लेने वाले को नागरिकता देने का प्रावधान है और इस लिबरल प्रावधान को बदलने की अब कोशिश की जा रही है.

बीबीसी हिंदी को उन्होंने बताया, “नेपाल में शादी करने वाली विदेशी महिला को नागरिकता के मुद्दे में कोई परेशानी नहीं दिखती. भारत, अमरीका समेत कई और देशों में इस तरह का प्रावधान है. मुझे लगता है कि नागरिकता के लिए विदेशी महिला के लिए इंतज़ार का वक़्त रखा जाना सही है. नागरिकता कोई ऐसी चीज़ नहीं जो थाल में सजा कर किसी के सामने पेश की जाए, इसे भी कमाया जाना चाहिए.”

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