#NPR #CAA: अर्थव्यवस्था ऐसे माहौल में कैसे फलेगी-फूलेगी

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आध्यात्मिक गुरु सदगुरु ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में चिंता जताई है कि भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ विरोध का माहौल भारतीय अर्थव्यवस्था के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा है.

उन्होंने सवाल किया कि एक ऐसे में देश में कोई क्यों निवेश करना चाहेगा जहां बसें जलाई जा रही हों.

दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष समेत तमाम दूसरी वित्तीय संस्थाएं भी भारत की अर्थव्यवस्था की धीमी गति के कारण उसके भविष्य को लेकर सवाल उठा रही हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर जारी विरोध, देश की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा रहा है या फिर डर का एक माहौल इससे पहले से ही बना हुआ है.

बीबीसी ने अर्थव्यवस्था पर सामाजिक अशांति और डर के इस माहौल का असर समझने के लिए अर्थशास्त्री पूजा मेहरा और वरिष्ठ पत्रकार मयंक मिश्रा से बात की है.

अर्थव्यवस्था की बदहाली की वजह क्या?

अर्थशास्त्री पूजा मेहरा मानती हैं कि मोदी सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार करने में असफल रही है और इसके कुछ कदमों ने व्यापारिक वर्ग में एक तरह के डर का माहौल पैदा किया है, इस कारण अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंच रहा है.

वो कहती हैं, “कई समस्याएं पहले से ही थीं जिनका सरकार ने निराकरण नहीं किया. इनमें कृषि क्षेत्र की समस्याएं अहम हैं. लेकिन मोदी सरकार के कुछ कदमों की वजह से कुछ समस्याएं काफ़ी बढ़ गयी हैं. उदाहरण के लिए, बैंकों में एनपीए समस्या है. सरकार ने इस समस्या के निदान के लिए कुछ कदम उठाए तो हैं लेकिन आरबीआई के बताए कदमों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है.”

“एनपीए की समस्या की वजह से बैंकों और बैंक कर्मचारियों के अंदर एक डर बैठा हुआ है कि अगर वो कोई लोन जारी करेंगे और लोन लेने वाली कंपनी अपना कर्ज़ नहीं चुका पाई तो लोन देने वालों के ख़िलाफ़ सीबीआई-सीवीसी की जांच शुरु कर दी जाएगी. इस वजह से अधिकारी लोन जारी ही नहीं करते हैं.”

“जहां कुछ कंपनियां लोन चुकाने की स्थिति में होती भी हैं, वहां भी अधिकारी एनपीए के डर की वजह से लोन नहीं देते हैं. वो ब्याज की दरें इतनी ज़्यादा बताते हैं कि ठीक से व्यवसाय करने वाले व्यापारी भी लोन नहीं ले पाते हैं. आरबीआई की तमाम समितियां इस समस्या के निदान को लेकर अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं लेकिन इनमें बताए गए कदमों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है.”

हाल में बैंक कर्मचारियों की हड़ताल हुई थीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionहाल में बैंक कर्मचारियों की देशव्यापी हड़ताल हुई थी

एनपीए के अलावा सरकार की कई दूसरी नीतियों को लेकर भी व्यापारी वर्ग में एक तरह का रोष सामने आया है. इनमें नोटबंदी और जीएसटी प्रमुख है.

पूजा मेहरा मानती हैं कि जीएसटी के क्रियान्वन में कई समस्याएं हैं जिन्होंने व्यापारियों की कमर तोड़ दी है.

वो कहती हैं, “मोदी सरकार ने कई सीधे कदम उठाए हैं. इनमें जीएसटी प्रमुख है जिसने अर्थव्यवस्था में सुधार की बजाय समस्याएं अधिक खड़ी की हैं. छोटे-छोटे व्यवसायों को पहले इतनी कागज़ी काम नहीं करना पड़ता था जो कि अब जीएसटी के साथ करना होता है.”

“जीएसटी भरने के बाद कंपनियों को रिफंड मिलता है. लेकिन रिफंड मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कंपनियों को लोन लेकर जीएसटी भरना पड़ रहा है. कई मामलों में ये देखने में आया है कि अगर जीएसटी भरने में 15 दिन की देरी भी हो जाती है तो कंपनियों के बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर दिए जाते हैं. इस वजह से कंपनियों का पैसा जीएसटी में फंस कर रह जाता है क्योंकि जहां एक ओर रिफंड आने में देरी होती है, वहीं दूसरी ओर उन्हें जीएसटी पहले से पहले भरना पड़ रहा है”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमणइमेज कॉपीरइटFINMININDIA @TWITTER

पूजा मेहरा कहती हैं, “जीएसटी से पहले मोदी सरकार का एक और बड़ा क़दम नोटबंदी था का, जिसने उन छोटे-छोटे व्यवसायों पर असर डाला जो कि नक़दी पर चला करते थे. ऐसी कंपनियां आज भी नोटबंदी के दौरान हुए नुक़सान से उबर नहीं पाई हैं.

“और तो और हमें ये भी नहीं पता है कि इन सबका असर कितना हुआ है क्योंकि जीडीपी से जुड़े आंकड़ों से लेकर रोज़गार आदि के आंकड़ों के साथ इतनी छेड़खानी हो गई है कि अर्थव्यवस्था में सही-सही कितनी समस्या है, इसका आकलन करना भी मुश्किल हो रहा है.”

“इसके साथ ही अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से टैक्स कलेक्शन कम हो रहा है. लेकिन दिल्ली में बैठे अधिकारी अपने फील्ड ऑफ़िसर्स को टैक्स कलेक्शन के बड़े-बड़े लक्ष्य दे रहे हैं. इससे फ़ील्ड ऑफिसर्स आयकर देने वाले आम लोगों समेत कंपनियों को काफ़ी परेशान कर रहे हैं जिससे निवेश का माहौल प्रभावित हो रहा है”

“पिछले साल के बजट को देखें तो सरकार ने बजट में जो प्रस्ताव दिए, उन्हें कुछ समय बाद पूरी तरह बदल दिया. ऐसे में जिसके पास निवेश करने की क्षमता भी है, वो ये सोचकर निवेश करने से बच रहा है कि मालूम नहीं सरकार कल कौन सी नीति लेकर आएगी. ऐसे में इन वजहों से व्यापार और अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है और सरकार जो कदम उठा रही है, उससे समस्या का हल निकलता नहीं दिख रहा है.”

बच्चों के खिलौनो बेचती एक महिलाइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

फिलहाल इन सभी समस्याओं का सामना करती भारतीय अर्थव्यवस्था पर नागरिकता संशोधन क़ानून का क्या असर पड़ेगा, इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए अर्थशास्त्र के हमें नियमों को टटोलना होगा.

नोबेल पुरुस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ने भी कहा है कि अधिनायकवाद और आर्थिक समृद्धि के बीच किसी तरह का रिश्ता नहीं हो सकता है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर इस तरह का माहौल अर्थव्यवस्था को किस तरह नुक़सान पहुंचाता है.

क्या सीएए के विरोध के कारण हो रहा है नुक़सान?

अर्थशास्त्री पूजा मेहरा मानती हैं कि लंबे समय तक चलने वाले विरोध प्रदर्शन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरनाक माने जाते हैं.

वो कहती हैं, “जब ज़्यादा लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन चलते हैं तो उस अर्थव्यवस्था में निवेश का माहौल ख़राब होता है. भारत में स्थिति अभी इतनी ख़राब नहीं हुई है. लेकिन सामाजिक अशांति और हिंसाग्रस्त माहौल का अर्थव्यवस्था पर क्या असर होता है, इसका अंदाजा सीरिया, लेबनान, अल्जीरिया और कई दूसरे अरब देशों की अर्थव्यवस्थाओं को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है.”

“पड़ोसी पाकिस्तान भी इसका एक बड़ा उदाहरण है, वहां पर जीडीपी ग्रोथ घट जाती है. क्योंकि सरकार का ज़्यादातर पैसा सेना और आंतरिक सुरक्षा जैसे मदों में खर्च होने लगता है. इससे आर्थिक वृद्धि पर फर्क पड़ता है.”

“सरकार को ज़्यादा कर्ज लेना पड़ता है जो कि तरक्की के रास्ते में बाधक बनता है. ऐसे माहौल में युवा और महिलाएं नौकरियां और व्यापार नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे इससे ज़्यादा प्रभावित होते हैं. इस तरह जीडीपी घटती चली जाती है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान नहीं हो पाता है.”

“ऐसे अशांति भरे माहौल वाले देशों में घरेलू निवेशक भी निवेश नहीं करना चाहते हैं. वो नये कारखाने नहीं लगाते, न ही अपने कारोबार को आगे बढ़ाते हैं जिससे नई नौकरियां पैदा ही नहीं होती हैं और इस तरह ये माहौल फिर से जीडीपी को नुकसान पहुंचाता है.”

“हालांकि, भारत की स्थिति अभी सीरिया या लेबनान जैसी नहीं है. लेकिन अगर सरकार किसी तरह का संवाद शुरू नहीं करती है तो आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर देखने को ज़रूर मिलेगा.”

अर्थव्यवस्था के लिए धार्मिक कट्टरता कितनी नुक़सानदायक?

विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने साल 2018 में अपने एक लेख में बताया था कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से हुए विकास के लिए कौन-कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं.

लेकिन इसी लेख में उन्होंने ये भी बताया था कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को आने वाले समय में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर छपे इस लेख में बसु कहते हैं, “बांग्लादेश में कई धार्मिक कट्टरपंथी समूह और रूढ़ीवादी समूह हैं जो कि प्रगतिशील सामाजिक सुधारों की दिशा में बांग्लादेश सरकार के कदमों की आलोचना करते हैं. अगर आने वाले समय में ऐसे कदम वापस लिए जाते हैं तो बांग्लादेशी अर्थव्यवस्था को गंभीर और दीर्घकालिक असफलताओं का सामना करना पड़ सकता है.”

कौशिक बसु अपनी चिंता की वजह समझाते हुए कहते हैं, “ये कोई सामान्य चिंता की बात नहीं है. इतिहास में उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं (vibrant economies) कई बार कट्टरता की वजह से पटरी से उतरी हैं. उदाहरण के लिए, लगभग हज़ार साल पहले अरब ख़लीफ़ा का शासन ऐसे क्षेत्रों पर था जो कि आर्थिक गतिशीलता (economic dynamism) के गढ़ माने जाते थे. दमिश्क और बग़दाद जैसे शहर संस्कृति, शोध और अन्वेषण के वैश्विक गढ़ हुआ करते थे. इस स्वर्णिम काल का अंत कट्टरवाद की जड़ें फैलने के साथ हुआ.”

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाइमेज कॉपीरइटREUTERS

कौशिक बसु ने अपने इसी लेख में भारत का ज़िक्र करते हुए लिखा है, “भारत एक गतिशील और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है. भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ साल पहले तक 8 फीसदी की वार्षिक दर के साथ बढ़ रही थी. लेकिन आज के कई कट्टरवादी हिंदू संगठन अल्पसंख्यकों और महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं. ये संगठन वैज्ञानिक शोध और उच्च शिक्षा को नुक़सान पहुंचा रहे हैं और भारत की प्रगति में एक बाधक की भूमिका निभा रहे हैं. इसी तरह पंद्रहवीं से और सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगाल का स्वर्णिम काल जल्द ख़त्म हो गया क्योंकि ईसाई धर्मांधता पुर्तगाली साम्राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गयी थी.”

लेकिन सवाल ये उठता है कि धार्मिक कट्टरता और भेदभाव पूर्ण माहौल आख़िर किस तरह किसी भी देश की आर्थिक स्थिति को नुक़सान पहुंचाता है.

अर्थव्यवस्था और सामाजिक अशांति के बीच संबंध पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मयंक मिश्रा इसकी वजह बताते हैं.

मिश्रा कहते हैं, “मान लीजिए, कि दस व्यक्तियों के समूह में एक दूसरे के प्रति शक़ का माहौल है. और इस शक़ के चलते आप दस में से दो व्यक्तियों को आर्थिक गतिविधियों से बाहर कर दें. ऐसे में बाक़ी बचे आठ लोगों पर ज़्यादा काम करने का दबाव बनेगा और दो लोग आश्रित जनसंख्या का हिस्सा हो जाएंगे. ऐसे में आठ लोग चाहें कितनी भी मेहनत कर लें, दस लोगों जितने काम की भरपाई करना मुश्किल होता है.”

“सामाजिक समरसता का माहौल कितना लाभकारी होता है, ये बात जर्मनी के इतिहास में छिपी हुई है. 19वीं सदी के जर्मनी में कुछ शहरों पर किया गया एक अध्ययन बताता है कि जिन शहरों में धार्मिक विविधिता और सहिष्णुता सबसे ज़्यादा है, वहां पर नयी खोजें और उनके पेटेंट सबसे ज़्यादा हुए जिसे सबसे ज़्यादा अन्वेषण का प्रतीक माना जा सकता है.”

नागरिकता संशोधन क़ानून विरोधी प्रदर्शनइमेज कॉपीरइटEPA

भारत सरकार को क्या करना चाहिए?

केंद्र सरकार का मानना है कि विपक्षी दल अपने राजनीतिक हितों के लिए भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भ्रमित कर रहे हैं और नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन विपक्षी दलों की शह पर हो रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ये भी कहा है, “नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर आध्यात्मिक गुरू सदगुरू की बात सुनिए, उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिए हैं, बेहतरीन ढंग से हमारी सभ्यता के भाईचारे वाले तत्व को समझाया है और ये भी बताया है कि कुछ समूह अपने निजी हितों के लिए इस विषय पर भ्रामक जानकारी फैला रहे हैं.”

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने सीएए के मुद्दे पर भ्रमों को दूर करने के लिए जिन सदगुरू को सुनने की सलाह दी थी उन सदगुरू ने ही अब कहा है कि सरकार सीएए को लेकर लोगों को समझाने में विफल रही है.

सदगुरू ने ये बात डावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान टीवी चैनल इंडिया टुडे के साथ बातचीत में कही है.

सदगुरू कहते हैं, “अगर आप भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की चाहते हैं तो इसके लिए विदेशी निवेश सबसे ज़रूरी है. हम दो ट्रिलियन डॉलर के निवेश की बाट जोह रहे हैं, लेकिन ऐसे देश में कौन निवेश करना चाहेगा जहां सड़कों पर बसें जलाई जा रही हों?”

“देश में इस समय कई विवादास्पद मुद्दे हैं, अगर आप में इन मुद्दों को सुलझाने का साहस नहीं है तो आप अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ा सकते, ऐसे में किसी भी सरकार का विवेकशील कदम ये होना चाहिए कि इन मुद्दों का जल्द से जल्द समाधान निकालकर अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया जाए.”

लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ साफ शब्दों में कहा है कि इस मुद्दे पर चाहें जितना विरोध कर लिया जाए, सरकार इस क़ानून को वापस नहीं लेगी.

सरकार के इस रुख़ पर टिप्पणी करते हुए मयंक मिश्रा कहते हैं, “मुझे नहीं लगता है कि सरकार के वर्तमान रुख से किसी का भला होगा. इससे अलगाववाद और बढ़ेगा. सरकार को आगे बढ़कर नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे तबके से संवाद स्थापित करना चाहिए.”

प्रधानमंत्री मोदी ने सीएए के मुद्दे पर लोगों से सदगुरू की बात सुनने को कहा, लेकिन वो और उनकी सरकार लोगों से संवाद करने के पक्षधर सदगुरू की बात स्वयं कब सुनेंगे, ये समय ही बताएगा.

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