पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाया जाता है हिंदू बर्बर और धूर्त होते हैं !

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एक पाकिस्तानी हिंदू को उसके बचपन में ही मानसिक रूप से तोड़ दिया जाता है. वो इस्लामी रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान में समाज में अपनी हैसियत समझकर सर झुकाकर भयग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हो जाता है. भारत सरकार द्वारा लाया जा रहा नागरिकता संशोधन बिल इन बच्चों के लिए सम्मानपूर्ण, निडर जीवन की गारंटी है

एक हिंदू बच्चे के दिल पर क्या गुजरती होगी जब वो अपनी पाठ्य पुस्तकों में हिंदुओं के लिए असभ्य, बर्बर, जैसे शब्द पढ़ता होगा. इस कारण अपने सहपाठियों की नज़र में खुद को नीचा महसूस करता होगा. और उसका पिता या उसकी मां उसे क्या समझाती होगी जब वो पूछता होगा कि “क्या हम इतने बुरे हैं..?” पाकिस्तान के हिंदू बच्चे-बच्चियां अपने खिलाफ ऐसी ही बातों को पढ़ते हैं, उन्हें मन मसोसकर याद करके, परीक्षा देते हैं. उनका विद्यालय, उनकी किताबें, उनका पास-पड़ोस उनको धीरे -धीरे समझा देते हैं, कि वो इज्ज़त से जीने लायक नहीं हैं, क्योंकि वो हिंदू हैं और पाकिस्तान में रहते हैं.
पाकिस्तान की पाठ्य पुस्तकें हिंदुओं के प्रति उलाहना और नफरत से भरी हुई हैं. हिंदुओं से नफरत की बुनियाद पर बने पाकिस्तान ने एक ऐसा झूठा इतिहास गढ़कर उसे स्थापित किया है जो वहां के बच्चों को हिंदुओं से नफरत करना सिखाता है. इन विद्यालयों में पढने वाले हिंदू बच्चे इस माहौल में सहमकर रहते हैं, अपमानित होते हुए जीने की आदत डालते हैं.
हिंदू धूर्त, चालबाज और नीच हत्यारे हैं…
पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकें पढ़ाती हैं कि भारत और हिंदू धूर्त चालबाज और विश्वासघाती हैं। इस्लाम और मुसलमानों को मिटाने में लगे हैं और पाकिस्तान के सफाए की योजना बना रहे हैं। कुछ पाठ्य पुस्तकों के अंश देखें:
अल्लामा इकबाल ओपन यूनिवर्सिटी में बीए की पाठ्य-पुस्तक ‘ मुताला-ए-पाकिस्तान’ में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है- शत्रुओं की सेना पाकिस्तान में लड़ रही थी। पूर्वी पाकिस्तान के हिंदू तत्व बिल्कुल नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान की दोनों शाखाओं (पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान) के मध्य कोई उपयुक्त समझौता हो…… हिंदू केवल धूर्त और चालबाज ही नहीं बल्कि नीच हत्यारे भी हैं – विभाजन के बाद की हत्याओं के जिम्मेदार हिंदू और सिख ही थे।..’
‘ हिंदू शुरू से ही इस्लाम के दुश्मन रहे हैं…..’
हिंदू शुरू से ही इस्लाम के दुश्मन रहे हैं। ( उर्दू, पांचवी कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक, लाहौर, मई 2002, पृष्ठ 108-)
हिंदू प्राचीन सिंधु घाटी के लोगों के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते थे। उन्होंने जबरदस्ती उनकी भूमि पर कब्जा कर लिया था। वे उनके घरों में आग लगाकर उन्हें जिंदा जला देते थे। जो हिंदुओं के इन अत्याचारों से बचे उन्हें गुलाम बना लिया गया। प्राचीन उपमहाद्वीप के लोगों को पराजित करके हिंदू आपस में ही लड़ने लगे।( सामाजिक अध्ययन, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर 1987, पृष्ठ 1-2)
‘काली के सामने अन्य मजहबों के लोगों की बली…..’
( भारत-पाक युद्ध में बंदी बनाए गए एक भारतीय हिंदू पायलट के बारे में एक कहानी- ‘दुश्मन पायलट’ के बारे में समीक्षकों ने विवरण प्रस्तुत किया है) उसे बस यही सिखाया गया था- मुसलमानों पर कभी दया मत दिखाओ, पड़ोसी मुसलमान को लगातार तंग करते रहो, उन्हें इस हद तक कमजोर बना दो कि उन्हें अपनी आजादी के बारे में कुछ भी याद न रह जाए, और दुश्मन को मिटाना ही बेहतर होता है। उसे याद था कि हिंदू अपनी देवी काली को प्रसन्न करने के लिए अन्य मजहबों के निर्दोष लोगों की बलि चढ़ाते थे और वे हर किसी को अछूत ही मानते थे। वह जानता था कि उसके देश भारत ने पाकिस्तानी मुसलमानों का खून बहाने और समूचे उपमहाद्वीप पर शासन करने के उद्देश्य से पाकिस्तान पर रात के सन्नाटे में आक्रमण किया था। ( उर्दू, छठी कक्षा के, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 221)
‘मुसलमानों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया था…..’
उर्दू, पांचवी कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मई 2002, पृष्ठ 108:
वे (मुसलमान) यह जानते थे कि हिंदू हमेशा ही उनके दुश्मन रहे हैं। (वे यह भी जानते थे कि) यदि यहां से उनका शासन स्थापित हो जाता है तो वे ( मुसलमान) इस्लाम के उसूलों के अनुसार अपनी जिंदगी गुजारने के लिए आजाद नहीं रह सकेंगे, और अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के बाद मुसलमान हिंदुओं की गुलामी में बंध जाएंगे।
शुरू से ही अवसरवादी बने रहने वाले हिंदुओं ने अंग्रेजों के साथ सहयोग किया था। ( सामाजिक अध्ययन, छठी कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 141)
कांग्रेस में हिंदुओं की पहुंच बहुत ऊंची थी और उन्होंने अंग्रेजों के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए। इस दल ( कांग्रेस) ने हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए ही संघर्ष किया। धीरे-धीरे यह एक विशुद्ध हिंदू संगठन बन गई। कांग्रेस के ज्यादातर सदस्य उपमहाद्वीप में मुसलमानों की उपस्थिति तक बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वह मांग करने लगे कि मुसलमान या तो हिंदू धर्म को स्वीकार कर लें या फिर देश छोड़कर चले जाएं।
कांग्रेस अंग्रेज़ सरकार के इतने करीब थी कि वह सरकार को मुसलमानों के हित का कोई भी काम नहीं करने देती थी। बंगाल-विभाजन इसका एक उदाहरण माना जा सकता है। ( सामाजिक अध्ययन, छठी कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 143)
हिंदुओं ने बहुत ही चालाकी से अंग्रेजों को इस विश्वास में ले लिया कि ( सन 1857 के) विद्रोह के लिए पूरी तरह से मुसलमान ही जिम्मेदार थे। ( सामाजिक अध्ययन, आठवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 90) अंग्रेजों ने ( मुसलमानों की) सारी भूमि जब्त कर के हिंदुओं को दे दी। ( सामाजिक अध्ययन, आठवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्यपुस्तक परिषद ,लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 91)
इसलिए कांग्रेस और हिंदुओं को खुश करने के लिए अंग्रेज सरकार ने राजनीतिक सुधारों की घोषणा की। मुसलमानों को मत देने का अधिकार नहीं दिया गया था। हिंदू मतदाता कभी किसी मुसलमान प्रत्याशी को अपना मत नहीं देते थे, इसलिए… । ( सामाजिक अध्ययन, आठवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्यपुस्तक परिषद लाहौर, मार्च 2002 पृष्ठ 94-95)
‘हिंदुओं ने मुसलमानों को आतंकित करना शुरू कर दिया… ‘
कायदे आजम ने हिंदुओं की ‘चालों’ को भांप लिया था। ( सामाजिक अध्ययन, सातवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद लाहौर, पृष्ठ 51)
कांग्रेस के शासन को हिंदुओं ने हिंदू शासन घोषित किया और मुसलमानों को आतंकित करना शुरू कर दिया। ( सामाजिक अध्ययन, आठवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर, मार्च 2002, पृष्ठ 51)
( कांग्रेस के शासन के दौरान) हिंदू गुंडों ने सरकार की ओर से मुसलमानों को मारना और उनकी संपत्ति को जलाना शुरु कर दिया। ( सामाजिक अध्ययन, आठवीं कक्षा के लिए, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद लाहौर, मार्च 2002 पृष्ठ 104-5)
‘बहादुरशाह ज़फर को हिंदुओं ने हरवाया….’
जब अंग्रेज व्यापारी के रूप में आकर यहां ( धीरे-धीरे) अपना शासन स्थापित करने लगे तो ऊंची जाति के हिंदुओं ने इसमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उनका सहयोग किया। सिराजुद्दौला और टीपू सुल्तान की पराजय में हिंदुओं का बहुत बड़ा हाथ था।
बहादुर शाह जफर की हार और सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों व हिंदुओं के मध्य सहयोग और अधिक बढ़ गया, क्योंकि दोनों ही मुसलमानों से घृणा करते थे। अंग्रेजों का शासन स्थापित होते ही हिंदुओं ने अंग्रेजी भाषा सीखने शुरू कर दी और अंग्रेजी साम्राज्य को मजबूत बनाने में औजार का काम करने लगे तथा उनके साथ-साथ ही मुसलमानों के प्रति अपनी पुरानी नफरत को जगाना जारी रखा। इस प्रकार उन्होंने मुसलमानों को सदैव के लिए अपना गुलाम बनाने की योजना तैयार कर ली। उर्दू, कक्षाएं 9-10, पंजाब पाठ्य-पुस्तक परिषद, लाहौर मई 2002 नजरिया-ए-पाकिस्तान ( पाकिस्तान की विचारधारा) पृष्ठ संख्या 8-20:
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‘हिंदुओं ने मुसलमानों का कत्लेआम किया..’
हिंदुओं की इच्छा सदैव ही मुस्लिम राष्ट्र को कुचलने की रही है। मुस्लिम सभ्यता और संस्कृति को मिटाने के लिए हिंदुओं द्वारा अनेकों बार प्रयास किए गए। हिंदी-उर्दू विवाद और ‘शुद्धि’ तथा ‘संगठन’ आंदोलन हिंदुओं की दूषित मानसिकता के उदाहरण है। (एम. इकरम रब्बानी एवं मोनावर अली सईद , ‘एन इंट्रोडक्शन टू पाकिस्तान स्टडीज’, द कारवाँ बुक हाउस, लाहौर, 1995, पृष्ठ 12)
जहां मुसलमानों ने पाकिस्तान छोड़कर जाने की इच्छा रखने वाले (हिंदुओं) को हर तरह की सहायता उपलब्ध कराई, वहीं भारत के लोगों ने मुस्लिमों ( शरणार्थियों) के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया। उन्होंने जाने वाली बसों, ट्रकों और रेलगाड़ियों पर हमला किया तथा लूटमार की। ( राष्ट्रीय बाल शिक्षा पाठ्यक्रम (NECEC) शिक्षा मंत्रालय, पाकिस्तान सरकार, मार्च 2005, पृष्ठ 85)
‘हिंदुओं ने भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान को तोड़ा…’
पंजाब प्रांत के कक्षा 5 के बच्चों को पढ़ाई जाने वाली पुस्तक ‘मुआश्रति उलूम’ में बच्चों को पढ़ाया जाता है-
“… सन 1965 में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था और जब भारत बिल्कुल हारने की कगार पर पहुंच गया तो उसने संयुक्त राष्ट्र से युद्ध विराम करवाने का अनुरोध किया।…. सन 1965 की लड़ाई के बाद भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं की सहायता से वहां रहने वाले लोगों को पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के खिलाफ भड़काने का काम शुरू कर दिया और अंत में दिसंबर 1971 में उसने स्वयं ही पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर दिया। इस षड्यंत्र का परिणाम यह हुआ कि पूर्वी पाकिस्तान हमसे अलग हो गया। हम सभी को सैनिक प्रशिक्षण लेना चाहिए और अपने दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।”
सातवीं कक्षा की पाठ्य-पुस्तक ‘फर्स्ट स्टेप्स इन अवर हिस्ट्री’ ( हमारे इतिहास में प्रथम चरण)- पूर्वी पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में ‘एक करोड़ से अधिक’ संख्या हिंदुओं की थी, जो ‘पाकिस्तान के प्रति वफादार नहीं थे’।
इस तरह की बातें पढ़ाने वाले पाकिस्तानी शिक्षा तंत्र और विद्यालयों में हिंदू बच्चों के साथ क्या व्यहार होता होगा इसकी कल्पना कीजिए.

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