राजस्थान में लोकसभा चुनाव का यह दौर दलितों, ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए क़हर जैसा रहा है

राजस्थान में लोकसभा चुनाव का यह दौर कानून-व्यवस्था के लिहाज़ से बहुत अच्छा नहीं रहा है. इस दौरान सूबे की पुलिस चुनावी प्रबंधन में व्यस्त रही और अपराधी वारदातों को अंजाम देने में. बीते करीब एक महीने में दलितों और उनमें भी खासतौर पर महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखने को मिली है.

हालिया बड़ा मामला अलवर जिले के थानगाजी इलाके का है जहां पांच युवकों ने एक दलित युवक के सामने उसकी नवविवाहित पत्नी का न सिर्फ़ बलात्कार किया, बल्कि उसका वीडियो बनाकर वायरल भी कर दिया. जानकारी के मुताबिक पीड़ित पति-पत्नी 26 अप्रैल को बाइक पर कहीं जा रहे थे, तभी आरोपितों ने उन्हें रास्ते में रोककर बंधक बना लिया और वारदात को अंजाम दिया.

इस पूरी घटना में पुलिस की भूमिका पर बड़े सवालिया निशान उठ रहे हैं. ख़बरों की मानें तो पीड़ित परिवार ने बीती 30 अप्रैल को ही पुलिस को इस मामले की जानकारी दे दी थी. लेकिन पुलिस ने लोकसभा चुनावों में उलझे होने का तर्क़ देकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की. बार-बार गुहार लगाने पर पुलिस मुश्किल से चेती तो सही, लेकिन इसी बीच आरोपितों ने उस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया.

घटना के बाद राजस्थान के प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और दलित संगठनों ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर मोर्चा खोल दिया है. दलित संगठन ‘भीम आर्मी’ भी इस मामले में राजस्थान सरकार का जमकर विरोध कर रहा है. चूंकि राज्य में गृह मंत्रालय खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास है, इसलिए उन से इस्तीफ़े की भी मांग की जा रही है.

लेकिन इस मामले में कांग्रेस ही कटघरे में नहीं है. पीड़ित पति ने भाजपा के पूर्व विधायक हेम सिंह भड़ाना पर भी पैसे लेकर समझौता करने का दबाव बनाने का आरोप लगाया है. उधर गांव वालों का कहना है कि वीडियो के वायरल होने से पहले उन्होंने भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के छोटे-बड़े नेताओं से संपर्क साधने की कोशिश की थी, लेकिन सभी ने चुनावों में ‘बिजी’ होने का बहाना बना दिया.

मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर संज्ञान लिया है और नोटिस जारी कर प्रदेश सरकार से छह सप्ताह में जवाब मांगा है. कार्यवाही के तौर पर सरकार ने जिला एसपी को एपीओ और संबंधित थानाधिकारी को निलंबित कर दिया है. वहीं, जमकर भद्द पिटवा लेने के बाद पुलिस ने बीते गुरुवार शाम तक पांचों अपराधियों को गिरफ़्तार कर लिया.

यह ऐसी इकलौती घटना नहीं

लेकिन यह हाल की अकेली घटना नहीं हैं. ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की राज्य संयोजक सुमन देवठिया बताती हैं, ‘बीते करीब एक महीने में राज्य के शेखावाटी इलाके (चुरु, झुंझुनू और सीकर) से आठ दलित बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें आई हैं. इसी तरह बीकानेर और बाड़मेर में भी महिलाओं के साथ ज्यादती हुई है. नागौर में गैस कनेक्शन देने के बहाने दलित महिला की अस्मत लूटी गई. अकेले सवाई माधोपुर जिले में दुष्कर्म के 17 मामले सामने आए हैं जिनमें से अधिकतर पीड़िताएं दलित हैं.’

फ़िक्र जताते हुए देवठिया आगे जोड़ती हैं, ‘ये तो वे मामले हैं जो जैसे-तैसे दर्ज़ करवाए जा सके. असलियत तो न जाने कितनी भयावह होगी.’ वे कहती हैं, ‘बाबा साहब अंबेडकर के जन्मदिन सहित कई और कारणों के चलते दलित, अप्रैल महीने को ‘हिस्ट्री (ऐतिहासिक) मंथ’ नाम से मनाते हैं. लेकिन इस साल अप्रैल; दलित एट्रोसिटी (अत्याचार) मंथ साबित हुआ है.’

बीते कुछ सप्ताह में प्रदेश में दलितों को और भी तमाम तरह के अपराधों का सामना करना पड़ा है. अधिवक्ता और दलित-सामाजिक कार्यकर्ता किशन मेघवाल बताते हैं कि पिछले सप्ताह जोधपुर में दो दिन के अंतराल पर ही दो दलित युवकों और एक मां-बेटी की हत्या कर दी गई. सत्याग्रह की जब उनसे फोन पर बात हुई तो वे पीड़ित परिवारों के साथ मुर्दाघर के बाहर इन शवों के इंतजार में बैठे थे.

कारण

किशन मेघवाल कहते हैं, ‘इस ज़ुल्म के लिए हमारा सामाजिक ढांचा जिम्मेदार है. हम पर अत्याचार करने वाले जो समुदाय समाज में दबंग हैं, राजनीति में भी उनका उतना ही प्रभाव है. इसके अलावा इन समुदायों की एकतरफा वोटिंग होती है, इसलिए कोई भी दल इन्हें नाराज़ नहीं करना चाहता. यही कारण है कि सत्ता में चाहे जो आए दलितों की स्थिति में सुधार नहीं आता.’

मेघवाल की मानें तो पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के अधिकतर जिलों से दलितों पर अलग-अलग रूप में कई हमले हुए हैं. मीडिया से शिकायत जताते हुए वे कहते हैं, ‘एक पशु मर जाए तो अख़बारों की सुर्ख़ियां बन जाती हैं. लेकिन हम दो दिन से आंदोलन कर रहे हैं, किसी ने हमारी बात उठाने की जहमत नहीं उठाई. स्थानीय मीडिया के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है.’ इसके अलावा वे दलित पैरोकारों की भूमिका पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते हैं. किशन मेघवाल कहते हैं, ‘दलितों के अधिकतर स्वघोषित नेता कांग्रेस समर्थक हैं. इसलिए भाजपा सरकार के समय तो सभी सड़क पर आकर विरोध करते हैं. लेकिन कांग्रेस सरकार में वे हमारी आवाज़ नहीं बन पाते.’ हाल ही की एक रैली का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जब तक भीड़ ख़ामोश थी, नेता साथ रहे. लेकिन जैसे ही सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाजी शुरु हुई, वे भाग खड़े हुए.

वहीं, दलित-सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का इस बारे में कहना है कि राजस्थान के दलितों ने बहुत उम्मीद के साथ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दिया था. वे बताते हैं, ‘लेकिन आचार संहिता की आड़ में बीते कुछ सप्ताह में राजस्थान में जो कुछ हुआ है उससे हमें गहरा धक्का लगा है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘हमने राजस्थान को कभी इस रूप में नहीं देखा. लोगों के बीच लॉ एंड ऑर्डर का डर ही ख़त्म सा हो गया है. मुख्यमंत्री गहलोत को कानून का वो इक़बाल बुलंद करना चाहिए जिसका उन्होंने वायदा किया था.’

बात आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ इन तमाम घटनाओं के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण पर भी हमारा ध्यान ले जाते हैं. उनके मुताबिक बीते विधानसभा और इन लोकसभा चुनावों में दलितों ने अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए बढ़-चढ़कर उत्साह दिखाया. इसके बाद से ही वे कुछ वर्गों के निशाने पर चढ़े हुए हैं जिसकी परिणिति अलग-अलग अपराधों के रूप में सामने आई है.

हाल ही की इन घटनाओं को लेकर पूर्व एसीपी अनिल गोठवाल सत्याग्रह को बताते हैं, ‘ये जो पीरियड रहा कहीं न कहीं हमारे अधिकारियों की घोर लापरवाही का उदाहरण प्रस्तुत करता है. पुलिस मामले की गंभीरता समझने में नाकाम रही. सरकार जब तक ऐसे अधिकारियों को बचाती रहेगी तब तक उसे अंजाम भुगतना पड़ेगा.’ इसके अलावा गोठवाल राज्य में कानून व्यवस्था को संभालने के लिए स्वतंत्र गृहमंत्री की भी मांग करते हैं.

नाम न छापने की शर्त पर एक मौजूदा वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं कि संवेदनशील जिलों में अधिकारियों की नियुक्ति करते समय विशेष सतर्कता बरती जानी चाहिए, लेकिन अलवर के मामले में ऐसा नहीं हुआ. उनके मुताबिक जो अधिकारी वहां लगाए गए उनका ट्रैक रिकॉर्ड ऐसे हालात को संभाल पाने में नाकाम रहा है.

दलितों को लेकर राजस्थान में शासन और प्रशासन की लापरवाही का ज़िक्र करते हुए सामाजिक संगठन ‘दलित मानव अधिकार केंद्र’ के निदेशक व अधिवक्ता सतीश कुमार कहते हैं, ‘गांवों में दलितों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए ग्राम पंचायत राज एक्ट-1995 के तहत सामाजिक न्याय समितियां बनाए जाने का प्रावधान था. लेकिन इनके गठन को लेकर कभी कोई गंभीरता नहीं बरती गई. इसी तरह ब्लॉक और जिला स्तर पर भी ऐसी कमेटियां बनाने के अलग नियम मौजूद हैं, लेकिन वे भी फाइलों से बाहर नहीं आ पाए.’

सतीश कुमार आगे कहते हैं, ‘राज्य में दलितों की सुरक्षा के लिए एसटी/एससी अत्याचार निवारण अधिनियम- 1995 के (नियम-16 के) तहत एक उच्च स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति का गठन किया जाना निर्देशित है जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करता है. लेकिन 2012 के बाद यानी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में प्रदेश की भाजपा सरकार (2013-18) के पूरे कार्यकाल में इससे जुड़ी कोई बैठक नहीं हुई.’ इस बारे में सतीश कुमार ने 2015 में हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की थी जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को एक महीने के भीतर यह कमेटी गठित कर उसे सूचित करने का आदेश दिया था. लेकिन कुमार की मानें तो अब तक हाई कोर्ट के उस आदेश का पालन नहीं हुआ है.

सतीश कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला
सतीश कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला

हालांकि थानगाजी मामले के बाद राजस्थान सरकार डैमेज कंट्रोल की कोशिश में जुट गई है. प्रदेश कांग्रेस की मीडिया चेयरपर्सन अर्चना शर्मा सत्याग्रह को बताती हैं, ‘जो कुछ हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार ने इन सभी मामलों को गंभीरता लिया है. पिछले साढ़े चार महीनों के हमारे कार्यकाल में अपराध 17 प्रतिशत घटा है. आगे भी हम लॉ एंड ऑर्डर को मजबूती से स्थापित करने की नई नज़ीरें पेश करेंगे.’ वहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मीडिया से हुई बातचीत में थानगाजी वाले मामले की जांच विशेष केस ऑफिसर स्कीम के तहत करवाए जाने का आश्वासन दिया है. साथ ही उन्होंने पूरे प्रदेश में दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की जांच के लिए नोडल लेवल पर सीईओ ऑफिसर को नियुक्त करने की भी घोषणा की है.

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