गोरखपुर: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर से करीब 15 किमी दूर एक गांव है, जिसका नाम है जंगल औराही. खास बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत इस गांव को साल 2015 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने गोद लिया था. हालांकि भाजपा के हाई प्रोफाइल नेता और उग्र हिंदुत्ववादी छवि वाले योगी द्वारा गोद लिए जाने के बाद भी इस गांव की हालत भारत के अन्य गांवों जैसी ही है. ये गांव आज भी बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, आवास, साफ-सफाई, महिला सशक्तिकरण, सड़क, सुरक्षा, रोज़गार जैसी कई आधारभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है.

जंगल औराही गांव में कुल 14 टोले हैं. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक इस गांव की जनसंख्या 5,213 है. इसमें से 2,709 पुरुष और 2,504 महिलाएं हैं. गांव में 748 लोग अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के हैं. गांव तक ले जाने वाली सड़क अभी भी कच्ची है और कुछ जगहों पर ईंट का खड़ंजा बिछा हुआ है. कच्ची सड़क भी समतल नहीं है जिसकी वजह से गाड़ियों से आने-जाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

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जंगल औराही गांव की कच्ची सड़क.

गांव के एक शख्स विजय कुमार चौहान कहते हैं, ‘हमारा ये गांव अखबारों में मॉडल/आदर्श तो बन गया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ है. बेहतर होता कि अगर ये लोहिया ग्राम में आ जाता, तो यहां का भी कुछ विकास हो जाता.’ 35 वर्षीय चौहान खेती करते हैं और इस बात से नाराज़ हैं कि मोदी सरकार किसानों को उपज का सही दाम नहीं दे रही है. जंगल औराही के तेज प्रकाश ने कहा, ‘हमारे गांव की जनता ने योगी आदित्यनाथ को बहुत प्यार दिया, लेकिन उन्होंने हमारे साथ धोखा किया. गांव का कोई विकास नहीं हुआ है. यहां अस्पताल, पार्क, बस स्टैंड, सड़क आदि बनने थे, लेकिन बना कुछ नहीं. गांव के बाहरी हिस्से में एक जगह सड़क बनी है बस.’

पानी और शौचालय की स्थिति

गांव के अनूप चौहान कहते हैं कि योगी द्वारा गोद लेने के बाद इस गांव में पानी की टंकी लगा दी गई है लेकिन चार दिन, एक हफ्ते के अंतराल के बाद पानी आता है. सबसे बड़ी समस्या ये है कि सरकार ने घरों में नल तो लगवा दिए हैं लेकिन पानी निकासी के लिए नालियों की कोई व्यवस्था नहीं है. इसकी वजह से लोग नल को चालू करने से भी हिचकिचाते हैं कि पानी बहकर जाएगा कहां? गांव में नाली न होने की वजह से लोग इस क़दर परेशान हैं कि उन्होंने अपने हैंडपंप को बांध दिया है ताकि कोई इसे चलाए न, नहीं तो उनके दुआर (घर के सामने) पर पानी भर जाएगा. गांव के कुछ नल भी लोगों ने बांधकर रखा है.

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पानी निकासी के लिए नालियों की व्यवस्था न होना गांव की एक बड़ी समस्या है.

चौहान ने बताया कि गांव के कई घरों में शौचालय बनवा दिए गए हैं लेकिन उसमें से कई सारे शौचालय इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं. उनमें पानी की व्यवस्था नहीं है. अभी भी भारी संख्या में लोग शौच के लिए बाहर जाते हैं. गांव की सरिता के घर में शौचालय तो है लेकिन इसे मोटरसाइकिल खड़ी करने के उपयोग में लाया जाता है. उन्होंने बताया कि अभी पूरे पैसे नहीं मिले हैं जिसकी वजह से शौचालय का काम पूरा नहीं हो पाया.

सरिता ने कहा, ‘एक शौचालय बनाने के लिए गांव के अन्य लोगों को 12,000 रुपये मिले हैं. लेकिन मुझे अभी तक 6000 रुपये ही मिला है. काम पूरा नहीं होने की वजह से इसमें गाड़ी खड़ी रहती है.’ सरिता के अलावा गांव के कुछ और घरों में अभी शौचालय का काम पूरा नहीं हुआ है. हालांकि सरकार का दावा है कि जंगल औराही गांव खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) हो चुका है. गांव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के साथ एक बोर्ड लगाया गया है जिस पर लिखा है कि ये गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुका है.

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योगी आदित्यनाथ के आदर्श गांव में शौचालय की स्थिति.

सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत गांव में दो करोड़ 11 लाख की लागत पानी की एक टंकी लगाई गई है, जिसकी अधिकतम क्षमता साढ़े तीन लाख लीटर की है. गांव में कई घरों में नल देखने को तो मिलते हैं लेकिन गांववालों का कहना है कि नियमित पानी नहीं आता है. पानी की टंकी की देखरेख कर रहे अजय प्रजापति का कहना है कि बार-बार बिजली बिगड़ जाने की वजह से पानी भरने में समस्या होती है, इसलिए गांववालों को पानी नहीं मिल पाता है. गांव की एक अन्य महिला सन्नो ने कहा, ‘हम योगी जी को वोट दे देंगे, बस वो हमारे यहां नाली बनवा दें.’

शिक्षा और स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था नहीं

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर संसदीय सीट से पांच बार सांसद चुने गए और इस समय वो यूपी के मुख्यमंत्री हैं. इसके बावजूद आज तक इस गांव में कोई भी प्राथमिक उपचार केंद्र नहीं खुल पाया है. गांव में कक्षा आठवीं तक के लिए सरकारी स्कूल है, लेकिन ज़्यादातर गांववाले अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजने के लिए मजबूर हैं. ग्रामीणों ने कहा कि चूंकि स्कूल में टीचर नियमित रूप से आते नहीं हैं और बच्चों पर सही से ध्यान नहीं दिया जाता है, इसलिए हम बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेज रहे हैं. पेशे से टीचर निर्मला ने कहा, ‘हम थोड़ा-सा कम खा लेंगे तो चलेगा लेकिन बच्चों की ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते हैं. पैसे नहीं हैं लेकिन किसी तरह बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेज रहे हैं. अगर सरकारी स्कूलों में अच्छी शिक्षा मिलती तो हमें ऐसा करने की क्या ज़रूरत पड़ती.’

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गांव में महिला रोज़गार के कोई साधन नहीं हैं.

गांव में शिक्षा व्यवस्था सही नहीं होने की वजह से सबसे ज़्यादा समस्या का सामना लड़कियों को करना पड़ रहा है. कई लड़कियों ने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि इंटरमीडिएट स्कूल गांव से काफी दूरी पर था. रोशनी चौहान ने कहा, ‘मेरा बहुत मन करता है कि मैं आगे पढूं, लेकिन स्कूल गांव से काफी दूर है. ये इलाका भी सुरक्षित नहीं है कि हम अकेले पढ़ने जा सकें. लड़के छेड़छाड़ करते हैं.’

बता दें कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत जिन चीज़ों पर सबसे ज़्यादा ध्यान देना है उसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पीने का पानी, बिजली इत्यादि शामिल हैं. हालांकि गांव के कई घरों में बिजली का कनेक्शन दे दिया गया है, लेकिन अन्य सभी मामलों में स्थिति काफी ख़राब है. ग्राम प्रधान भगवानदास प्रजापति ने कहा, ‘हमने राजकीय स्कूल बनाने के लिए ज़मीन हैंडओवर करा दिया था. लेकिन विभाग की लापरवाही की वजह से स्कूल नहीं बन सका. प्राथमिक उपचार केंद्र बनाने के लिए लोगों ने एक एकड़ से ज़्यादा की ज़मीन दान में दिया था, लेकिन अभी ये ज़मीन हैंडओवर नहीं हो सका है.’

महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं, अधिक बिजली वसूली जा रही

सांसद आदर्श ग्राम योजना का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि इसके जरिये गांव में महिलाओं को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि उनका सशक्तिकरण हो सके. हालांकि यहां के महिलाओं की शिकायत है कि इस तरफ सरकार ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. गांव के छावनी टोले की रहने वाली 30 वर्षीय रिंकी ने कहा, ‘जब से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने हैं, कभी गांव में नहीं आए. मेरा पति मिस्त्री है, लेकिन उन्हें हर दिन काम नहीं मिलता है. घर चलाने के लिए मैं काम करना चाहती हूं, लेकिन यहां रोज़गार के कोई मौके नहीं है. अधिकतर महिलाएं बस ऐसे ही घर में बैठी रहती हैं.’

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अधिक बिजली बिल का पर्चा दिखातीं गुड्डी देवी. (फोटो: धीरज मिश्रा)

हालांकि ग्राम प्रधान भगवानदास प्रजापति का कहना है कि खादी ग्राम उद्योग से लोग अचार बनाने, पत्तल बनाने इत्यादि का प्रशिक्षण देने के लिए आए थे. लेकिन गांव के लोगों का रुझान इस तरफ नहीं है. उन्होंने कहा, ‘मैंने पत्तल बनाने के लिए पंचायत भवन पर तीन मशीनें रखी है लेकिन कोई भी वहां काम करने नहीं गया.’

एक तरफ महिलाएं ये शिकायत कर रही हैं कि उन्हें रोज़गार नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ गांव के सरकारी आंकड़ों में ये दर्ज है कि गांव में महिलाओं के 10 समूहों को रोज़गार दिया गया है. गांव के सचिव अमित श्रीवास्तव ने ये जानकारी दी.भाजपा उज्ज्वला योजना को एक बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित कर रही है. हालांकि जंगल औराही गांव की कई महिलाओं ने कहा कि उन्हें अभी तक मुफ्त गैस सिलेंडर नहीं मिले हैं. वहीं, जिन्हें मिल गए हैं उनका कहना है कि चूंकि गैस का दाम लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए हम गैस भराने में असमर्थ हैं.

प्राप्त किए गए सरकारी आंकड़ों में दावा किया गया कि गांव के कुल 75 लोगों को उज्ज्वला योजना का लाभ मिला है. इसके अलावा सौभाग्य योजना के तहत 85 घरों में बिजली का कनेक्शन दिया गया है. हालांकि कई लोगों ने कहा कि मनमाने तरीके से उनसे बिजली का बिल वसूला जा रहा है. गांव की 45 वर्षीय गुड्डी देवी के घर आज़ादी के बाद पहली बार साल 2018 के नवंबर महीने में बिजली आई थी. हालांकि अगले ही महीने यानी कि दिसंबर में उनके पास करीब 5000 रुपये का बिजली बिल भरने की रसीद आ गई. गुड्डी देवी के बेटे मुकेश कुमार निषाद ने बताया कि उनके घर में सिर्फ तीन बल्ब ही जलाए जाते हैं. उन्होंने कहा, ‘सरकार ये किस तरीके की बिजली दे रही है? इससे अच्छा था कि हमारे यहां बिजली न आई होती. अंधेरा रहता, लेकिन हर महीने इतना बिल तो न भरना पड़ता.’ निषाद मज़दूरी करते हैं और जो पैसे मिलते हैं उसी से परिवार के चार सदस्यों का जीवनयापन होता है.

गांव में पार्क बनाने को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप

योगी आदित्यनाथ ने जब इस गांव को गोद लिया तो एक पार्क बनाने का प्रस्ताव आया. पार्क बनाने के लिए गांव के आखिरी छोर पर एक ज़मीन खाली कराई. इसका नाम ‘महिला चेतना उपवन पार्क’ रखा गया. सरकारी दस्तावेजों में दावा किया गया कि पार्क बन गया है. हालांकि इस स्थान पर जाकर देखने से पता चलता है कि पार्क के नाम पर सिर्फ एक ज़मीन खाली कराई गई है और उसके चारों ओर मिट्टी डालकर एक घेरा बना दिया गया.पार्क में खेलने, टहलने या व्यायाम करने जैसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है. इसके लिए आवंटित की गई ज़मीन समतल भी नहीं है और आसपास के लोग यहां पर गोबर के उपले पाथने का काम करते हैं. इस संबंध में प्राप्त किए गए सरकारी आंकड़ों से एक चौकाने वाली जानकारी सामने आई है. जानकारी के मुताबिक इस पार्क को बनाने में एक लाख 20 हजार रुपये खर्च किए गए हैं.

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गांव का महिला चेतना उपवन पार्क. इसे बनाने के लिए 1,20,000 रुपये खर्च किए गए हैं.

हालांकि इस स्थान पर पार्क जैसा कुछ भी नहीं है. इस कथित पार्क से थोड़ी दूर पर रह रहे अच्छेलाल निषाद ने बताया, ‘आप खुद ही इसकी स्थिति देख लीजिए. क्या इसे पार्क कहा जा सकता है. हमें कहा गया था कि पार्क बनाया जाएगा. यहां पर कुछ पेड़ थे, वो काट दिए गए. लेकिन पार्क तो बना नहीं.’ गांव के प्रधान का कहना है कि अभी ये पार्क पूर्ण रूप से बन नहीं पाया है. अभी कई काम इस पर होने बाकी हैं.

कई पात्र लोगों को वृद्धा पेंशन नहीं, बीमा नहीं, राशन कार्ड नहीं

सांसद आदर्श ग्राम योजना का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि गांव के सभी पात्र लोगों तक सरकार द्वारा चलाई जा रही सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ पहुंचाया जाए. इसके तहत अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, दिव्यांग पेंशन इत्यादि देना होता है. हालांकि गांव के कई लोगों ने शिकायत की कि उन्हें इन सब योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. लेकिन, प्राप्त किए गए सरकारी आंकड़ों में दावा किया गया है कि गांव के 53 लोगों को वृद्धा पेंशन, 33 लोगों को विधवा पेंशन, 21 लोगों को दिव्यांग पेंशन और 53 लोगों को प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का लाभ मिल रहा है. गांव की एक वृद्ध महिला छंगुरी ने बताया कि कुछ साल पहले उनके पति रामविलास का एक्सीडेंट हुआ, इसके बाद से ही उनके शरीर के एक हिस्से का हाथ-पैर काम नहीं करता है. उनकी उम्र 65 साल से ऊपर की है, हालांकि ऐसी स्थिति होने के बाद भी उन्हें वृद्धा पेंशन नहीं मिलती है.

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(फोटो: धीरज मिश्रा)

महिला ने कहा कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों और प्रधान के सामने ये बात उठाई थी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. ऑनलाइन प्रक्रिया होने की वजह से भी लोगों को आवेदन करने में समस्याएं आ रही हैं. ग्रामीणों की ये भी शिकायत है कि पात्रता होने के बावजूद भी उनका राशन कार्ड नहीं बना है, जिसकी वजह से उन्हें पेंशन नहीं मिल रही है. द वायरद्वारा प्राप्त किए गए सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि गांव में 722 लोग बीपीएल कार्ड के लिए पात्र हैं, लेकिन अभी तक सिर्फ 176 लोगों का ही कार्ड बन पाया है.

आवास और साफ-सफाई की स्थिति खराब

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद वादा किया गया कि कच्चे घर वालों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का घर मुहैया कराया जाएगा. ये योजना सभी गांवों में लागू करनी थी. हालांकि योगी आदित्यनाथ द्वारा गोद लिए गए इस गांव के लोगों ने बताया कि पात्र होने के बावजूद उन्हें पीएम आवास योजना का लाभ नहीं मिला है. गांव की आरती कहती हैं कि उन्होंने गांव के प्रधान और सचिव को कई बार आवास के लिए कहा लेकिन उन्हें देने से मना कर दिया गया. वहीं, ग्राम प्रधान का कहना है कि साल 2011 की जनगणना के हिसाब से जो लोग पात्र थे उन्हें आवास दे दिया गया है. गांव के सचिव ने बताया कि अब तक कुल 13 लोगों को इसका लाभ दिया गया है.

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सरकार का दावा है कि योगी आदित्यनाथ का गोद लिया गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुका है. (फोटो: धीरज मिश्रा)

गांव के प्रधान भगवानदास प्रजापति ने कहा कि अगर इस योजना का लाभ और लोगों को दिया जाना है तो इसके लिए फिर से सर्वेक्षण कराने की जरूरत है. हालांकि 50 वर्षीय रुदल चौहान आरोप लगाते हैं कि प्रधान के करीबियों को ही आवास योजना का लाभ मिला है. चौहान ने कहा कि अधिकतर लोग इस गांव में खेती पर निर्भर हैं. आदर्श ग्राम घोषित होने पर यहां के लोगों को उम्मीद थी कि रोज़गार का साधन उपलब्ध कराया जाएगा, हालांकि इस दिशा में अभी कोई भी काम नहीं किया गया है. इसके अलावा सरकार का दावा है कि गांव में साफ-सफाई के लिए कुल 12 डस्टबिन लगाए गए हैं और चार सफाईकर्मियों की नियुक्ति की गई है. हालांकि ये सरकारी दावे ज़मीन पर उतरते दिखाई नहीं पड़ते हैं. गांव के एक स्वाच्छाग्रही अजय प्रजापति ने बताया कि कई महीनों से उनका मानदेय रुका हुआ है और इसे लेकर उन लोगों ने धरना प्रदर्शन भी किया था, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

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