गणतंत्र दिवस : भारत गणराज्य के आधार अधिकार

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संविधान की रक्षा और मौलिक अधिकारों के लिए लोकतंत्र के भविष्य से सरोकार रखने वाले हर शख्स को सतत सचेत रहना होगा, पहले भी और आज भी हालात इसकी गवाही देते हैं

इस समय भारत और पाकिस्तान में एक अद्भुत समानता देखने में आ रही है। दोनों देशों की जनता संविधान की रक्षा के लिए और उसमें दिए गए अधिकारों को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने के लिए शासकों के खिलाफ लामबंद हो रही है। खबर है कि 24 जनवरी को पाकिस्तान में संविधान के झंडे को हाथ में लेकर नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिकर्मी हुकूक-ए-खल्क (जनता के अधिकार) अभियान की शुरुआत कर रहे हैं। यहां भारत में आलम यह है कि दिल्ली का शाहीन बाग अब अनेक शहरों में नजर आने लगा है, और अहिंसक तथा लोकतांत्रिक ढंग से जनता के स्वतःस्फूर्त आंदोलन चल रहे हैं और फैलते जा रहे हैं। पुलिस के दमन का, शांति के साथ प्रतिरोध में आवाज उठा रहे नागरिकों पर कोई असर नहीं हो रहा। न वे जवाब में हिंसक कार्रवाई कर रहे हैं और न ही अपनी जगह से हिल रहे हैं।

देश का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था। तब किसने यह सोचा था कि 70 वर्ष के भीतर ही यह स्थिति आ जाएगी कि संविधान की शपथ लेकर सत्ता में आई सरकारें उसी के चिथड़े-चिथड़े करने पर आमादा हो जाएंगी और आम नागरिक को उसकी रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा? भारत गणराज्य में आज वे लोग पुलिस के हाथों पिट रहे हैं जिनकी केवल एक ही मांग है और वह यह कि संविधान की आत्मा को कुचला न जाए, उसके मूल स्वरूप और चरित्र को बदला न जाए, और उसके प्रावधानों पर पूरी तरह से अमल किया जाए। दूसरी ओर संविधान द्वारा प्रदत्त लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बहाल नहीं की जा रही हैं। नीति आयोग के सदस्य वी.के. सारस्वत का कहना है कि इसकी जरूरत भी नहीं है क्योंकि वहां लोग इंटरनेट का इस्तेमाल केवल अश्लील फिल्में देखने के लिए करते हैं। केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी ने धमकी दी है कि उन लोगों को भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है जो ‘वन्दे मातरम्’ नहीं बोलना चाहते। भारतीय जनता पार्टी की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष का बयान आया है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन करने वालों को कुत्तों की तरह गोली मार देनी चाहिए जैसा उनकी पार्टी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में किया है, क्योंकि वे सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करते हैं। इसके पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने खुलेआम घोषणा की थी कि प्रदर्शनकारियों से बदला लिया जाएगा। उत्तर प्रदेश के एक भाजपा नेता रघुराज सिंह ने कहा है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारे लगाने वालों को जिंदा दफना दिया जाएगा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में सरकारी अफसरों ने कव्वाली को यह कह कर रोक दिया कि “यहां कव्वाली नहीं चलेगी।”

सत्ता में बैठे व्यक्तियों के ये बयान क्या हमें आश्वस्त करते हैं कि हम संविधान द्वारा संचालित और नियंत्रित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में रह रहे हैं? क्या इन्हें उस संविधान के बारे में कोई जानकारी है जिसकी शपथ लेकर ये सत्तासीन हुए हैं? और अगर जानकारी है, तो क्या उसके प्रति इनके मन में थोड़ी-सी भी निष्ठा है? क्या ये धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ लेकर भारत को बहुसंख्यकवादी हिंदू राष्ट्र में बदलने के लिए कृतसंकल्प नजर नहीं आते? क्या भारत के आम नागरिक के कोई भी अधिकार नहीं हैं? क्या सरकार की नीतियों का विरोध करना जनादेश का अपमान करना है? क्या चुनाव में विजय हासिल करने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को कुछ भी मनमानी करने का जनादेश मिल जाता है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज अधिकांश लोगों के मन में उठ रहे हैं।

भारतीय संविधान सबसे पहले एक सामाजिक दस्तावेज है। इसके अधिसंख्य प्रावधानों का उद्देश्य सामाजिक क्रांति के लक्ष्यों की प्राप्ति या उनकी प्राप्ति के लिए आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण करना है। संविधान के भाग तीन और चार में वर्णित बुनियादी अधिकारों और राज्य की नीति के लिए निर्देशक सिद्धांतों को संविधान की अंतरात्मा माना जाता है। इनकी जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध लंबे समय तक चले स्वाधीनता संघर्ष में हैं और उन्हें संविधान में इसी आशा के साथ शामिल किया गया था कि वह दिन भी आएगा जब भारत में स्वतंत्रता का वृक्ष पूरी तरह से पुष्पित-पल्लवित होगा। 1928 में मोतीलाल नेहरू ने जो रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें कांग्रेस का सभी वयस्कों को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार देने का संकल्प व्यक्त किया गया था। 1930 में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि यह तयशुदा तथ्य है कि “व्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले कुछ ऐसे बुनियादी अधिकार हैं जिन्हें हम सुनिश्चित करना चाहेंगे और उन्हें संविधान में भी सम्मिलित किया जाएगा।” 1931 में कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में पारित प्रस्तावों में अनेक सामाजिक एवं आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संकल्प व्यक्त किया।

संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष और संविधान-निर्माता माने जाने वाले दलित नेता भीमराव आंबेडकर ने बहुत पहले यह बात समझ ली थी कि जब तक देश में सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं होगा, औपचारिक राजनीतिक लोकतंत्र भी फल-फूल नहीं पाएगा। इसी के साथ यह निष्कर्ष भी स्वतः ही जुड़ जाता है कि जब तक भारतीय समाज में धर्मनिरपेक्ष चेतना अपनी जड़ें नहीं जमा लेतीं, तब तक केवल धर्मनिरपेक्ष संविधान के औपचारिक माध्यम से उसे राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार में लागू नहीं किया जा सकता।

भारत-विभाजन की विभीषिका, लाखों हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों के घर से बेघर होने और अकल्पनीय दुखों को झेलने के अनुभव और दो नवजात राष्ट्रों के जन्म के तत्काल बाद ही एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन जाने की घटनाओं ने जिस तरह का माहौल तैयार किया, उसमें तो धर्मनिरपेक्षता का मज़बूत होना स्वाभाविक रूप से अत्यंत कठिन हो गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण सांप्रदायिक हिंसा और महात्मा गांधी की हत्या के रूप में सामने आया। आजादी मिलने के बाद के दशकों में सांप्रदायिक विचारों को फैलाने का काम जिस संगठित और व्यवस्थित ढंग से किया गया, वैसा कोई संगठित और सतत प्रयास धर्मनिरपेक्ष चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए नहीं किया गया। नतीजतन धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टिकरण का पर्याय मानने वालों की तादाद लगातार बढ़ती गई। आज इसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

संविधान में उल्लिखित बुनियादी अधिकारों में नागरिकों के अधिकारों के अलावा राज्य के वे नकारात्मक कर्तव्य भी शामिल हैं जो उसे नागरिकों की वैयक्तिक आजादी का अतिक्रमण करने से रोकते हैं। इन अधिकारों को सात भागों में बांटा गया है: समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक निदान का अधिकार। इन अधिकारों के संबंध में यह व्यवस्था भी है कि राज्य किसी भी नागरिक को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा। सभी नागरिकों को धर्म, एकत्रित होने, संगठन बनाने, तथा एक स्थान से दूसरे स्थान जाने की स्वतंत्रता होगी। कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति को उसके जीवन या संपत्ति से वंचित किया जा सकता है, वरना नहीं। अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा करने और उनका संरक्षण करने की अनुमति होगी। नागरिक अपने बुनियादी अधिकारों को लागू कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय या अन्य अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं। जहां बुनियादी अधिकारों का उद्देश्य नागरिकों एवं अल्पसंख्यकों को राज्य की  मनमानी और पूर्वाग्रहग्रस्त कार्रवाइयों से बचाना है, वहीं व्यक्तियों को अन्य नागरिकों से सुरक्षित करने के लिए तीन अन्य धाराएं भी जोड़ी गयी हैं। धारा 17 के माध्यम से अस्पृश्यता यानी जाति के आधार पर होने वाली छुआछूत को समाप्त किया गया। धारा 15(2) के तहत व्यवस्था दी गयी कि दुकान, रेस्टोरेंट, कुआं, सड़क तथा इसी तरह के अन्य सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग अथवा जन्म-स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। धारा 23 के जरिए बेगार यानी बिना मंजूरी दिए जबरदस्ती काम कराने पर प्रतिबंध लगाया गया।

जहां संविधान ने नागरिकों को अधिकार दिए, वहीं राज्य को उन पर विवेकपूर्ण अंकुश लगाने यानी उनका क्षेत्र संकुचित करने का अधिकार भी दिया। 1928 की मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट में भी इसका जिक्र किया गया था। लेकिन स्वाधीन भारत का इतिहास ऐसी मिसालों से भरा पड़ा है जब इन अधिकारों पर राज्य द्वारा विवेकपूर्ण नहीं बल्कि मनमाने ढंग से अंकुश लगाया गया। अभिव्यक्ति का अधिकार इस दृष्टि से सबसे अधिक प्रभावित हुआ। अनेक पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया गया और अनेक व्यक्तियों को जेल की हवा भी खानी पड़ी। जब शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का निधन हुआ, तो मुंबई में जबरदस्ती बंद कराया गया। एक मुस्लिम युवा छात्रा ने फेसबुक पर इसकी आलोचना करते हुए एक पोस्ट लिखी जिसे उसकी एक हिंदू सहेली ने लाइक कर दिया। इस ‘अपराध’ में दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी के बारे में विश्वविद्यालय के एक अध्यापक ने एक कार्टून को ईमेल आदि के जरिए प्रसारित किया, तो उसे भी जेल हो गयी। अभी हाल ही में मुंबई में एक प्रोफेसर को अनिवार्य अवकाश पर भेज दिया गया, क्योंकि उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ कुछ टिप्पणियां कर दी थीं। अक्सर फिल्मों, नाटकों, पुस्तकों और कला प्रदर्शनियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते हैं और उन पर औपचारिक या अनौपचारिक प्रतिबंध भी लग जाता है। इस मामले में लगभग सभी सरकारों का रुख कमोबेश एक जैसा ही देखा गया है।

भारतीय संविधान में संघीय प्रणाली के तत्वों को स्थान दिया गया है लेकिन उसके साथ केंद्रीय प्रणाली के तत्वों को भी मिला दिया गया है। इसलिए इसे अक्सर अर्ध-संघीय कहा जाता है। इसके बावजूद राज्यों को भी काफी अधिकार दिए गए हैं, जिनका हमेशा ही सम्मान नहीं किया जाता और इसके कारण केंद्र एवं राज्यों के बीच तनाव बना रहता है। वह तब और अधिक बढ़ जाता है जब केंद्र और राज्य में भिन्न राजनीतिक पार्टियां सत्तारूढ़ हों।

संविधान में बहुत बार संशोधन हो चुका है क्योंकि संविधान को भी समय के साथ-साथ बदलने की जरूरत होती है और इसके लिए उसमें आवश्यक लचीलापन होना अनिवार्य है। लेकिन जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है, संसद कोई ऐसा कानून नहीं बना सकती जिससे संविधान के बुनियादी ढांचे में कोई बदलाव हो। लेकिन इन दिनों जिस तरह खुलेआम हिंदू राष्ट्र की बातें हो रही हैं और महात्मा गांधी का चरित्रहनन तथा उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया जा रहा है, उसे देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं लगती कि संविधान में आमूलचूल परिवर्तन किए बिना ही उसका चरित्र बदलने की कोशिश की जा सकती है।

संविधान में उल्लिखित निर्देशक सिद्धांतों में “वैज्ञानिक मानसिकता” को प्रोत्साहन देना और उसका प्रचार-प्रसार करना राज्य का दायित्व बताया गया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्री नियमित रूप से ऐसे बयान देते रहते हैं जो नितांत अवैज्ञानिक हैं। उनका सारा जोर यह सिद्ध करने पर रहता है कि आधुनिकतम विज्ञान और तकनीकी की उपलब्धियां भारत के गौरवशाली अतीत में भी विद्यमान थीं और प्राचीन भारत में एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाने वाले अंतरिक्षयान, परमाणु अस्‍त्र वहन कर सकने वाले बाण  और उन्हें छोड़ने वाले धनुष, प्लास्टिक सर्जरी, टेस्ट ट्यूब शिशु आदि का वैज्ञानिक ज्ञान था। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस तरह के बयान दे चुके हैं। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन गाय को बहुत पवित्र मानते हैं, इसलिए उनके नेता अक्सर इस प्रकार के बयान देते रहते हैं कि गाय ऑक्सीजन ही ग्रहण करती है और उसी को छोड़ती है, गाय के गोबर में सोना होता है और उसे शरीर पर लीपने से रेडियोधर्मिता का असर नहीं होता। इस प्रकार के बयान संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हैं, लेकिन लगता है कि किसी को निर्देशक सिद्धांतों की कोई परवाह नहीं है।

संविधान के पिछले सात दशक बहुत उतार-चढ़ाव के रहे हैं। जून 1975 में उसी के प्रावधानों का इस्तेमाल करके देश में इमरजेंसी लगाई गयी थी और तब पता चला था कि कैसे संवैधानिक प्रक्रिया का सहारा लेकर भी संविधान की जड़ में मट्ठा डाला जा सकता है। आज जब देश भर में संविधान की रक्षा के लिए लोग एकजुट हो रहे हैं और सड़कों पर आ रहे हैं, तब लोकतंत्र के भविष्य से सरोकार रखने वाले सभी नागरिकों को सतत सचेत रहना होगा।

(वरिष्ठ पत्रकारराजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक टिप्पणीकार)     

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