अयोध्या: हिन्दू पक्ष के वकील पर जब भड़के जस्टिस गोगोई,सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ मध्यस्थता रिपोर्ट पर कर सकती है चर्चा

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सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई के दौरान एक वक़्त ऐसा लगा कि बॉलीवुड फ़िल्म के कोर्ट रूम का नज़ारा है.

मुस्लिम पक्ष की ओर से दलील दे रहे सीनियर वकील राजीव धवन ने अयोध्या पर एक किताब के नक्शे को फाड़ दिया.

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की ओर से पैरवी कर रहे वकील विकास सिंह इस नक्शे को बहुत उत्साह के साथ दिखा रहे थे. इसे दिखाकर हिन्दू महासभा अदालत में यह साबित करने की कोशिश कर रही थी कि राम का जन्म यहीं हुआ था.

सीनियर वकील विकास सिंह कोर्ट में उस किताब को बड़े उत्साह से दिखाने की अनुमति मांगने की कोशिश कर रहे थे. इस मामले में धवन ख़ुद को काबू में नहीं रख पाए.

राजीव धवन को इस पर ग़ुस्सा आया और उन्होंने जजों से कहा, ”माई लॉर्ड, इसे अदालत में क्यों दिखाया जा रहा है. क्या इस नक्शे को फाड़ने की अनुमति है?” मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस पर कुछ नहीं कहा. जज राजीव धवन की आपत्ति और टिप्पणी को सुनते रहे.

डॉ धवन ने कहा कि आख़िरी वक़्त में इस तरह के नक्शे पर भरोसा नहीं करना चाहिए. धवन ने कोर्ट से अनुरोध किया इस नक्शे को दिखाने की अनुमति नहीं दी जाए.

जस्टिस गोगोईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

विकास सिंह कोर्ट से कह रहे थे कि पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल की किताब ”अयोध्या रीविजिटेड” के नक्शे को दिखाने की अनुमति मिलनी चाहिए और अदालत इस पर भरोसा कर सकती है. आख़िरकार विकास सिंह ने कहा कि वो इस नक्शे को रिकॉर्ड में रखने के लिए अदालत से नहीं कहेंगे.

इस ड्रामे के बाद चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने वकीलों से कहा कि यह कैसी बहस चल रही है? अगर इसी दिशा में बहस चलती रही तो हम उठकर जा रहे हैं.

इसके बाद विकास सिंह ने स्थिति को संभालने की कोशिश की और माफ़ी मांगी. विकास सिंह ने कहा कि वो हमेशा अदालत के अनुशासन का पालन करते हैं.” इसके बाद धवन ने उस नक्शे को कोर्टरूम में ही फाड़ दिया. वकीलों और वीजिटर्स से खचाखच भरे कोर्ट रूम में लोग हैरान गए.

आख़िरी दिन की सुनवाई

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर 40 दिनों तक चली मैराथन सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई और ऐसा माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट अपना फ़ैसला नवंबर में सुनाएगा क्योंकि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं.

यह ऐतिहासिक फ़ैसला होगा. राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील राम मंदिर और बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक़ पर विवाद है.

आख़िरी सुनवाई के एक दिन पहले जस्टिस गोगोई ने कहा था कि बुधवार की शाम पाँच बजे तक सुनवाई पूरी हो जाएगी लेकिन बुधवार को एक घंटे पहले ही सुनवाई पूरी करने की घोषणा कर दी गई.

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साथ ही अदालत ने ये भी कहा कि अगर दलीलें बाक़ी हों तो संबंधित पक्ष तीन दिन के भीतर लिखित रूप में दे सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 16 अक्तूबर की देर शाम एक बयान जारी कर कहा कि 17 तारीख को अयोध्या मामले की सुनवाई कर रहे पांच जजों की संवैधानिक पीठ के सभी सदस्य चेंबर में बैंठेंगे.

वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती के मुताबिक़ अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि चेंबर बैठक में क्या होने वाला है.

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चूंकि चीफ़ जस्टिस 17 नबंर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं जानकार मानते हैं कि इस मामले में फ़ैसला नवंबर में आ सकता है.

पीठ की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कर रहे हैं. क़रीब 40 दिनों तक चली लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा लिया.

अयोध्या विवाद पर सुनवाई करने वाली पांच न्यायाधीशों वाली पीठ इस मामले में सुनवाई पूरी करने के एक दिन बाद गुरुवार को चैंबर में बैठेगी। इस दौरान अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए गठित मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट पर चर्चा हो सकती है।

सूत्रों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्लाह की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मध्यस्थता पैनल द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर चर्चा करने की संभावना है। श्रीराम पंचू और आध्यात्मिक नेता श्री श्री रविशंकर भी इस पैनल में शामिल हैं।

सूत्रों ने कहा कि यह स्पष्ट है कि पैनल अयोध्या भूमि विवाद पर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच किसी तरह का समझौता कर चुका है।

मध्यस्थता में विश्वास के लिए धन्यवादरविशंकर

रविशंकर ने एक ट्वीट में कहा, “मैं सर्वोच्च न्यायालय का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने मध्यस्थता में जो विश्वास रखा है, उसके लिए मैं सभी पक्षों को उनकी ईमानदारी और अथक भागीदारी के लिए धन्यवाद देता हूं। पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया भाईचारे और समझदारी के साथ हुई। इस देश के मूल्यों के लिए यह एक वसीयतनामा है।”

मध्यस्थता नाकाम होने के बाद शुरू हुई थी दैनिक सुनवाई

हालांकि राम लला विराजमान के वकील ने  शीर्ष अदालत में कहा था कि उन्होंने मध्यस्थता से हाथ खींच लिया है, और इसके बजाय मामले पर फैसला चाहते हैं। इस दौरान मध्यस्थता से मामले को सुलझाने में सफलता नहीं मिली। अदालत ने 6 अगस्त को मामले में दैनिक सुनवाई शुरू की थी।

मध्यस्थता की सामग्री को गोपनीयता बनाए रखने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता रिपोर्ट की सामग्री में गोपनीयता बनाए रखने का आदेश दिया है। सूत्रों के अनुसार, यह संभावना है कि शीर्ष अदालत इस मध्यस्थता रिपोर्ट के आधार पर परामर्श दे सकती है।

40 दिन तक चली सुनवाई

सीजेआई रंजन गोगोई  की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर 6 अगस्त से रोजाना 40 दिन तक सुनवाई की। इस दौरान विभिन्न पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। संविधान पीठ ने इस मामले में सुनवाई पूरी करते हुए संबंधित पक्षों को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ (राहत में बदलाव) के मुद्दे पर लिखित दलील दाखिल करने के लिए तीन दिन का वक्त दिया। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर भी शामिल हैं।

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