एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद की अर्थला झील के किनारे कथित तौर पर अवैध रूप से बसे क़रीब 500 घरों को तोड़ने का आदेश दिया है. यहां के रहवासियों का आरोप है कि जब भूमाफिया अवैध रूप से ज़मीन बेच रहे थे तब स्थानीय प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया और अब कार्रवाई के नाम पर उनके सिर से छत छीनी जा रही है.

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में अर्थला झील के किनारे कथित तौर पर अवैध रूप से बसे करीब 500 घरों को तोड़ने का आदेश दिया है.

इस पर अमल करते हुए नगर निगम और जिला प्रशासन ने पहले तो 26 मई को सभी 500 मकानों पर लाल निशान लगा दिए और फिर 29 मई को कार्रवाई करते हुए करीब 15-20 मकानों को ध्वस्त कर दिया.

बताया जा रहा है कि जल्द ही बाकी घरों को भी तोड़ने का काम शुरू किया जाएगा. प्रशासन की यह कार्रवाई एनजीटी में डाली गई एक जनहित याचिका के आधार पर हुई है, इस मामले में अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी.

एनजीटी और प्रशासन की इस कार्रवाई से यहां रह रहे लोगों में गुस्सा है. उनका कहना है कि वे लोग यहां पिछले 15-20 सालों से बसे हैं, उनके पास जमीन के कागजात हैं, बिजली-पानी का बिल है, यहीं के पते पर वोटर आईडी और आधार कार्ड तक हैं.

ऐसे में जब इन घरों में प्रशासन की ओर से बिजली-पानी समेत तमाम सुविधाएं और व्यवस्थाएं प्रदान की गई है, यह मानना मुश्किल है कि स्थानीय प्रशासन को जमीन पर हो रहे निर्माण के कथित रूप से अवैध होने की जानकारी नहीं रही होगी.

अब जब एनजीटी के आदेश पर कार्रवाई की जा रही है, तो हजारों लोगों के सिर से छत छिनने का खतरा मंडराने लगा है. यहां के रहवासियों में गुस्सा है और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर चिंता भी.

55 साल के उमेश्वर यादव उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से आकर यहां बसे हैं. वे एक तार बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं, जहां 10-12 घंटे की नौकरी में उन्हें 12-14 हजार रुपये मिलते हैं. उनके परिवार ने उनकी तीन बेटियां और दो बेटे हैं. वे बताते हैं कि इस कमाई से बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी मुश्किल से निकल पाता है.

यादव कहते हैं, ’10 साल पहले तकरीबन 2300 रुपये गज के हिसाब से 50 गज प्लॉट खरीदा था. हम किराए के मकान में रहते थे और दलाल जमीन बेच रहे थे. सस्ता होने के कारण अपना घर बनाने की आस में हमने खरीद लिया. हमारे पास खरीदी गई जमीन के कागजात हैं लेकिन फिर भी घर तोड़ने की बात की जा रही है.’

बेबसी से वह कहते हैं, ‘अब हम क्या कर सकते हैं. सालों की पूंजी जमा करके घर बनाया है. अब अगर यह टूट जाएगा वापस गांव जाना पड़ेगा.’

अर्थला झील के किनारे बसे ऐसे करीब 15-20 घरों पर प्रशासन बुल्डोजर चला चुका है. (फोटो: विशाल जायसवाल)

अर्थला झील के किनारे बसे ऐसे करीब 15-20 घरों पर प्रशासन बुल्डोजर चला चुका है.

यह पूरा मामला गाजियाबाद के एक पर्यावरण कार्यकर्ता सुशील राघव की जनहित याचिका के बाद शुरू हुआ. साल 2016 में एनजीटी में लगाई गई इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस क्षेत्र की एक भट्टी और एक अस्पताल झील में अपशिष्ट पदार्थ छोड़ रहे हैं.

याचिका में कहा गया था, ‘अर्थला झील पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण और अनाधिकृत कब्जे के कारण पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है. ठोस अपशिष्ट पदार्थ और बायोमेडिकल कचरा डालने तथा मोहन मिकिन लिमिटेड द्वारा छोड़े जा रहे औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ से भूमिगत जल दूषित हो रहा है.

इसके साथ ही अर्थला झील पर सभी अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण हटाने और झील का प्राकृतिक सौंदर्य बहाल करने की मांग की गई थी. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए 15 सितंबर, 2016 को केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था.

इसके बाद 2017 में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) सोसाइटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ इन्वायरमेंट एंड बायोडायवर्सिटी (स्पेनबायो) ने भी एक याचिका दायर की, जिस पर अगस्त, 2017 में सुनवाई करते हुए एनजीटी ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन को आदेश दिया कि वे अर्थला झील में गिराए जा रहे कचरे और उसके आस-पास किए गए अवैध अतिक्रमण को रोकने के लिए कार्रवाई करें.

इसके बाद प्रशासन द्वारा क्या कार्रवाई की गई, इसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. इसके बाद अगस्त, 2018 में स्पेनबायो की याचिका पर सुनवाई में एनजीटी ने गाजियाबाद जिला प्रशासन को तीन महीने के अंदर झील के पास से अवैध अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी किया था.

इसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ता सुशील राघव की याचिका पर बीते मई महीने में सुनवाई करते हुए प्राधिकरण ने झील की ज़मीन से जल्द से जल्द अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया और जिलाधिकारी को इसकी रिपोर्ट 31 मई 2019 तक प्राधिकरण में जमा करवाने को कहा. एनजीटी के इस आदेश के बाद पिछले दिनों प्रशासन द्वारा यह कार्रवाई की गयी है.

स्पेनबायो के सचिव आकाश वशिष्ठ ने द वायर से बात करते हुए कहा, ‘अर्थला झील पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सबसे बड़ी झील में से एक है. पिछली राज्य सरकार के कार्यकाल में यहां अवैध तरीके से अतिक्रमण कराया गया, स्थायी घर बनवाए गए. इसके बाद हमने याचिका दाखिल की थी, जिस पर आदेश आए हुआ छह-सात महीने हो गए हैं.’

वशिष्ठ के अनुसार, अर्थला झील का क्षेत्रफल दो लाख स्क्वायर मीटर का था जो अब घटकर सवा लाख स्क्वायर मीटर रह गया है.  इस क्षेत्र में इस अवैध निर्माण के लिए अखिलेश यादव सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए वशिष्ठ कहते हैं, ‘यह इलाका साहिबाबाद पुलिस स्टेशन के तहत आता है. साहिबाबाद पुलिस स्टेशन में जो-जो प्रभारी या एसएचओ रहे, सबकी मिलीभगत से, सबको पैसा खिलाकर ये जमीनें बेची गई थीं.’

यहां के 26 साल के रहवासी सद्दाम का भी ऐसा ही कहना है, वे कहते हैं, ‘जब यहां मकान बनाए जा रहे थे तब पुलिस वाले यहां बैठे रहते थे और 20 हजार-25 हजार रुपये लेते थे. उस समय कार्रवाई क्यों नहीं की.’

लेकिन मामला केवल समाजवादी पार्टी की सरकार का नहीं है. 60 साल के यासीन ने करीब 16 साल पहले यहां सात लाख रुपये में 120 गज जमीन खरीदी थी. उन्हें जमीन बेचने वालों ने इसे वक्फ बोर्ड की जमीन बताकर बेचा था.

यासीन पशुपालक हैं. उनके पास अपना घर था लेकिन वहां पशुओं को रखने की जगह न होने के चलते उस घर को बेचकर यहां घर लिया. वे कहते हैं, ‘हम गरीब लोग हैं, जहां सस्ता मिल गया वहां ले लिए. वक्फ बोर्ड के नाम पर हमें जमीन बेचने वाले गायब हो गए और हम फंस गए हैं. अब अगर यह कार्रवाई होती है तो हमें नहीं पता है कि कैसे-क्या करेंगे.’

हालिया कार्रवाई में जिन 15-20 मकानों को तोड़ा गया, उनमें अपसर का घर भी शामिल था. 65 साल के अपसर कहते हैं, ‘हमें तो किसी तरह गुजारा करना है. इतने सालों से बसी कॉलोनी को आज तोड़ने की बात की जा रही है. उन लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है जिन्होंने धोखे से हमें ये जमीनें बेचीं? प्रशासन ने अगर समय पर काम किया होता तो आज सैकड़ों गरीबों के सिर से छत छिनने का खतरा नहीं मंडरा रहा होता.’

यहां कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें जमीन बेचने वाले के बारे में कोई जानकारी नहीं है क्योंकि उन्होंने बने हुए मकान को किसी अन्य व्यक्ति से खरीदा था. इसरार की कहानी कुछ ऐसी ही है.

इसरार ने साल 2015 में करीब 14 लाख में 125 गज की मकान खरीदा था, जिसमें 40 गज हिस्सा उनके दोस्त का था. वह इस मकान को खरीदने वाले तीसरे खरीददार हैं. उनसे पहले दो लोग इसे खरीद चुके थे.

अर्थला झील के किनारे बसे घर में रहने वाले इसरार के घर की नोटरी. (फोटो: विशाल जायसवाल)

इसरार के घर के कागज.

उन्होंने दूसरे खरीददार से इस मकान को खरीदा है. उनके पास अपने साथ-साथ बाकी दोनों खरीददारों के कागजात भी हैं, वे जिन्हें दिखाते हैं. इन कागजों में पिछले दोनों मकान मालिकों के बिजली के बिल भी हैं.

उनका कहना है, ‘अगर यहां पर झील थी तो पहले ही क्यों नहीं रोका, कार्रवाई क्यों नहीं की? भूमाफिया तो बेचकर चले गए. हमारा तो इतना कहना है कि चाहे तो हम पर जुर्माना लगा दें. वह रकम हम किस्तों में देने को तैयार हैं लेकिन घर उजाड़कर हमें बेघर न किया जाए वरना एक झटके में हम फुटपाथ पर आ जाएंगे.’

प्रशासन पर सवाल 70 साल की मुस्तकिमा भी उठाती हैं. वे पूछती हैं कि जब ये कॉलोनियां बस रही थीं तब पुलिस-प्रशासन तब कहां थे.

वे कहती हैं, ‘हमने पेट काट-काटकर अपने मकान बनाए, बच्चों के झोपड़े बनाए. मुझ विधवा को 17-18 साल यहां रहते हुए हो गए. उस समय पुलिस, प्रशासन, एनजीटी और कोर्ट वाले कहां थे? तब भूमाफियाओं से पैसे ले-लेकर हमें जमीन बेच दीं, अब हम गरीबों को बेघर कर रहे हैं. हम बच्चों को लेकर कहां जाएं, कहां पढ़ाएंगे. हम मीडिया में बोलते हैं तो हम पर एफआईआर होती है.’

स्पेनबायो के आकाश के अनुसार अगर जमीन बेचने वाले गलत थे तो कुछ गलती खरीदने वालों की भी है.

वे कहते हैं, ‘नदी की जमीन को जानबूझकर खरीदने वाले भी दोषी हैं. लालच में पड़ना गलती है इसलिए वे लोग खुद जिम्मेदार हैं. बसने वाले और बसाने वाले दोनों दोषी हैं.’

उनका कहना है कि रहवासियों को कोई मुआवजा नहीं मिलना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पर जमीन ली थी, जिसके लिए राज्य जिम्मेदार नहीं है. उस समय जो अधिकारी थे उनको पकड़ा जाए और उनसे जुर्माना वसूला जाए.

हालांकि सुशील राघव ऐसा नहीं मानते. द वायर  से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘ये सारे मकान अवैध रूप से बसे हैं. अर्थला झील की जमीन खाली होनी चाहिए. इन लोगों ने जमीन गलत तरीके से खरीदी लेकिन अब अगर इनका घर उजाड़ा जा रहा है, तब इनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए तो अच्छा होगा.’

रहवासी भी सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि वोट लेने के लिए उन्हें बसाया गया और वोट मिलने के बाद उजाड़ा जा रहा है.

62 साल की मुन्नी कहती हैं, ‘हम पिछले 15-20 सालों से यहां पर रह रहे हैं. अगर यह कॉलोनी गलत है तो यह बिजली कैसे लगाई गई, ये मीटर क्यों लगे? राशन कार्ड क्यों बने, पहचान पत्र और आधार कार्ड क्यों बनाए गए? वोट लेने के लिए सब कर दिया और अब वोट ले लिया तो बस्ती को उजाड़ देंगे.’

वे कहती हैं, ‘गरीब आदमी हैं हम लोग. रिक्शा चलाकर, मजदूरी करके दो-दो रुपये जोड़कर हमने घर बनाया और ये आज हमें बर्बाद कर रहे हैं. अरे! हमें यहां से बर्बाद कर देंगे तो क्यों हमें कोई ठिकाना मिलेगा? मकान बनाते समय पुलिस वाले 10-10 हजार रुपये लेकर गए लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है.’

अर्थला झील. (फोटो: विशाल जायसवाल)

अर्थला झील और उसके आसपास बसा इलाका.

वहीं द वायर  से बात करते हुए नगर आयुक्त चंद्र प्रकाश सिंह ने कहा, ‘अतिक्रमण हटाया जाएगा. अभी देखा जा रहा है कि जमीन पर कहीं कोई केस तो नहीं चल रहा है. इसी वजह से अतिक्रमण हटाने में देरी हो रही है.’

उन्होंने कहा कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को मुआवजा दिए जाने का कोई सवाल पैदा नहीं होता है. उन सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाकर कार्रवाई की जाएगी.

वहां रहने वाले लोगों के वोटर आईडी और आधार कार्ड बनने के सवाल पर नगर आयुक्त ने कहा, ‘कार्ड जमीन के आधार पर नहीं बनता है. कार्ड इस आधार पर बनता है कि आदमी रह रहा है या नहीं रह रहा है. इसमें यह नहीं देखा जाता है कि जमीन सरकार की है या किसकी है. कार्ड इसलिए बनाए जाते हैं ताकि कोई भूखा नहीं रहे.’

अवैध कॉलोनी में बिजली कनेक्शन और मीटर कैसे पहुंचे के सवाल पर उन्होंने बिजली विभाग से संपर्क करने को कहा. गाजियाबाद के चीफ इंजीनियर राकेश कुमार ने कहा, ‘मुझे इसकी जानकारी नहीं है अवैध होने के बाद भी वहां पर बिजली कैसे पहुंचाई गई.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि, डिस्ट्रिब्यूशन कोर्ट में यह प्रावधान है कि अनाधिकृत या विकास प्राधिकरण से अधिकृत न होने वाली कॉलोनियों में बिजली आपूर्ति देने का अधिकार है. हम हलफनामा देकर बिजली आपूर्ति दे सकते हैं और अगर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई होती है तो संयोजन को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाएगा.’

इस इलाके में बिजली मुहैया कराए जाने के सवाल पर अर्थला, मोहननगर के एसडीओ प्रभात सिंह ने कहा, ‘सबको बिजली देने के आदेश हैं, बिजली-पानी ये मूल सुविधाओं में आते हैं. इससे क्षेत्र में चोरी भी रुकती है. अगर ध्वस्तीकरण की कोई कार्रवाई होगी तो हम भी नियमानुसार कार्रवाई करेंगे.’

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