जैन धर्म की परंपराओं के अनुसार संथारा लेने वाला व्यक्ति मृत्यु आने तक भोजन या पानी का बहिष्कार कर देता है. जैन धर्म के लोग इस व्रत को फेस्टिवल ऑफ डेथ कहते हैं. आइए संथारा से जुड़ी 5 अहम बातों के बारे में जानते हैं.

82 वर्षीय महिला कंचन देवी बैद संथारा लेने की वजह से सुर्खियों में आ गई हैं. जैन धर्म की परंपराओं के अनुसार संथारा लेने वाला व्यक्ति मृत्यु आने तक भोजन या पानी का बहिष्कार कर देता है. जैन धर्म के लोग इस व्रत को फेस्टिवल ऑफ डेथ कहते हैं. आइए संथारा से जुड़ी 5 अहम बातों के बारे में जानते हैं.

1. संथारा लेने वाले व्यक्ति को खान-पान जबरदस्ती बंद करा दिया जाता है या वह स्वेच्छा से इसका त्याग कर देता है. अक्सर मृत्यु को करीब देखने के बाद ही व्यक्ति इसे लेने का फैसला करता है.

2. जैन ग्रंथों की मान्यताओं के अनुसार संथारा में नियम के मुताबिक ही व्यक्ति को भोजन दिया जाता है. अन्न बंद करने का फैसला तभी लिया जाता है, जब अन्न का पाचन संभव न रह जाए.

3. संथारा में उपवास करने के दो तरीके होते हैं. इसे लेने वाले व्यक्ति पर यह निर्भर करता है कि वह संथारा के दौरान पानी पीना चाहता है या नहीं. इसमें किसी भी तरह के खाने को पूरी तरह से बहिष्कृत किया जाता है.

4. संथारा लेने वाले व्यक्ति को पहले अपने परिवार या गुरू से इसे धारण करने की आज्ञा लेनी पड़ती है. यदि परिवार या गुरू इसकी इजाजत देता है तब इस लिया जा सकता है.

5. संथारा के व्रत के बीच में भी व्यक्ति डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं. इससे व्रत नहीं टूटता. आमतौर पर तबीयत बहुत ज्यादा खराब होने पर लोग डॉक्टर्स की मदद भी लेते हैं।

संथारा: 82 साल की महिला मना रही ‘मौत का त्योहार’, छोड़ दिया खाना पीना

सूरत की रहने वाली 82 वर्षीय महिला कंचन देवी बैद ने मोक्ष की प्राप्ति के लिए संथारा (आजीवन व्रत) शुरू कर दिया है. कंचन ने 11 मई से संथारा शुरू किया है और इस खुशी में जैन समुदाय का यह परिवार खुशियां मनाने में जुटा है.

प्रतीकात्मक फोटो

सूरत की रहने वाली 82 वर्षीय महिला कंचन देवी बैद ने मोक्ष की प्राप्ति के लिए संथारा (आजीवन व्रत) शुरू कर दिया है. इस व्रत को रखने वाला इंसान मृत्यु आने तक खान-पान का त्याग कर देता है. इस व्रत को मृत्यु का त्योहार (फेस्टिवल ऑफ डेथ) भी कहा जाता है. कंचन ने 11 मई से संथारा शुरू किया है और इस खुशी में जैन समुदाय का यह परिवार खुशियां मनाने में जुटा है.

कंचन की बड़ी पोती निवेदिता नवलक्खा बताती हैं कि संथारा उनकी संस्कृति का ही एक हिस्सा है और यह सब उनके लिए नया नहीं है. उन्होंने इस बारे में अपने बुजुर्गों से भी सुना हुआ है. निवेदिता कहती है कि यह सब देखना उनके लिए आसान नहीं है, लेकिन उन्हें खुशी है कि इससे मोक्ष की प्राप्ति होगी.

कंचन के बेटे पुष्पराज ने बताया, ‘इंसान की मृत्यु जब करीब होती है तो हम उसे गले लगा लेते हैं ताकि हमारी आत्मा हमारे शरीर को छोड़ दे. इस परंपरा को हम बेहद गंभीरता से फॉलो करते हैं, जैसा कि हमने अपने बुजुर्गों से सुना है. हम अपनी मृत्यु का इंतजार करते हैं, तो कोई क्यों स्वेच्छा से मोक्ष की प्राप्ति कर सकता.’

उन्होंने बताया, ‘हमारा परिवार जैन धर्म की मान्यताओं और प्रथाओं के आधार पर चलना चाहता है. हम तपस्या में विश्वास रखते हैं. संथारा के वक्त हम सिर्फ पानी पीते हैं. संथारा हमारे लिए सबसे बड़ी तपस्या होती है. जब इंसान को लगता है कि दवाइयों का असर खत्म हो चुका है और मृत्यु का समय नजदीक आ चुका है, तब हम संथारा रख लेते हैं.

 

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