पंजाब के लुधियाना में बसे यूपी-बिहार के प्रवासी मज़दूरों की सुध कौन लेगा?- लोकसभा चुनाव 2019

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पंजाब के प्रवासी मज़दूर

यमुना यादव अपने पति और दो बच्चों के लिए रोज़गार की तलाश में 26 साल पहले बिहार के दरभंगा ज़िले से लुधियाना आई थीं. दो वक़्त की रोटी तो मिलने लगी लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी यमुना के दिल का दर्द बन गई है.

यमुना यादव कहती हैं, “भीषण गर्मी में पीने के लिए पानी नहीं है. दिन में तीन बार एक किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है. कॉलोनी में एक भी शौचालय नहीं है. यहां चारों तरफ़ गंदगी है. दिन भर की मेहनत के बाद नींद नहीं आती है क्योंकि मच्छर रात भर काटते रहते हैं.”

यह कहानी अकेले यमुना यादव की नहीं है बल्कि उन प्रवासी श्रमिकों के साथ रोज़ हो रहा है जो बिहार और उत्तर प्रदेश से रोज़ी-रोटी की तलाश में लुधियाना के शहरी क्षेत्रों में आए थे.

लुधियाना एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है इसलिए यहां लोग बड़ी संख्या में रोज़गार के लिए आते हैं. यहां आने वाले ज़्यादातर प्रवासी कामगर लुधियाना के स्थायी निवासी बन गए हैं.

उन्होंने यहां के आधार कार्ड और मतदान पहचान पत्र, सारे क़ानूनी दस्तावेज़ लिए हैं. यही वजह है कि चुनावों में राजनीतिक नेताओं की निगाहें इन पर टिकी रहती हैं.

हर चुनाव में तमाम राजनीतिक दलों के नेता इन प्रवासी लोगों को ‘वोट बैंक’ मानते हैं और उन्हें ध्यान में रखते हुए कई चुनावी वादे करते हैं.

पंजाब के प्रवासी मज़दूर

‘स्वच्छ भारत अभियान यानी बेमानी’

शौचालयों के अभाव का सबसे ज़्यादा असर यहां कि महिला कामगरों पर पड़ता है. उन्हें सुबह उठकर शौच के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है. स्वच्छ भारत अभियान का मतलब यहां बेमानी है.

यमुना यादव कहती हैं, “पुरुष तो झाड़ियों में जा सकते है लेकिन महिलाएं कहीं नहीं जा सकतीं. सरकारें कम से कम शौचालय तो बनवा ही सकती हैं. हमने बिहार छोड़कर पंजाब में वोट डालना शुरू किया. हर बार जब भी नेता आते हैं, वोट मांगते हैं और हम डालते भी हैं. हम अपनी परेशानियों के बारे में बात करते हैं. भरोसा मिलता है लेकिन जैसे ही चुनाव निकल जाते हैं, सारे वादे हवा हो जाते हैं.”

शहर के बाहरी इलाक़ों की तंग गलियों में छोटे कमरों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों की हालत भी बेहद ख़राब है. ये प्रवासी श्रमिक बिहार और उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से आकर कड़ी मेहनत से कुछ पैसे तो कमा रहे हैं लेकिन इतने भी नहीं कि अच्छे मुहल्लों में घर बना सकें.

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‘5 साल में एक बार सफ़ाई’

शंकर कुमार पहले एक कारखाने में काम करते थे. काम के दौरान घायल होने से उनका रोज़गार छिन गया. अब वह ऑटो-रिक्शा किराए पर लेकर शहर में चलाते हैं

शंकर कहते हैं, “अब नेताओं से दिल ऊब चुका है. ऑटो रिक्शा से कमाई बहुत कम होती है, पिछले लोकसभा चुनावों के बाद स्वच्छ भारत अभियान चला था. पिछले पांच साल में सिर्फ़ एक बार हमारे मुहल्ले की सफ़ाई हुई. अब भगवान चौकीदार हैं. चुनाव के समय कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बड़े नेता वोट मांगने हमारे घर आते हैं और चाय पीते हैं. हम हर बार रोते हैं कि ग़रीब लोगों को सुविधाएं दी जाए. वादे किए जाते हैं लेकिन कभी वादे निभाए नहीं जाते.”

रमेश राय बिहार के छपरा ज़िले से ताल्लुक रखते हैं. वो 19 साल पहले रोज़गार के लिए लुधियाना आए थे. रमेश ने एक मशीनी पुर्ज़े बनाने वाले कारखाने में काम शुरू किया और अपने घर बिहार पैसे भेजने लगे जहां उनके बुज़ुर्ग माता-पिता और बच्चे रहते थे.

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रमेश बताते हैं, “मैं पैसे घर भेजता रहा लेकिन दिनभर काम के कारण बीमार हो गया. दवाओं के लिए पैसे नहीं थे. आख़िरकार मैंने अपना काम करने की सोची. अब समराला चौक में पराठे की रेहड़ी लगाता हूं. सात साल पहले मेरा परिवार भी यहां आ गया था लेकिन रहने के लिए केवल एक कमरा है. उसी में किचन है और उसी में बेडरूम. हमें 24 घंटे गंदगी में रहना पड़ता है.”

वोटों के बारे में पूछने पर वो कहते हैं, “मैं ग़रीब हूं, अगर किसी नेता के ख़िलाफ़ बोलूंगा तो वो सड़क के किनारे से मेरी रेहड़ी उठवा देंगे. पिछली बार हमारी कॉलोनी में ही एक पार्टी का ऑफ़िस था. चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार मेरे तंग कमरे में आकर चाय पीते थे. उन्होंने वादा किया कि चुनाव जीतने पर हमें पानी और बाकी सुविधाएं देंगे लेकिन अब पांच साल हो गए हैं और हमने उस नेता की शक्ल नहीं देखी है.”

भरत यादव और राम शोभित यादव साल 1994 में दरभंगा छोड़कर लुधियाना आए और यहीं बस गए. वे लोकसभा से लेकर स्थानीय निकाय के चुनाव में वोट देते रहे हैं और बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा हर बार चुनावों का हिस्सा रहा है.

भरत यादव कहते हैं, “हमारे पास पीने का पानी भी नहीं है. पिछले एक हफ़्ते में कांग्रेस और अकाली दल के नेता हमारी कॉलोनी में दो बार आ चुके हैं. हमने हर बार शौचालय बनवाने और बस्तियों की सफ़ाई की मांग की है. कुछ होगा नहीं, ये हम जानते हैं लेकिन कहने में क्या बुराई है.”

पंजाब के प्रवासी मज़दूर
नेता क्या कहते हैं?

रवनीत सिंह बिट्टू इस निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हैं और वो फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनका कहना है कि प्रवासी मज़दूरों की स्थानीय उद्योग में बड़ी भूमिका है.

रवनीत सिंह ने बीबीसी से कहा, “मैंने अपने कार्यकाल में शहर के बाहर की बस्तियों और दूसरे बुनियादों कामों के लिए फ़ंड दिया. अगर मुझे दोबारा चुना जाता है तो प्रवासी मज़दूर मेरी पहली प्राथमिकता होंगे.”

लोक इंसाफ़ पार्टी के उम्मीदवार सिमरनजीत सिंह बैंस कहते हैं, “अकालियों और कांग्रेस ने ग़रीब प्रवासी मज़दूरों के बारे में कभी कुछ नहीं सोचा. मैं हर मुश्किल में उनके साथ खड़ा हूं. मेरा मक़सद सांसद बनकर शहर के बाहरी इलाकों में बसी ग़रीब कॉलोनियों को हर बुनियादी सुविधा देना है.”

पंजाब के प्रवासी मज़दूर

वहीं, शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार महेशिंदर सिंह ग्रेवाल का दावा है कि अकाली दल-भाजपा सरकार के 10 वर्षों के दौरान ग़रीब कॉलोनियों को हर तरह की सुविधाएं दी गई थीं.

ग्रेवाल कहते हैं, “ग़रीब कॉलोनियों के लिए लगातार पीने के पानी की व्यवस्था की गई थी. अब अगर एक या दो कॉलोनियों में समस्या है तो मैं निश्चित रूप से उन्हें चुनाव जीतने पर हल करूंगा.”

आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार प्रोफ़ेसर तेजपाल गिल इन हालात के लिए अकाली दल और कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (लुधियाना) के एमएस सिद्धू ने पंजाब में आने वाले प्रवासी मज़दूरों और उनकी कार्यशैली पर शोध किया है. सिद्धू का कहना है कि तीन करोड़ की आबादी वाले पंजाब में लगभग 37 लाख प्रवासी मज़दूर हैं.

1978 में पंजाब में प्रवासी मज़दूरों की संख्या 2.18 लाख थी जो अब कई गुना बढ़ गई है. बदलते समय के साथ प्रवासियों ने पंजाब में खेतों में मज़दूरी करना छोड़कर ग़ैर-कृषि क्षेत्रों में कारोबार शुरू किया है.

सिद्धू कहते हैं, “1970 के दशक में पंजाब में जब धान की फसल शुरू हुई थी उसी समय बिहार और उत्तर प्रदेश से यहां मज़दूरों का आना शुरू हुआ था. कारण ये था कि प्रवासी मज़दूरों को धान के खेती की जानकारी थी लेकिन पंजाबियों को नहीं.”

सिद्धू के मुताबिक़ 37 लाख प्रवासी मज़दूरों में से लगभग चार लाख मज़दूर खेतों में काम करते हैं और धान के मौसम में ये संख्या 5 लाख तक पहुंच जाती है. बाकी प्रवासी मज़दूर लुधियाना समेत पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में स्थायी रूप से बस गए हैं. वो कारखानों से लेकर इमारतें बनाने के काम और फल-सब्ज़ी बेचने से लेकर ढाबे चलाने और पेट्रोल पंप हर जगह काम करते हैं.

राजनीतिक पार्टियां भी वोट मांगने के लिए चुनाव प्रचार के अपने तरीके बदलते रहते हैं.

प्रवासी मज़दूरों और ग़रीब कॉलोनियों में सड़कों की हालत दयनीय है इसलिए कोई भी नेता या फ़िल्म स्टार यहां रोड शो करने नहीं आता. उम्मीदवार इन बस्तियों में नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से प्रवासी मज़दूरों तक अपनी पहुंच बना रहे हैं.

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